Friday, November 17, 2017

पद्मावती, पद्मिनी या फिर एक कल्पना ? – इतिहास पर आधारित एक पड़ताल



पद्मावती पर जितने इतिहासकार और साहित्यकार हैं... उनकी राय अलग-अलग है... पद्मावती  पर जानकार अभी तक एक मत नहीं बना पाये हैं... लेकिन पद्मावती को लेकर सबसे ज्यादा जो कहानी जानी जाती है वो अब हम आपको दिखाने जा रहे हैं... सबसे ज्यादा लोकप्रिय कहानी में पद्मावती के असतित्व को माना गया है... इस कहानी में पद्दमावती चितौड़गढ़ के राजा रत्नसिंह की पत्नी थीं...  वो बहुत खूबसूरत थीं.... और उनपर दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी आशक्त हो गया था.... उन्हें पाने के लिए उसने चितौड़गढ़ पर हमला कर दिया था..  भारी लड़ाई के बाद दुश्मन के चंगुल में जाता देख पद्मावती ने 16 हजार राजपूत औरतों के साथ आग में कूदकर जान दे दी थी... फिलहाल तो  उत्तेजित लोगों से सिर्फ इतना विनम्र निवेदन है कि सुनी सुनाई बातों पर अपना और समाज का ब्लड प्रेशर न बढ़ाएं.... वैसे ये सबको मालूम है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म `पद्मावती' का कुछ लोग विरोध क्यों कर रहे हैं... और ये वजह है एक मनगढ़ंत धारणा कि... जिसमें भंसाली ने पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच किसी तरह का प्रेम दिखाया है... जब भंसाली खुद इसे नकार चुके हैं... तो विरोध कर रहे लोगों को ये कहां से जानकारी मिल गई कि फिल्म में ऐसा कुछ है?..... पद्मावती और खिलजी में प्रेम  जायसी ने भी नहीं दिखाया है... जिनकी रचना `पद्मावत' के आधार पर ये फिल्म बनी है....  फिर लोग क्यों एक बेसिरपैर की बात पर हंगामा कर रहे हैं?.... हालांकि इतिहास सम्मत इसी धारणा को अगर माना जाये तो `पद्मावती' एक कल्पित चरित्र है... और ये कल्पना की थी मलिक मोहम्मद जायसी ने जो हिंदी के एक अमर कवि हैं... जायसी ने जिस कल्पित चरित्र को अपनी रचना का आधार बनाया वो आज ऐतिहासिक जान पड़ने लगी है..... ये साहित्य और कल्पना की ताकत है...  मिथक और इतिहास के ये अंतर्संबंध अलग व्याख्या की मांग करता है...   अब जबकि संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावतीएक दिसंबर को रिलीज़ होने जा रही है तो इसे लेकर युद्ध शुरू हो गई है.....
  करणी सेना के लोग इस बात को समझने और मानने को तैयार नहीं हैं कि पद्मावतीया पद्मिनीएक कल्पित चरित्र है और इस चरित्र की पहली कल्पना 1540 में अवधी और हिंदी के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य-ग्रंथ पद्मावतमें की थी....
इस काव्यग्रंथ की पृष्ठभूमि में 1303 में हुई अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चितौड़ पर चढ़ाई और विजय है.... इस तरह देखें तो जायसी ने अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चित्तौड़ पर चढ़ाई और विजय के  237 साल बाद अपने काव्यगंथ की रचना की थी.
237 साल बाद. ख़िलजी शासन के सबसे प्रामाणिक इतिहासकारों में से एक किशोरी लाल शरण ने भी माना है कि पद्मिनी एक काल्पनिक चरित्र है.... फिर भी न करणी सेना और न कुछ दूसरे लोग इसे मानने को तैयार हैं..... उनके तर्क भी अजीब हैं.... जैसे- चित्तौड़ में पद्मिनी महल है इसलिए पद्मिनी थीं....
ऐसे लोग ऐतिहासिक प्रमाण पेश नहीं करते कि सच में कोई पद्मिनी नाम की रानी थीं और उन्हें लेकर ही अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया है... ख़िलजी ने आक्रमण ज़रूर किया था.. लेकिन उसकी वजह पद्मिनी नहीं थीं.... ऐसा कई इतिहासकार मानते हैं...
 पद्मिनीया पद्मावतीको लेकर इतिहासकार से लेकर साहित्याकर सब बंट गये हैं.... हलांकि इसे भी नकारा नहीं जा सकता है कि... पद्मावतीके होने कोई प्रमाण नहीं है... ऐसे में सवाल ये उठता है कि  पद्मिनीया पद्मावतीको लेकर बवाल क्यों हो रहा है?... ये समझने की ज़रूरत है.... कई बार ऐसा होता है कि साहित्यिक कृतियों में आए काल्पनिक चरित्र इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि ऐतिहासिक और वास्तविक चरित्रों से अधिक लोकमानस को प्रभाविक करते हैं....
इसका एक उदाहरण 1897 में आईं ब्रेम स्टोकर का उपन्यास ड्रैकुला  है... जिसने कई फिल्मों और विधाओं को जन्म दिया है.... ड्रैकुला का मिथक यथार्थ से ज़्यादा ताक़तवर हो चुका है.... जबकि कोई ड्रैकुला था ही नहीं.
दूसरा उदाहरण भारतीय है.... के. आसिफ़ की फिल्म मुगल-ए-आज़म’.... ये भी अनारकली के मिथक पर आधारित है.... अब्दुल हलीम शरर और इम्तियाज़ अली ताजजैसे उर्दू लेखकों ने अनारकलीका मिथक रचा..... जिसे के. आसिफ़ ने अपनी फिल्म के माध्यम से भारत के घर-घर में पहुंचा दिया..... ऐसा ही कुछ पद्मिनी के साथ हुआ....
मशहूर गीतकार, लेखक और शायर जावेद अख्तर ने भी कहा है कि, ‘पद्मावतीकी कहानी सही मायनों में ऐतिहासिक है ही नहीं.... वो मानते हैं कि पद्मावतीकी कहानी उतनी ही नकली है जितनी कि सलीम और अनारकली की कहानी...
आशुतोष गोवारीकर की फिल्म 'जोधा-अकबर' का जिक्र करते हुए भी जावेद अख्तर समेत कई इतिहासकार और साहित्यकार ने कहा है कि इतिहास के मुताबिक अकबर की जोधा बाई नामक कोई पत्नी थी ही नहीं...
इतिहासहीन लोगों को ये अनुमान नहीं हो सकता है कि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना के कारण पद्मिनी का कल्पित किस्सा कई साहित्यिक रचनाओं... फिल्मों और धारावाहिकों में ऐसे आया.... मानों वो ऐतिहासिक चरित्र हैं.....

