जय जवान और जय किसान, ये नारा तो हम सब जानते है कि किसने दिया है लेकिन अब ये एक सवाल भी है कि क्या अब भी जय किसान है , अगर है तो जो लोग कह रहे है कि इस देश में अब भी किसान की जय है तो फिर सवाल ये है कि उनपर गोली क्यों चलाई गई, मध्यप्रदेश की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय है कि शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार ने किसानो पर गोली चलवा दी और 5 लोगों की जान चली गई. पहले तो पुलिस और सरकार ने किसी तरह की गोली चलाए जाने के आदेश से इनकार किया लेकिन आईजी ने बाद में माना की पुलिस ने गोली चलाई है . ये देश का दुर्भाग्य है कि जो अन्नदाता इस देश का मतदाता भी है उसके हालत पर कोई गंभीर नहीं है.गंभीरता होती तो आप खुद सोचिए की कैसे जिस राज्य के किसान सड़कों पर है उस राज्य को 3 साल लगातार कृषि रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जाता रहा... डॉ. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नवंबर 2004 को 'नेशनल कमीशन ऑन फारमर्स' बना था. दो सालों में इस कमेटी ने 6 रिपोर्ट तैयार की. इन रिपोर्ट्स में तेज और समावेशी विकास की खातिर सुझाव दिए गए थे. फ़सल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले. किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाएं. गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए. महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं. किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके. 28 फीसदी भारतीय परिवार ग़रीब रेखा से नीचे रह रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का इंतज़ाम करने की सिफारिश आयोग ने की लेकिन नतीजा क्या है आप देख सकते है. विभिन्न बैंकों से देशभर के किसान कितना कर्ज लिए, इस पर 30 सितंबर 2016 को अंतिम आंकड़ा जारी किया गया था, जिसके मुताबिक देश के 10 बड़े कर्जदार राज्यों में उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है। प्रदेश के 79,08,100 किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। किसान कर्जदार परिवारों में जहां महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है, वहीं राजस्थान तीसरे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में चार अप्रैल को प्रदेश के 86 लाख लघु और सीमांत किसानों को कर्जमाफी का तोहफा दिया था। लेकिन सरकार के इस फैसले के दो महीना पूरा होने के बाद कर्जमाफी की आस लगाए किसानों को निराशा होने लगी है। किसानों को उम्मीद थी कि कर्जमाफी होने पर एक तरफ जहां उन्हें कर्ज से छुटकारा मिलेगा, वहीं उन्होंने कर्ज की जो एक-दो किश्त जमा की हैं, उसका पैसा वापस मिलेगा। कर्जमाफी की जानकारी लेने के लिए प्रदेशभर के किसान संबंधित बैंकों का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन बैंक की तरफ से उनको कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। साल 2012-13 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के अनुसार, पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18,059 रुपये थी. इसके बाद हरियाणा के किसानों का नंबर आता है. उनकी मासिक आमदनी 14, 434 रुपये थी. सबसे कम बिहार के किसानों की मासिक आमदनी थी, 3,588 रुपये. इस सर्वे के मुताबिक , भारत के किसानों की औसत मासिक आमदनी होती है, मात्र 6, 426 रुपये. मध्यप्रदेश में प्रदर्शन कर रहे किसानों की मांग है कि उनके फसलों के उचित दाम तय किए जाएं, कर्ज माफ हो,मंडी शुल्क वापस हो फसलों के समर्थन मुल्य बढ़ाए जाएं...15 साल से मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है....ऐसे में वहां के किसानों के हालात इतने बुरे है तो इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाए, मध्यप्रदेश के मंदसौर जहां किसानो पर गोली चलाई गई वहां के किसानों का कहना है कि कश्मीर में पत्थरबाजी करने वालों पर पैलट गल और रबर बुलेट का इस्तेमाल होता है जबकि देश के किसानों पर पुलिस सीधे गोली चलाती है, ये दोहरा मापदंड नहीं है तो क्या है...