Saturday, July 11, 2015

सच्चर कमेटी के उस पार....










भारत में अक्सर मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक हालत को लेकर बहस होती है. मुसलमानों की आर्थिक हालत को जानने के लिए बनी सच्चर कमेटी ने भी मुसलमानों के पिछड़ेपन का जिक्र किया था.जिसके बाद समय - समय पर  सच्चर कमेटी  की रिपोर्ट राजनीति में वोट बैंक के तौर पर इस्तमाल की जाती रही हैं।  सच्चर कमेटी ने अपने रिपोर्ट में यह बताया था की देश के मुसलमानों के हालत बेहद खराब हW।

   


दूसरे तरफ मुसलमानों की सरकारी तंत्र के उच्च पदों या अहम विभागों में भागीदारी नाम मात्र के लिए हैं ।सुरक्षा एंजेसी रॉ और आईबी में मुसलमानों की नियुक्ति ही नहीं होती । हांलकि ऐसा कभी किसी सरकार द्बारा घोषित रूप से कुछ कहा नहीं गया है लेकिन फिर भी मुसलमानों की भागीदारी ना होने पर ये सवाल लगातार उठते रहें कि देश की सरकार अपने ही देश के एक समुदाय के प्रति इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं। बहरहाल हम इस लेख में मुसलमानों के उनके ही मुल्क में बिगड़ते और हद से ज्यादा बदत्तर होते हालत के बारे में बात करने जा रहें हैं।
  सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कुल अनुशंसाएं ध्सुझाव  76
 सरकार द्वारा 72 अनुशंसाएं स्वीकृत
 3 अनुशंसाएं स्वीकृत नहीं की गई थी।
 1 अनुशंसा आस्थगित कर दी गई थी

  




केंद्र सरकार के एक सर्वे में पता चला है कि भारत में मुसलमानों का जीवनस्तर सबसे नीचे है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन यानी एनएसएसओ के एक अध्ययन श्भारत के बड़े धार्मिक समूहों में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति में पता चला है कि मुसलमानों का जीवनस्तर सबसे नीचे है
एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक मुसलमानों का औसत प्रति व्यक्ति प्रति दिन खर्च सिर्फ 32-66 रुपए है-
सिखों की हालत बेहतर
वहीं सिख समुदाय की हालत तुलनात्मक रूप से बेहतर है. सिख समुदाय में औसत प्रति व्यक्ति प्रति दिन खर्च 55-30 रुपए है.
हिंदुओं में औसत प्रति व्यक्ति प्रति दिन खर्च 37-50 रुपए और ईसाई समुदाय में औसत 51-43 रुपए प्रतिदिन है.
एनएसएसओ के इस सर्वे के मुताबिक मुसलमान ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में सबसे नीचे हैं.
मुसलमानों का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति परिवार औसत मासिक खर्च 833 रुपए है जबकि हिंदुओं के लिए ये आंकड़ा 888, ईसाइयों के लिए 1296 और सिखों के लिए 1498 हैA
वहीं शहरी इलाकों में भी मुसलमानों का प्रति परिवार औसत मासिक खर्च सबसे कम 1272 रुपए था जबकि हिंदुओं का 1797 ईसाइयों का 2053 और सिखों का 2180रुपए था A

बात मुसलमानों के रोजना आय की हो या फिर पढ़ाई की हर क्षेत्र में मुसलमान पिछड़े हुए हैं लेकिन बीते वर्षो में उनके हालात में कुछ सुधार आया हैं।  1999 से 2000 के बीच में मुसलमानों की साक्षरता दर ग्रामीण इलाकों में 52 प्रतिशत था जो वर्ष 20072008 में 63प्रतिशत हो गया । वहीं शहरी इलाकों में साक्षरता दर वर्ष 20072008 में 69 प्रतिशत था जो वर्ष 2007-2008 में 75 प्रतिशत हो गया ।
बीते वर्षो में अल्पसंखयकों को दिए जाने वाले ऋणों के आवेदन और स्वीकृत आवेदन की सूची  


सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने वाली सरकारें जब बड़ी- बड़ी दावे करती हैं तो उनकी निगाहें इन रिपोर्टों पर जाकर ठहरती नहीं होंगी अगर ठहरती तो ऐसे दावों के जगह उनकों लागू की गयी नीतियों को दूरूस्त करने पर ध्यान देना चाहिए था ।गांव हो या शहर हर जगह छोटे उम्र के मुसलमान बच्चे आपको हाथों में नट बोल्ट कसने वाले समान लिए दिख जायेंगे या किसी फैक्ट्री में निम्न स्तर पर काम करते दिख जाएंगे  , चाहे आप हैदराबाद चले जाएं या हजारीबाग़ या फिर सूरत । आखिर क्यों मुसलमानों के बच्चे देश के आईएएस ,आईआईटी जैसे और भी कई उच्च संस्थानों में उनकी भागीदारी बेहद कम क्यों है ?मुसलमान के बच्चे क्यों कम उम्र में ही पढ़ाई से ज्यादा रोजगार की तरफ बढ़े चले जाते है ? क्यों मुसलमान के बच्चे 5वीं,8वीं और 10वीं के बाद स्कूल छोड़ जाते हैं ?  जाहिर हैं जवाब कम और सवाल ज्यादा हैं लेकिन इन सब के बीच  एक बात जो सीधे तौर पर समझी जा सकती हैं वो ये कि भूखे की जरूरत रोटी है और रोटी के लिए जरूरत हैं पैसा की । सच्चर कमेटी में अपने रिपोर्ट में साफ -साफ कहा कि मुसलमानों को पढ़ाई और रोजगार देने के लिए उचित व्यावस्था कि जाये जिससे उनके बिगड़ते हालात में सुधार लाया जा सकें । सरकरी पन्नों में ऐसे कई योजनाएं सफलता पूर्वक चलाई जा रहीं हैं जिसमें मुसलमानों के बच्चों के लिए स्कोलर्शिप प्रोग्राम और रोजगार उपलब्ध या व्यवसाय करने में मदद की बात कहीं जाती रहीं हैं लेकिन सच्चाई आप सबके सामने हैं । इन सब मुद्दों के साथ एक अहम मुद्दा मुसलमानों की सुरक्षा का भी हैं । बीते महीने एक अमेरिकी रिपोर्ट में यह बात सामने आयी की मोदी की सरकार आने के बाद भारत में धार्मिक लकीरें और तल्ख हो गयी हैं। हमने अपने पिछले अंक में हरियाणा राज्य के बल्लगढ़ जिले में हुए संप्रदायिक दंगों के बारे में खबर छापी थी जहां मुलमानों ने जान जाने के भय से थाने में शरण ली थी ।वहीं यूपी के शामली से भी खबरें आयी थी कि मुलसमानों को चिन्हीत करके बस और ट्रेन से उतार कर पीटा जा रहा हैं । ये घटानएं महज उदाहरण मात्र हैं क्योंकी ऐसी घटनाएं पूरे यूपी सहित भारत में घटित हो रहीं हैं ।इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी भारत दौरे के दौरान इन बातों का जिक्र कर डाला था । जिसके बाद भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशवासियों को बार-बार सदभावना और भाईचारे का संदेश देना पड़ा लेकिन लगता हैं बात उससे भी नहीं बनी हैं । सच्चर कमेटी की सफारिशों को अगर सहीं रूप से लागू करवाया जायें और उसके लिए एक निगरानी टीम की या एक ऐसी संस्थान की स्थापना की जाये जो लगातार सच्चर कमेटी की सिफारिशों के बाद सरकार द्वारा उठाये गये कदमों को प्रभावी रूप से लागू करवाये, लोगों को जागरूक बनाये और निगरीनी भी करती रहें तो फिर कहीं ना कहीं मुसलमानें के हालात में तेजी से बदलाव लाया जा सकता हैं और पीएम मोदी की वो बात भी सच हो सकती है कि एक हाथ में कुरान और दूसरे में कम्पयूटर ।