Tuesday, January 19, 2016

मरने के बाद रोहित का पहला इंटरव्यू


मौत के बाद पहला इन्टरव्यू

नमस्कार, मैं ऋषिराज आज आपको एक ऐसा इन्टरव्यू पढाने जा रहा हूं जो अपने आप में नये किस्म का हैं। मैने मर चुके दलित छात्र रोहित का इन्टरव्यू किया है । ये मेरी एक कोशिश है कि एक शोषित वर्ग के छात्र को कैसी दिक्कते आयी होंगी । यहां आपको यह भी बता दूं यह इन्टरव्यू  काल्पनिक आधार पर किया गया है।इन्टरव्यू के जवाब रोहित के अंतिम पत्र पर आधारित हैं। यह सब मैने इसलिए लिख दिया क्योकी आज कल लोगो की भावनाए इतनी नाजुक और नंगी हो गयी है की कोई भी उन्हें ठेस पहुंचा देता है ।  आपको यह इन्टरव्यू पढ़ने पर बुरा लगे तो माफ किजीएगा अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी गहरी नींद से जाग जाये। इस इन्टरव्यू के सवाल वैसे ही है जैसे आप रोजमर्रा के टेलीविजन में खोखली हो चुकी पत्रकारीता के सवाल  में देखते है ।
रिपोर्टर का सवाल – तो रोहित मरने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
रोहित का जवाब- जी , अच्छा और बेहद हल्का मेहसूस कर रहा हूं । अब केवल मै और मेरी आत्मा हैं । हम अब आराम से अपने मन के मुताबिक  अपने चुने हुए विषयो पर बात कर रहै है । यहा कोई और नही है जो मेरे बात करने या किसी विषय पर राय रखने पर मुझे देशद्रोही करार दे दे ।मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूं।
रिपोर्टर का सवाल – रोहित आपने आत्महत्या क्यो की ?
रोहित का जवाब- सब शुन्य हो चुका था । मैं खुद के शरीर और रूह के बीच एक खाई महसूस कर रहा था, दुनिया खोखली है ,सब दिखावटी  लोग है जो इस दुनिया में रहते है ।
रिपोर्टर का सवाल-  क्या आप अपने विश्वविधालय में जातिवादी और देशद्रोही गतिविधी कर रहे थे?
रोहित का जवाब- देश में कई ऐसे वर्ग के लोग है जो किसी के भी फांसी के पक्ष नहीं हैं। कई जज से लेकर मशहूर अभिनेता तक फांसी के पक्ष में नहीं है। हम लोग भी उसी पक्ष का एक हिस्सा थे । देश आजाद है हमें अपनी राय रखने का पुरा अधिकार है तो फिर हम देशद्रोही कैसे हो गये ? अफजल गुरू के वक्त भी कई नेताओ ने फांसी का विरोध किया ये लोग उन्हे देशद्रोही करार क्यो नहीं देते ?
रिपोर्टर का सवाल - तो आप मानते है कि याकूब को गलत सजा दी गयी?
रोहित का जवाब-  नहीं , मैं आपको बता दू कि हम फांसी देने के खिलाफ है किसी भी गुनहगार को फांसी न दी जाये हम इसके पक्ष में हैं। फांसी के अलावा कोई और भी सजा दी जा सकती हैं ।