मिनीमम सपोर्ट प्राइस पर मोदी सरकार क्यों कुछ नहीं बोल रही है, ये कब तक हो पाएगा , क्या स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशे सिर्फ बाते करने के लिए ही सीमित है या फिर उसे लागू भी किया जाएगा, किसानो का आरोप है कि सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है कि वो किसानों के ज्यादा फसल का सहीं दाम दिलवा पाएं या उत्पाद कम होने पर उसकी मदद की जा सकें....तो देश के अन्नदाता के लिए खेतों में मौत की फसल उपज रही है ,ये वाकई डरावना है की पहले जो पार्टी और उसके समर्थक किसानो के लेकर बड़ी बड़ी बातें करती थी वो सत्ता में आने के बाद क्यों भूल गए है ? क्यों अब केंद्र कद फैसलों की आलोचना नही होती जबकि असल सवाल तो ये है किसानों को लेकर इस सरकार ने कुछ भी ठोस किया है तो वो कहा है ? शिवराज सिंह चौहान किसानों के लिए उपवास करते है इसका मतलब क्या है ? क्या वो अपनी गलती मानते है ? अगर उनकी गलती है तो कार्रवाई क्यों नही होनी चाहिए ? देश के मौजूदा माहौल में ज्यादा सवाल पूछना भी ठीक नही लगता, कब कौन आपकी देशभक्ति को सवालों के घेरे में ले आये ये कौन जानता है ? आप खुद से पूछिए की जब कांग्रेस के वक़्त आप सवाल करते थे तो क्या आपकी देशभक्ति जांची जाती थी ? बीजेपी विपक्ष में थी तो पॉलिसी पैरालाइसिस का आरोप कांग्रेस पर लगती थी लेकिन मौजूदा बीजेपी सरकार की पॉलिसी क्या है ? विदेश मंत्री, विदेश मंत्रालय लगातार ये कहता है कि पीएम मोदी पाकिस्तानी पीएम से नही मिलेंगे लेकिन होता ठीक उसके उलट है । 2 दिन में 2 बार मुलाकात होती है । देश मे कहा जाता है कि आतंक और क्रिकेट एक साथ नही चल सकता , पाकिस्तान जब तक आतंकियों को भेजना बन्द नही करेगा तब तक बात नही होगी । तो सवाल ये है कि पीएम ने क्यों मुलाकात की ? भारत सरकार का पाकिस्तान को लेकर स्टैंड क्या है ? आप खुद सोचिए ,क्या ये सवाल आपके मन मे नही उठते ,अगर नही तो क्यों नहीं और अगर उठते है तो फिर इसका जवाब तलाशिए । कुल मिलाकर मेरी जो समझ है जिससे मुझे तो यही लगता है मोदी सरकार और मनमोहन सरकार में कुछ ज्यादा अंतर नही है ।।।।
दिल कि लिखें तो कहां लिखें ...यहां लिखें कि वहां लिखें ..हमारी कलम में अगर हो स्याही किसी और की, तो फिर लिखें तो क्या लिखें।
Friday, June 9, 2017
Tuesday, March 14, 2017
यूपी में बीजेपी के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां ?
यूपी को नया सियासी
सवेरा मिल चुका है, प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई बीजेपी यूं तो जश्न में डूबी
है लेकिन अंदरखाने बेचैनी सत्ता को संभालने को लेकर है, ये कहने के पीछे कारण भी
है क्योंकि बीजेपी को उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में साफ बहुमत मिला तो वहीं गोवा
और मणिपुर में बीजेपी बहुमत के मामले में पीछे रह गई, लेकिन जहां बहुमत नहीं मिला
वहां के सीएम का चेहरा तय कर दिया गया, गोवा में तो मनोहर पर्रिकर ने शपथ तक ले ली
लेकिन बीजेपी ये कमाल उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में नहीं दिखा पाई, हम बात उत्तरप्रदेश में बीजेपी को मिले बहुमत पर करेंगे और ये समझने की कोशिश करेंगे की
बीजेपी के सामने कौन कौन सी और कैसी चुनौतियां हैं . सबसे पहले बात यूपी में बीजेपी
के सीएम चेहरे की करें तो पूर्व सीएम और केंद्र में मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह की
चर्चा सबसे ज्यादा है . लेकिन खबर ये भी है कि राजनाथ यूपी की कमान नहीं चाहते, ऐसा
करने के पीछे दो कारण हैं पहला तो ये की वो केंद्र की राजनीति में खुद को ज्यादा
फिट पाते हैं और दूसरा ये कि अगर वो खुद यूपी की कमान संभालेंगे तो फिर
नवनिर्वाचित विधायक पंकज सिंह जो गृहमंत्री के बेटे हैं उनको कैबिनेट में जगह दे
पाना बेहद मुश्किल होगा .. इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती, केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा, यूपी बीजेपी के
प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, हिन्दुत्व के पोस्टर बॉय योगी आदित्यनाथ, अमित
शाह के करीबी और संघ के नेता स्वतंत्र देव सिंह से लेकर मथुरा सीट से चुनाव जीते
श्रीकांत शर्मा, इलाहाबाद पश्चिम से चुनाव जीतकर आए पूर्व पीएम लाल बहादुर
शास्त्री के नाती सिद्धार्थनाथ सिंह के नामों की
चर्चा यूपी के बाजार में सीएम की कुर्सी के लिए गर्म है,....हर नाम की अपनी खूबी
है ऐसे में पार्टी किस पर दांव लगाती है ये बड़ा दिलचस्प होगा ?