मूल अवधी में लिखी गई जायसी की रचना के फारसी में कम से कम बारह रूपांतरण हुए और उनमें पद्मिनीया पद्मावतीका किस्सा आया है.... राजस्थान की भाषाओं में भी पद्मिनी के किस्से पर गाथाएं रची जाती रहीं.....
राजस्थानी इतिहास के वृंतात लिखने वाले अंग्रेज़ कर्नल जेम्स टॉड ने भी इन गाथाओं के बारे में लिखा और उसके कारण आधुनिक युग में पद्मिनी का किस्सा बंगाल पहुंचा जिस पर देवकी बोस ने 1934 में मूक फिल्म कामोनार अगुनभी बनाई....
यहां तक कि दक्षिण में चित्रापु नारायण राव ने चित्तौड़ रानी पद्मिनीनाम की फिल्म भी बनाई जिसमें शिवाजी गणेशन और वैजयंती माला बाली ने भूमिकाएं निभाईं....
1954 में आई हिंदी फिल्म जागृतिमें एक गाना है जिसका मुखड़ा है- आओ बच्चों! तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’….  इस गाने में एक पंक्ति आती हैकूद पड़ी थी यहां हजारों पद्मिनिया अंगारों पे’.....
1964 में हिंदी फिल्म पद्मिनीभी आई.... इस तरह पद्मिनी का मिथक बढ़ता गया.... भंसाली की आने वाली फिल्म भी इस तरह लगभग 475 साल पहले रचे गए एक मिथक की नई पेशकश हैं.... और ऐसा होने में कुछ गलत भी नहीं है.... मिथक लगातार बनते हैं और उनको इतिहास समझने की भूल भी होती रही है....

मलिक मुहम्मद जायसी का अपना जीवन भी कई तरह की किंवदंतियों से भरपूर है.... जायसी की एक आंख नहीं थी…. एक किस्सा तो इसी को लेकर है... कहते हैं कि शेरशाह से जब उनकी पहली मुलाकात हुई तो वो जायसी को देखकर हंसा. जायसी ने पूछा, ‘ मोहिका हससि, कि कोहरहि?... यानी मुझ पर हंस रहे हो या मुझे बनाने वाले कुम्हार यानी ख़ुदा पर?... कहते हैं शेरशाह इस पर लज्जित हुआ.
दूसरी किंवदंती ये है कि जायसी ने अपने स्थानीय राजा से कहा, ‘मैं किसी राजा के तीर से मरूंगा.एक दिन वो राजा जंगल में शिकार खेलने गया और एक शेर को देखा... राजा ने तीर चलाके उसे मार दिया. बाद में देखा कि शेर मरने के बाद जायसी के शव के रूप में बदल गया... यानी जायसी ने ख़ुद हठयोग से शेर का रूप धर लिया था.... हो सकता है कि आने वाले समय मे जायसी पर भी फिल्म बने.....
संजय लीला भंसाली की पद्मावतीका अंत कैसा होगा, ये जिज्ञासा का विषय है.... जायसी ने तो ये दिखाया है कि अलाउद्दीन ख़िलजी युद्ध जीत लेने के बाद पाता है कि उसे एक मुट्ठी राख के सिवा कुछ नहीं मिला... जायसी का पद्मावतयुद्ध की व्यर्थता के बोध को दिखाने वाली रचना है... मध्यकालीन हिंदी साहित्य के आधिकारिक विद्वान प्रो. नित्यानंद तिवारी कहते हैं कि पद्मावतप्रेम की पीड़ा को रेखांकित करने वाला काव्य है.... क्या भंसाली की फिल्म में प्रेम की ये पीड़ा दिखेगी? या कुछ और....


 लेखक -  पुरुषोत्तम कुमार, टीवी पत्रकार  
नोट - इस लेख को इतिहासकारों के लेख पर आधारित होकर लिखा गया है. भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोई साजिश न समझी जाएं, बल्कि लेख को गलत साबित करने के लिए नए तथ्य सामने लेकर आएं. – ऋषिराज