रिपोर्टर का सवाल- आप दलित है क्या इस वजह से आपके साथ ऐसा किया गया ?
रोहित का जवाब- मैं ऐसा नहीं मानता, मेरा तो बचपन ही एक त्रासदी की तरह गुजरा है और बिल्कुल खाली । बचपन से लेकर अबतक ऐसा ही हुआ है और मेरे से पहले भी यही होता आया है ।
रिपोर्टर का सवाल- क्या आपको मालूम था कि आपके मरने के बाद लोग कैसे रिएक्ट करेंगे ?
रोहित का जवाब- हां शायद मुझे मालूम था कि मेरे मरने पर लोग मुझे कायर कहेंगे, वो यह भी कहेंगे की एक एजेंडे के तहत मै हिन्दुओ को विरोध करता था लेकिन  यकिन मानिए मुझ इन बातों से फर्क नहीं पड़ता । मै इन चीजो का आदी हो चुका हूं और उनके सोच पर अब मुझे तरस आता हैं।
रिपोर्टर का सवाल- आपको सरकार से शिकायत है ?
रोहित का जवाब- नहीं , मुझे अब किसी से शिकायत नहीं है । मैं क्या हम सब इस व्यवसथा के आदि हो चुके है जहां लोकतत्र के नाम पर सरकार जनता पर ही हुकुमत करती है ।
रिपोर्टर का सवाल-  आपने जान देने से पहले अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा ?
रोहित का जवाब – सब कुछ सोच समझ कर किया । हर पहलु के बारे में सोचा और जब मन से शुन्य हो गया तो मुझे जीने से ज्यादा मरने में खुशी दिख रही थी । तो एक पत्र लिखा और फिर ....
रिपोर्टर का सवाल- आप 13 दिनों तक खुले आसमान में सोते रहे इसके पहले आप और आपके साथियो पर करावाई के लिए सरकार व्दारा लगातार पत्र लिखे जा रहे थे उसपर कोई टिप्पनी करना चाहेगे ?  
 रोहित का जवाब-  नही, जिसे जो करना  अच्छा लगा उसने वो किया ।यहां सभी दिखवटी लोग है मै किसी से कुछ नही कहुंगा ।
रिपोर्टर का सवाल- आपके दोस्त और आपसे हमदर्दी रखने वाले  लोग सड़क पर है ?
रोहित का जवाब- मुझे नहीं मालूम था कि इतने लोग मेरे लिए खड़े होगे । लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि ये लोग अगर शुरू से इतने जागरूक होते और लगातार आवाज उठाते तो किसी दलित को शोषित ही न होना पड़ता ।
रिपोर्टर का सवाल- अब आप मर चुके है लेकिन आपके मरने पर खूब राजनीति हो रही है?
रोहित का जवाब – अच्छा है शायद मेरे बाद मेरे किसी दोस्त को ऐसा कदम उठाने की जरूरत न पड़े लेकिन इसकी उम्मीद बहुत कम है ?
रिपोर्टर का सवाल – तो आप....(रोहित बीच मे रिपोर्टर को रोकते हुए )
रोहित- आप भी तो मेरे मरने के बाद आये शायद आपको इसी का इंतजार था कि कोई दलित मरे और फिर इसकी मौत पर जी भर कर तमाशा किया जा सके ...
( रोहित गायब हो जाते है )
रिपोर्टर का मुहं लटक जाता है और फिर वह भी ....