जाहिर है यूपी में
जो प्रचंड बहुमत बीजेपी को मिला है उसको लेकर पार्टी के उपर खासा दबाव भी है कि उस
बहुमत को कैसे संभाला जाए और साथ ही पार्टी में भी एकजुटता बनाई रखी जाए..पार्टी
ऐसे नेता को समाने लेकर आना चाहती है जिसको लेकर सर्वसहमति हो साथ ही वो अच्छा
प्रशासक भी हो...वहीं सीएम की बात से आगे बढ़े तो बीजेपी के सामने कई और चुनौतियां
है जैसे कि चुनाव के वक्त सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों की
कर्ज माफी से लेकर, बूचड़खानों पर तालेबंदी की बात कही हो या फिर सभी कॉलेज, यूनिवर्सिटी में फ्री वाई-फाई का वादा
हो, फ्री लैपटॉप के साथ 1 जीबी डाटा, 24 घंटे बिजली, 15 मिनट में आपके दरवाजे पर पुलिस, राम
मंदिर, तीन
तलाक और एंटी रोमियो दल जैसे मुद्दे बीजेपी के लिए खासा परेशानी का सबब बन सकते हैं
लेकिन एक चुनौती बीजेपी के सामने इस बात की भी है कि वो अपने कद्दावर नेता और देश
के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों की लाज रखे, क्योंकि यूपी में चुनाव के
वक्त बीजेपी के लिए पीएम मोदी ही चेहरा थे और चुनाव बाद मिले बहुमत पर बीजेपी ने
पीएम को ही केड्रिट दिया है ऐसे में पीएम मोदी की लाज रखना भी बीजेपी के विधायकों
के लिए चुनौती है.... हम ये इसलिए भी कह रहे है क्योंकि अभी यूपी में विधायकों ने
शपथ तक नहीं ली है और ऐसे में विधायकों की दबंगई की खबर सामने आने लगी है..यूपी के
हरदोई जिले की सवायजपुर विधानसभा से विधायक
बने माघवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ 'रानू' पर वहीं के पुलिस अधिकारी जो इलाके के सीओ हैं
उनको फोन पर जमकर खरी खोटी सुनाने और धमकाने का मामला सामने आया है और इस पूरे
घटनाक्रम का ऑडियों भी वायरल हो गया है...ऐसे में सवाल है कि जो नेता चुनाव से
पहले पीएम मोदी के नारों पर दम भरा करते थे वहीं नेता चुनाव के बाद पीएम मोदी की
बातों का लाज लिहाज भूल गए है..
Tuesday, February 14, 2017
उत्तराखंड वालों वोट देना दिल नहीं !
कितने
दागी है नेता जी ?
उत्तराखंड चुनाव में
कुल 70 सीटों पर 637 प्रत्याशी है.
70 सीटों पर 637 प्रत्याशी में से 91 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।जबकि 54 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। 5
उम्मीदवारों के ऊपर हत्या , दूसरे 5 उम्मीदवारों के उपर हत्या की कोशिश का आरोप
है. वहीं अन्य 5 उम्मीदवारों के ऊपर महिलाओं से
अत्याचार के भी आरोप है.
किस
पार्टी के पास कितने दागी ?
अगर
दागी उम्मीदवारों को पार्टी के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी के 70 उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवार दागी है.
वही कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 17 उम्मीदवार दागी है. बीएसपी के 69 में से 7 उम्मीदवार दागी है.यूकेडी के 55 में से 4 उम्मीदवार दागी है सपा के 20 में से 2 उम्मीदवार दागी है. जबकि 261 निर्दलीयों में से 32 उम्मीदवारों के दामन पर दाग है.