Sunday, January 17, 2016

रोहित भाई काश तुम दलित न होते!


अगर रोहित दलित नहीं होता तो शायद उसे होस्टल से नहीं निकलते । शायद उसका समाजिक बहिष्कार नहीं होता! उसके माँ बाप आज उसके शरीर से लिपट कर रो नहीं रहे होते ।
देखी तेरी रौब करारी..
ओ सरकारी..
तू तो निकली हत्यारी...

पढ़िए दलित युवक रोहित ने मरने से पहले क्या लिखा, और हम सब को सच का सामना करा गया।।

Good morning,
I would not be around when you read this letter. Don’t get angry on me. I know some of you truly cared for me, loved me and treated me very well. I have no complaints on anyone. It was always with myself I had problems. I feel a growing gap between my soul and my body. And I have become a monster. I always wanted to be a writer. A writer of science, like Carl Sagan. At last, this is the only letter I am getting to write.

I always wanted to be a writer. A writer of science, like Carl Sagan.
I loved Science, Stars, Nature, but then I loved people without knowing that people have long since divorced from nature. Our feelings are second handed. Our love is constructed. Our beliefs colored. Our originality valid through artificial art. It has become truly difficult to love without getting hurt.
The value of a man was reduced to his immediate identity and nearest possibility. To a vote. To a number. To a thing. Never was a man treated as a mind. As a glorious thing made up of star dust. In very field, in studies, in streets, in politics, and in dying and living.

I am writing this kind of letter for the first time. My first time of a final letter. Forgive me if I fail to make sense.

My birth is my fatal accident. I can never recover from my childhood loneliness. The unappreciated child from my past.
May be I was wrong, all the while, in understanding world. In understanding love, pain, life, death. There was no urgency. But I always was rushing. Desperate to start a life. All the while, some people, for them, life itself is curse. My birth is my fatal accident. I can never recover from my childhood loneliness. The unappreciated child from my past.

I am not hurt at this moment. I am not sad. I am just empty. Unconcerned about myself. That’s pathetic. And that’s why I am doing this.


objects in mirror are (never) closer than they appear. (From Rohit’s Facebook Wall)
People may dub me as a coward. And selfish, or stupid once I am gone. I am not bothered about what I am called. I don’t believe in after-death stories, ghosts, or spirits. If there is anything at all I believe, I believe that I can travel to the stars. And know about the other worlds.

If you, who is reading this letter can do anything for me, I have to get 7 months of my fellowship, one lakh and seventy five thousand rupees. Please see to it that my family is paid that. I have to give some 40 thousand to Ramji. He never asked them back. But please pay that to him from that.

Let my funeral be silent and smooth. Behave like I just appeared and gone. Do not shed tears for me. Know that I am happy dead than being alive.

“From shadows to the stars.”

Uma anna, sorry for using your room for this thing.

To ASA family, sorry for disappointing all of you. You loved me very much. I wish all the very best for the future.

For one last time,

Jai Bheem

I forgot to write the formalities. No one is responsible for my this act of killing myself.
No one has instigated me, whether by their acts or by their words to this act.
This is my decision and I am the only one responsible for this.
Do not trouble my friends and enemies on this after I am gone.

Tuesday, January 12, 2016

देश को एक नहीं अनेक जल मानव चाहिए...!