किस
पार्टी से कितने गंभीर आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशी
वहीं
गंभीर आरोपों की बात करें तो बीजेपी के 70
उम्मीदवारों में से 10 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले
दर्ज हैं वहीं कांग्रेस के 70
उम्मीदवारों में से 12 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले
दर्ज हैं. बीएसपी के 69 उम्मीदवारों में से 06 ,यूकेडी के 55 उम्मीदवारों में से 3 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले
दर्ज हैं तो वही एसपी के 20 उम्मीदवारों में से 2 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले
हैं और 261 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 14 उम्मीदवारों पर संगीन धाराओं में
मामला दर्ज है.आपको बता दें कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 में 10 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजनीतिक दलों के तरफ से हर सीट पर
कम से कम 3 उम्मीदवार आपराधिक छवि वाले उतारे गए
है.
कितने अमीर है नेता
जी ?
उत्तराखंड
में इस बार 637 उम्मीदवारों
में से दो सौ से ज्यादा करोड़पति उम्मीदवार
हैं, जबकि 78 उम्मीदवारों
ने अपने आय का ब्यौरा नहीं दिया है. कांग्रेस
के 70 उम्मीदवारों में 52 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीजेपी के 48 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीएसपी के 69 उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवारों की सम्पत्ति एक करोड़ से
ज्यादा की है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार की औसत सम्पत्ति 1.57 करोड़ के आस-पास है। जबकि महिला उम्मीदवार चुनाव में पिछली
बार 60 थी। इस बार कुल 28 महिलाएं ही चुनाव ऐ जंग में मोर्चा संभालने आयी हैं।
इस लेख को आप सहेज कर रख लीजिए औऱ जिन दिन कोई नेता उत्तराखंड में नौतिकता की बड़ी बड़ी बातें करें तो उसे आप ये पढ़ कर सुना दिजिएगा...
मन भारी है इसलिए ज्य़ादा कुछ लिख नहीं पा रहा हूं लेकिन उत्तराखंड ंमें कोई भी जीते हारना जनता को ही है .उत्तराखंड की जनता चाहे जिसे वोट दे लेकिन दिल किसी को न दें...क्योंकि दिल तो बना ही है टूटने के लिए...नेता आपसे कुछ भी कहे लेकिन याद रखना ना ही आपके डॉक्टरों के आभाव से जुझने वाले सामुदायिक अस्पतालों के हालात बदलेंगे, न जोशीमठ में सड़कों की हालात दुरुस्त होगी.. और न ही वो टिहरी की डोबरा चांटी पुल का अधुरा काम पूरा होगा.....
Friday, December 9, 2016
तो क्या नोटबंदी की सच्चाई पर मिट्टी डाल रही है सरकार ?
नोटबंदी का फैसला कितनी दूर तक मार करेगा
ये कहना अभी थोड़ी जल्दबाजी होगी लेकिन मौजूदा सिस्टम के हालात को देखकर ये तो जरूर
कहा ही जा सकता है कि नोटबंदी से आम जनता खुश तो है लेकिन व्यवस्था से भरपूर नाराज़
। कहीं 5 दिन बाद किसी एटीएम
में पैसे आ रहे है तो कहीं पैसों के दर्शन ही दुर्लभ है क्योंकि एटीएम इतने दूर के
इलाके में है कि रोज उसमें पैसे डाले नहीं जा सकते ।बात देश के किसी भी राज्य की
क्यों न हो हालात तो सबके एक जैसे ही है । आप अपने हिसाब से किसी राज्य का सैंपल
तो ले सकते है लेकिन लापरवाह सिस्टम के हालात एक जैसे ही होंगे । नोटबंदी के बाद
बीते दिनों हमारा झारखंड जाना हुआ था । शहर के हाल जितने खराब है उससे कही ज्यादा बुरा
हाल ग्रामीण इलाकों का है। वहा 1 से 2 लाख की आबादी पर 1 बैंक है ।आप जरा अंदाजा लगाइये ही हर रोज
अगर बैंक के बाहर 5 हज़ार लोग खड़े हो तो कैसा मंजर होगा । क्या आपको डर नहीं लगेगा ? बैंक में काम करने
वाले कर्मचारी किस दबाव में काम कर रहे होंगे इस बात का आप अंदाजा लगा सकते है ।
वहा की पुलिस पर कैसा दबाव होगा आप इस बात का भी अंदाजा लगा सकते है कि कैसे 10 से 20 पुलिस वालों को
हज़ारों की भीड़ को संभालना पड़ेगा । क्या पीएम ने नोटबंदी का फैसला लागू करने से
पहले ऐसी परिस्थितियां होंगी ये सोचा था ? अगर सोचा तो फिर व्यवस्था क्यों नहीं हो
पाई ,और इन अव्यवस्थाओं
का जिम्मेदार कौन है ? अगर सोचा नहीं तो फिर जिस ग्रामीण क्षेत्र ने पीएम को आपार
समर्थन दिया उसका ख्याल पीएम को क्यों नहीं आया? झारखंड जाने के बाद हमारी मुलाकात हमारे
परिचित पवन जी से हुई जिनकी शादी थी ।शादी के घरों के खर्चे का अंदाजा तो आप