  
जल ही जीवन है यह बात आप और हम सब बचपन से ही सुनते आ रहे है लेकिन इसके मायने को समझने के लिए हमें अपने सोच को विकसीत करने की जरूरत है। एक वक्त था जब देश के लोग नदी और तलाब की पानी पिया करते थे जिसके बाद  कुंए का निर्माण हुआ  फिर लोग चापाकल(हैंडपंप)का इस्तमाल करने लगे और आज के वक्त हम नल के पानी से लेकर बोतल बंद पानी का इस्तमाल करने लगे  है । इन सब के बीच हम इस बात का ध्यान रखना भूल गये कि हम लगातार विकास के  साथ कदमताल करने के ऐवज में अपने इलाके के नदी –तलाबो को ही खत्म कर बैठे । हमने न केवल  नदी –तलाबो को खत्म ही नहीं किया बल्कि जल की गुणवक्ता को खराब करने में पूरी भूमिका निभायी । अब हमें ऐसा वक्त भी देखने को मिल रहा है जहां पानी पर अधिकार के लिए लड़ाई तक की जा रही है।  हमारे देश में भी जल बटवारे को लेकर कई राज्यो में आपसी तकरार हैं। यही कहानी हमें विश्व के कई अन्य देशों में भी देखने को मिल रही हैं। पानी एक ऐसा आधार है जो किसी ईलाके के बसने और उजडने का मुख्य कारक होता हैं लेकिन हम इंसानी फितरत वाले लोग जो ठहरे, हमने जल संरक्षण के जगह उंची इमारतो और फैक्ट्रीयों को तरजीह दी, शहर और गांव में गिरते जल स्तर को बचाने के जगह बोतल बंद पानी को तरजीह दी । आज के मौजूदा हालत ऐसे हो चले है जहां पानी उपल्बध न होने के कारण लोग अपने पैतृक निवास को छोड़ने पर मजबूर हैं। पानी की मौजूदगी नहीं होने से किसान खेती छोड़ रहे है तो कहीं किसानो की फसलें बर्बाद हो रही हैं। हमारे देश में विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे ईलाके से खेती करना मौत को गले से लगाने जैसा माना जाने लगा हैं । हमें जरूरत है कि ऐसी विचारधारा को बदला जाये और खेती छोड़ रहे किसानो को दुबारा मुख्यधारा में लाया जाये ।हम ऐसा तभी कर सकते है जब हम जल संरक्षण को लेकर तेजी से काम करना शुरू कर दे । हमारे देश की सरकार इस तरफ कब सोचेगी यह तो कहना मुशकिल है लेकिन समाज में अपनी जिम्मेदारीये को समझने वाले लोग इस दिशा में दशकों से काम कर रहे है। राजस्थान के राजेन्द्र सिंह भी उन लोगो में से एक है जो जल सरक्षण को अपने जीवन का मकसद मानकर इस दिशा में काम कर रहे हैं। इन्होने जल संरक्षण से राजस्थान की मर चुकी 7 नदीयो को जिदां किया हैं साथ ही 1000 गांवो में दुबारा पानी को पहुंचाया है। इनके काम को देखते है हुए इन्हें कई अंतराष्ट्रीय मंचो पर सम्मानित किया जा चुका हैं। बहरहाल ,हमें जरूरत है कि सरकार ऐसे लोगो को एक मंच प्रदान करे जिससे ये  लोग जल संरक्षण की चेतना को लोगो के अंदर जगाये । ये बेहद ही दुर्भाग्यपुर्ण है कि राजेन्द्र सिंह (जल मानव ) जैसे लोगो का  ईस्तमाल देश और राज्य की किसी भी सरकार ने नहीं किया । यहा यह कहना भी जायज नही है कि सरकार ने कभी अपने स्तर से जल सरंक्षण के विषय पर गंभीरता से काम किया होगा अगर किया होता तो हमारे सामने खेतो में किसानो की लटकती लाशे नहीं होती।  जैसे- जैसे वक्त बीतेगा पानी की समस्या और गहराती चली जायेगी । खतरा इस बात का भी है कि तीसरा विश्व युध्द पानी को लेकर लड़ा जा सकता है ।क्या वाकई हम इतने गैर-जिम्मेदार हो चुके है या फिर हम इतने खुदगर्ज हो गये है कि पानी जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा तो दूर कभी अकेले में बैठ कर सोचते तक नहीं है । क्या देश की सरकार केवल और केवल कंक्रिट के जंगल को खड़ा कर हम तक हर सुविधा पहुंचा सकती है ?क्या देश के किसानो और सुखे पड चुके इलाको के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी ही नहीं बची है ? अन्न पैदा करने वाले कब तक अन्न के अभाव में बिना अन्न के प्राण त्यागते रहेंगे ? हमारे विकसीत हो जाने के चाह के बीच यह भी जरूरी है कि हम अपने नींव को जड़ से मजबूत करें और राजेन्द्र सिंह (जल मानव) जैसे लोगो की संख्या समाज में बढ़े इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए वरना  वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम एक बोतल पानी के बदले एक जान लेने तक के लिए तैयार हो जाये । जल संरक्षण ही ऐसा एक मंत्र है जिससे सुखे इलाको को हरा भरा किया जा सकता है, फसले फिर से लहलहा सकती है और किसानो के घर भी ठहाको की अवाज सुनाई पड़ सकती हैं ।  


Thursday, December 10, 2015

देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में !


 देखो ,सत्ता बिक रही है बाज़ार में ।
खरीदने वालो की संख्या है हज़ार में ।।
जो सत्ता के  दुलारे है वो खड़े है एक कतार में।।
देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में ।
दुपट्टा गिरा कर सौदा करने वाले ,मगन है पैसो की अंधकार में।।
 देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में ।
गरीबो की सोचने वालो की बस्तिया है यमुना के पार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
इन्साफ करने वाले ,गिने जाने लगे है सत्ता के यार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
नेता ,अभिनेता या हो वो न्याय रक्षक ,सब डूबे है सत्ता की खुमार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
 हम ,तुम भूखे नंगे सब ,हज़म हो जाते है एक डकार में ।।
देखो सत्ता बिक रही है बाजार में ।
 खरीदने वालो की संख्या है हज़ार में ।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।।



-ऋषि राज

Tuesday, October 20, 2015

हम बिहारी शौचालय वाले !



प्रिय प्रधानमंत्री जी,
        मैं ऋषि राज पेशे से पत्रकार हूं और यह पत्र मेरे और मेरे जैसे लाखों बिहारीयों के उम्मीद की गठरी हैं। मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मुझे आपसे जवाब चाहिए ब्लकि इसलिए लिख रहा हूं कि आप गरीब लोगो कि व्यथा और परेशानी बड़े अच्छे से समझ सकते है साथ ही उस कष्ट को दूर करने के लिए कोई निर्णायक कदम ले सकें । प्रधानमंत्री जी मैं पिछले 5 साल से दिल्ली में रहता हूं । उसके पहले मैं यह नहीं जानता था कि रेल इस देश में एक विकट समस्या के रूप में हम सबके सामने उभरा है। हमारे बिहार में बहुत ज्यादा अच्छी शिक्षा और रोजगार नहीं होने के कारण अपने राज्य से लगातार पलायन करके दूसरे राज्यों में जा रहे है। हालंकि बिहार बंटने के बाद मैं झारखंड की ओर आ गया था क्योकी पिताजी वहीं नौकरी कर रहें थे लेकिन अब पापा रिटायर हो चुके है और अपना पता बिहार हो चुका हैं।बहरहाल ,यह उम्मीद की गठरी आप तक इसलिए पहुंचा रहा हुं कि अब वो दर्द सहा नहीं जा रहा है और आपसे उम्मीद भी बहुत हैं । हमारे पुरे बिहार में छठ एक  ऐसा पर्व है जिसे पूरा घर मनाता है ठीक वैसे ही जैसे आपके गुजरात में नवरात्र और गरबा के मायने हैं। इस पर्व को लोग मनाने के लिए देश –विदेश से छुट्टी लेकर घर वापस जाते है और इस 4 दिन के पर्व में अपना सबकुछ देने को तैयार रहते हैं।  घर लौटने वालों में एक बड़ी संख्या मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की होती है । ये लोग ट्रेन में कंर्फम टिकट खरीदने तक की हैसियत नहीं रखते क्योकी जो भी दो पैसे बच जाते है उससे ये गुड्डु  ,पिंकी, पिंकी की मां और पिंकी के दादा-दादी को सस्ते नये कपड़े दिलाने की कोशिश करते हैं। ये लोग छठ पर्व के शुरू होने से तकरीबन 7 दिन पहले घर लौटने लगते हैं। चुकि लौटने वाले हम बिहारीयो की संख्या हजारों में होती है तो हम लोगो को अनेक असुविधाओ का सामना करना पड़ता है।सबसे पहले हमें जनरल डब्बे में चढ़ने के लिए घंटो पहले लाईन में लगना पड़ता है और वहां मौजूद पुलिस वाले हम पर जी भर के लाठी बरसाते है । वो लाठी चलाते वक्त यह भी नहीं देखते की उनकी लाठी किस पर और कहां पड़ रही है। वो हमें रिफ्यूजी या एक ऐसा हिस्सा मानते है जो समाज पर बोझ है लेकिन हम लोग किसी पर बोझ न बने इसीलिए तो अपने घर –बार के मोह को छोड़ कर दूसरे राज्यो में नौकरी करने आ गये । ट्रेन में चढ़ने के लिए हमें केवले दरवाजा नहीं ब्लकि खिड़कियों का भी इस्तमाल करना पड़ता हैं। हमें कोई सीट की उम्मीद नहीं होती हम लोग तो ट्रेन के फर्स पर बैठ कर भी जा सकते है । मौजूदा हालात में हम लोग और हमारे घर की मां –बहने तो  18-19 घंटे  बिना कुछ खाये ट्रेन के शौचालय में बैठ कर चले हैं। क्या हम एक बेहतर हालात में अपने घर जाने के भी हकदार नहीं है। आप सोचिए सर, शौचालय में बैठकर जाना और उससे पहले ट्रेन में चढ़ने के बैचेनी में सिपाहीयों की लाठी क्या यह उचित है । आप तो पूरे भारत को अपना मानते है ऐसे में लाठी मारने वाले से लेकर लाठी खाने और शौचालय में बैठ कर जाने वाली मां-बहन भी आपके हुए ।क्या आप उन्हें एक बेहतर हालात नहीं दे सकते । सर , हम लोगो के लिए छठ सब कुछ है इसबार छठ में घर जाने के लिए कुछ बेहतर इंतजाम करवा दिजिए ।
ऐसा नही है कि मैं आपसे केवल सवाल कर रहा हूं मैं आपको सुझाव भी देना चाहता हूं ।आपसे निवदेन है कि टिकट कंर्फम देने की प्रतिबध्ता के बीच छठ पर्व से कुछ दिन पहले 4-5 ट्रेन ऐसी चलावायी जाए जिसमे केवल जनरल डिब्बे हो । इससे लोगो को एक सहुलियत यह मिलेगी कि उन्हें शौचालय में बैठ कर जाने के लिए मजबूर नहीं होना होगा ।
मैं अपनी और लाखों बिहारीयों की उम्मीद की गठरी आपको भेज रहा हूं कि इस उम्मीद के साथ कि आप हमारे दिक्कतों को समझ कर हमें इस बार शौचालय में बैठ कर घर नहीं जाने देंगे । और सर प्लीज़-प्लीज़ कम से कम लाठी न चलाने का आदेश तो दे ही दिजीएगा बहुत जोऱ से चोट लगता है सर।
                                                        आपका उम्मीदी
                                                           बिहारी  

Friday, October 9, 2015

“भड़ास वाला पगला गया है”

भड़ास वाला पगला गया है यह शब्द मेरे नहीं बल्कि एक न्यूज़ चैनल में काम करने वाले मेरे मित्र के हैं। मैंने जैसे ही उनको यह बताया कि भड़ास4 मीडिया वालो ने एक अख
बार के घटिया पत्रकारिता की  पीडित महीला के समर्थन में आकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक आयोजन किया है यह शब्द उनके मुख से निकल पड़े । खैर, भड़ास वालो के अंदर हिम्मत तो है इसमें कोई श़क नहीं हैं। एक अखबार की घटिया पत्रकारिता के कारण कैसे एक महिला के आत्मसम्मान को तार-तार कर दिया गया और जब उस महिला ने इस घटिया पत्रकारिता के खिलाफ शिकायत की तो उन्हें इंसाफ और माफी के जगह लगातार एक तरफ़ा रिपोर्टिंग का शिकार होना पड़ा । उस महिला के पक्ष में खड़े होकर भड़ास नें पत्रकारिता के रूतबे को गिरने से रोका भी और  प्रेस क्लब में प्रेस के खिलाफ आयोजन कर एक नया उदाहरण भी पेश कर दिया ।  मौजूदा दौर की पत्रकारिता का स्तर जितनी तेजी से गिर रहा है उसे लेकर वरिष्ठ पत्रकारों से ज्यादा नये युवा पत्रकारों को चिंतित होना चाहिए क्योकी उनका पूरा भविष्य दांव पर लगा हैं । भड़ास वालों ने इस आयोजन में मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के पुर्व न्यायधीश और  प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू  को  बनाया था । सब ने पत्रकारिता पर अपनी राय रखी जिसके बाद काटजू जी अपनी बात रखने मंच पर आये । काटजू को सुनना बेहद सुखद पल था क्योकी वह जिस बेबाकी से वह अपनी राय रखते है, आपको शायद ही कोई इतना चर्चित शख्स मिले जो समाज, राजनीति,न्यापालिका के बारे में अपनी मुखर राय रखता हो । काटजू ने पत्रकारिता पर अपनी राय रखते हुए कहा कि  कुछ पत्रकारों,  मीडिया मालिको और नेताओं के गठजोड़ ने पूरी पत्रकारीता को बदनाम कर दिया है । पत्रकारों को अपना घर भी चलाना और अपनी साख भी बचानी है ऐसे में उसकी मजबूरी हो जाती है कि वह अपने मालिक की जी हूजुरी करें वहीं काटजू ने सट्रिंगर्स के हालत पर भी चिंता जताई । काटजू ने गिरते स्तर की पत्रकारिता से लेकर भारत में बदलाव तक की बात कहीं। उन्होनें गरीबों के  जीवन स्तर को सुधारने पर जोर देते हुए कहा की जब तक देश के गरीबों का जीवन स्तर नहीं बदलेगा तब तक किसी भी प्रकार की प्रगती बैमानी है । उन्होंने एक टीवी चैनल पर कहे गए बात को दोहरते हुए देश के ज्यादातर नेताओं को धूर्त और फांसी पर लटकाने की बात  कही। काटजू अपने बातों के पक्ष में कई तर्क भी देते हुए दिखे । जब पत्रकारीता की बात खत्म हुई तो काटजू ने गांधी और बोस को ऐजेंट कहने को लेकर तर्क दिए । उन्होंने क्रांति आने की बात तो बार- बार कही लेकिन उसका रूप रेखा नहीं बताया ,हालांकि उन्होंने गोरिल्ला वार का जिक्र जरूर किया । न्यायपालिका को लेकर भी काटजू की राय कुछ अच्छी नहीं है । वो सुस्त न्याय व्यवस्था को लेकर बेहद दुखी और निराश नजर आये । जब मांस को लेकर बात शुरू हुई तो उन्होनें कई किस्से भी बताये और साथ ही जिन्ना तक को पोर्क खाना वाला कह दिया । 
प्रशनकाल के वक्त कई लोगों ने काटजू से सवाल पूछा । शुरू में कुछ लोगो ने उनसे ताकतवार लोगों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ने को लेकर जब राय मांगी तो उन्होंने कहा कि एक मामूली आदमी शेर से लड़ेगा तो शेर उसे तो  चीर देगा । मुझे यह बात एक रूप में अच्छी लगी की वो कड़वी घुटी लोगों को दे रहे हैं लेकिन एक पूर्व जज द्वारा कही गयी ये बातें मुझे सिस्टम के प्रति बेहद ही उदासीन बनाने वाली लगी। वही दूसरे प्रशन पर  कुछ लोगो ने उनसे क्रांति कैसे आएगी इसको लेकर सवाल किया तो उनका जवाब थी कि क्रांति तो आएगी  लेकिन कब और कैसे यह तय नहीं है । मुझे इस सवाल को सुनने के बाद ऐसा लगा की हम लोगो के अंदर एक बुरी आदत यह भी है कि यदि हमें कोई  अंधेरे में रोशनी दिखाता है तो हम सब कुछ उस रोशनी दिखाने वाले से उम्मीद करने लगते है और अपने लिए नये रास्ते बनाने के जगह उसके पीछे चलना चाहते है जो बेहद खेदजनक हैं। 
इन सब के बावजुद एक सिस्टम के अंदर काम करते रहने के बाद भी अपने क्षेत्र के काम की आलोचना करने वाले पत्रकारों ने इस आयोजन में  बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और ऐसे लोगों को एक धागे में बांधने के लिए भड़ास4 मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह जिसे आप मीडिया के सरदार खान के रूप में भी देख सकते है उनकी प्रशंसा तो करनी ही चाहिए ।           

Tuesday, October 6, 2015

आत्मघाती : द सपोर्टर


मुझे मालूम है कि आप आत्मघाती शब्द सुन कर थोड़े घबरा से गये होंगे लेकिन मेरा मकसद आपको परेशान करने का बिल्कुल भी नहीं है। मैने इस शब्द को सोच समझ कर ईस्तमाल किया है । आज के मौजूदा दौर में कोई भी राजनीतिक दल हो आपको सोशल मीडिया पर उनके समर्थक दिख जाएंगे । वो हर तरह से अपने  पसंदीदा पार्टी का समर्थन करते है और साथ ही केवल और केवल उनके दिमाग में अपनी पार्टी के तारिफ के अलावा कुछ भी नहीं होता है । अगर आप इनके पसंदीदा पार्टी के विरोध में कुछ लिख दे तो ये जी-जान से उसके बचाव में और आपके खिलाफ गोलबंद हो जाते हैं। ये सही-गलत नहीं केवल अपने पार्टी का हीत देखते है । उनके लिए देश की उन्नती, लाभ ये ज्यादा जरूरी पार्टी के पक्ष को मजबूत करना है  इसलिए मैने ऐसे लोगो के लिए आत्मघाती शब्द का उपयोग है । हो सकता है कि मेरे विचार से आपका मत अलग हो लेकिन मैं आप पर आपके विचार बदलने का दबाव तो नही बना सकता लेकिन हम तर्क कर सकते है अगर वह त्थय पर आधारित हो।
ये जो सोशल मीडिया पर या वास्तविक दुनिया में किसी दल के समर्थक होते है वो सबकुछ भूल कर केवल अपने तर्क को मजबूत करते है चाहे उन्हें कुतर्क का ही सहारा लेना पड़ जाये । मेरे दिल में अक्सर ये  सवाल उठता है कि ये जो मोदी सरकार के समर्थक है उन्हें महंगी दाल , प्याज, बोर्डर पर मरते फौजी, फसल पर न्युनतम समर्थन मूल्य 50 प्रतिशन न बढ़ना,बात –बात पर यु-टर्न लेना, ललित गेट, व्यापम, चावल घोटाला, पार्टी अध्यक्ष का कैमरे पर घूस लेते पकड़ा जाना, मूजफ्फरनगर दंगे में पार्टी के लोगो की संदिग्द भूमिका, मरते किसान ,प्रधानमंत्री की चुप्पी , मोदी की  विदेश यात्रा का मीडिया का महीमामंडन करना क्यो नहीं दिखता है ? क्या वे ये सब जानबूझ कर रहे है, क्या उन्हें इससे कोई फायदा हो रहा है?
बात कांग्रेस की भी करें तो इनके समर्थक क्यो नहीं पुछते कि सब –कुछ गांधी परिवार के आस-पास ही क्यों घुमता हैं , क्या उन्हें कोलगेट, 2जी जैसे घोटाले नहीं चुभते, क्यो ये लोग राहुल गांधी के गुप्त यात्रा पर सवाल नहीं उठाते ,क्यो से सवाल नहीं करते कि सबसे ज्यादा राज करने वालो की पार्टी देश के इस हाल की जिम्मेदारी क्यो नहीं लेती ?
 केजरावाल के समर्थक हो,या फिर लालू, नीतिश ,आखिलेश ,ममता के ये लोग कैसे हे जो अपने पसंदीदा नेताओं के खिलाफ ना कुछ सुनना चाहते है और ना सवाल करके किसी की जवाबदेही तय करना चाहते है ? क्या ऐसे लोग देश के हीत में काम कर रहे हैं, क्या इनका चुप रहना देश को आगे ले जाऐगा या फिर ये अपने सुविधा अनुसार सब कुछ तय कर के बैठे है कि खुद भी न कुछ पुछेंगे और जो पुछेगा उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि वो सब कुछ भूल कर अपना दामन साफ करने में उलझ जाएंगे ?
ये कैसे समर्थक है जो अपने ही देश के लोकतंत्र के ढांचे को धवस्त करना चाहते है , ये लोग क्या आत्मघाती नही है?  अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी या नेता का समर्थक है तो क्या वो किसी से सवाल नही कर सकता है?
हम ऐसे अनियंत्रित लोगो के चंगुल में फंसते जा रहा जो एक दिन  हमें अपना समर्थक बना लेगे या फिर अपने झुठ और सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर देने का आडंबर कर हमें कुचल देंगे ।  खैर ,मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि देश को ऐसे आत्मघातियो से मुक्त किया जाये । इसके लिए हमें अपने पीठ पर ढाल लगाने की जरूरत है क्योकि ऐसे लोग कायर होते है कभी भी सामने से नहीं बल्कि पीछे से पीठ पर वार कर के हमें अपने जद में लेना चाहते है , तो क्या आप इस जंग के लिए तैयार है ?