सबको होगा ऐसे में आप उनके हालत को बखूबी समझ भी सकते है । हमने उनसे उस दौरान बात
भी की और उनके तकलीफ को समझने की कोशिश भी की ।
बहरहाल , हम वापस लौट कर सत्ता के गलियारे दिल्ली की बात करते है ।जहाँ सत्ता को चलानेवालो से लेकर सत्ता की दलाली खाने वालों का अड्डा होता है ।नोटबंदी के फैसले पर पीएम ने देश से 50 दिन मांगे थे और लोगों ने पीएम की इस अपील को स्वीकार भी किया । पीएम ने कहा कि इस फैसले को टॉप सीक्रेट के तौर पर लागू किया गया ताकि चोरो को इसकी भनक नहीं लग पाएं । अब सवाल यही से खड़ा होता है कि क्या ये वाकई सीक्रेट था या बीजेपी को इसकी जानकारी थी ? क्योंकि नजर डाला जाएं तो 6 नवम्बर को बीजेपी के एक नेता संजीव कंबोज ने ट्वीट करते हुए कहा कि rbi जल्द 2 हजार के नोट लागू करेगी । साथ में उन्होंने तस्वीर भी साझा की ।
इतना ही नहीं नोटबंदी के बाद 2000 के नए नोटों की खेप
गुजरात से लेकर बंगलोर और मनाली तक में पकडे गये और इनके पास नए नोटों की खेप
लाखों से लेकर करोडों तक में थी ।हाल में ही में बीजेपी नेता मनीष और कोल माफिया के पास से 33 लाख के नए नोट जब्त हुए,लेकिन देखा जाये तो
सरकार ने देश की किसी आम नागरिक को 1 हफ्ते में 24 से ज्यादा निकालने की अनुमति दी ही नहीं
है। गोवा में 1.5 करोड़ और तमिलनाडु के सीएम पनीरसेल्वम के करीबी के पास से 70 करोड़ और 100 किलो सोना का पकड़ा
जाना क्या बताता है । इसके दो पहलू है कि इस देश का एक सिस्टम तो चोरी करने में
मदद कर रहा है तो दूसरा उसे दबोच भी रहा है । बिज़नस क्लास से लेकर दूतावास तक
हफ़्ते में 50 हज़ार से ज्यादा निकासी नहीं कर सकते ।शादी वालो को 2.5 लाख का प्रवधान दिया
गया है लेकिन नियम ऐसे की आप उसे पूरा ही नहीं कर पाएं । सरकार ने शादी का पैसा
उसे ही कैश में देने की अनुमति दी है जो साबित करें की उन्हें जिन्हें पैसा देना
है उसके पास खाता नहीं है । सरकार ने 8 नवम्बर नोटबंदी के एलान के बाद से अपने फैसले में छोटे बड़े कुल 27 बदलाव किये है ,लेकिन सवाल नियमों
में बदलाव से ज्यादा उस व्यवस्था को लेकर है जिसमे भेदभाव नजर आ रहा है ।बिहार के
ही एक पत्रकार ने ये खुलासा किया कि बीजेपी ने बिहार में बड़ी मात्रा में नोटबंदी
से पहले कैश देकर जमीनों की खरीद की ,फ़िलहाल खुलासे के बाद से जांच के आदेश हुए
है । बीजेपी नेता के पास से नए नोटों की खेप हो या नोटबंदी की पहले से ही जानकारी
क्या ये संयोग मात्र है ?गौर किया जाए तो कालाधन की बात करते करते अब सारी की सारी
डिबेट कैशलेश इकॉनमी पर हो रही है ? नोटबंदी से कालाधन सरकार के खाते में नहीं
आता देख सरकार ने 50-50 स्कीम के तहत अपना काला धन वैध कर सकते है यानि वाइट मनी में
कन्वर्ट कर सकते है । कैशलेस इकॉनमी का जो मॉडल कालेधन के खिलाफ बनाने की कोशिश हो रही है वो कितना सटीक बैठता है इसका तो बाद
में पता चलेगा लेकिन सवाल तो ये है कि क्या हम वाकई कैशलेस इकॉनमी में फिट बैठते
है ? क्या कैशलेस होने से
हमारे देश में टैक्स की चोरी रुक जाएगी ?क्या कैशलेस लेनदेन में काला बाजारी नहीं
होगी ? तो फिर इसका जवाब भी
सुन लीजिए,जी नहीं । कैशलेस
लेनदेन में चोरी करना बड़ी मछलियों के लिए और भी आसान होगा और बैंको को जो फायदा
होगा, ऑनलाइन पेमेंट करने
वाली कंपनयियों को फायदा होगा वो तो होगा ही । अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ की सालाना टैक्स चोरी होती है. जिस तरह भारत
में आयकर विभाग है, उसी तरह अमेरिका के
इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है, जिसके अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल
औसतन 458 अरब डॉलर की टैक्स चोरी हुई है. अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही
हिसाब लगाया है तो अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो
जाती है. यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेस का ऐसा प्रचार किया जा रहा है, जैसे यह हींग की गोली है, जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मी को दूर कर
देगी. फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी
होती है. 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ रहता है.
वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल
पाता है. यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है. ब्रिटेन
में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है. भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़
की चोरी. जापान की नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल
13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है. भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी
होती है. 1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है.मान लीजिए कि पूरी
आबादी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे
रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी. क्या यह उनके लिए मुमकिन
होगा. दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी
कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं. आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के
तकनीकी नामों वाले बहीखाते रख देंगे. लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाए, तो उसके लिए ऐसे नामों वाले बहीखाते नहीं
होते. उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूदकर जान देनी पड़ती है या ज़मीन
गिरवी रखनी पड़ती है. क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्रिब्यूनल है. 2015 में Independent
Commission for the Reform of International Corporate Taxation (ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि
अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुका है.अब बताइए, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है.
इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार 'गार्जियन'
में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है. इतने
तथ्य हैं और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए. इस
रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं, उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर
पड़ता है, क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं
पाती हैं. एक-दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं. इन मल्टीनेशनल कंपनियों की
टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोक कल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा
कम कर देती हैं.
फिलहाल सरकार जो भी
कदम उठा रही है और लोकलुभावन बातें कर रही है उनसे ये तो साफ है कि सच कुछ और है
और दिखाने की कोशिश कुछ और ही हो रही है.सरकार के हर कदम को संशय से देखने की
जरूरत इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये संशय और आपका सवाल करना एक सकारात्मक माहौल
पैदा करेगा जो मजबूत लोकतंत्र की नींव है..सरकार वक्त मांग रही है और लोग देने को
तैयार है लेकिन मौजूदा हालात में सरकार का बयान सच्चाई पर मिट्टी डाल कर उसे
छिपाने की कोशिश मालूम पड़ती है. ये सिलसिला यूं ही जारी रहेगा अगर आप ऐसे ही
मूकदर्शक बने रहेंगे और आपकी छुप्पी भी सच्चाई पर मिट्टी डालने जैसे ही होगी.
Friday, November 18, 2016
तो जनता नहीं नोटबंदी दिलाएगी दोबारा सत्ता ?
सरकार की खींची लकीर जब छोटी पड़ जाएं तो
क्या हो..जब 1000 का नोट अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन खड़ा हो जाए तो क्या हो ? 1000 के नोट के कमर को तोड़ने
के लिए पॉलिसी भी बने तो 2000 के नोट से. फिलहाल तो अर्थव्यव्स्था वाले पंडित कुछ
कहने से कतरा रहे है कि देश की व्यवस्था पर 2000 का गुलाबी नोट कौन सा रंग चढ़ाने
जा रहा है...ये रंग बलखाती गुलाबी हो गई या झंझुलाहट वाली सुर्ख लाल ये सब महज
कयास है लेकिन सच तो कुछ और ही बयां कर रहा है.जब संसद सड़क के सामने छोटी लगने
लगे तो फिर नेताओं का रास्ता जाता किधर है। सड़क के हालात बताते हैं कि 2014 के लोकसभा
चुनाव में देश के करीब 55 करोड़ लोगों ने वोट डाले लेकिन आज की तारीख में शहर दर शहर गांव
दर गांव 55 करोड़ से ज्यादा
लोग सड़क पर उस नोट को पाने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं जिसका मूल्य ना तो अनाज
से ज्यादा है और ना ही दुनिया के बाजार में डॉलर या पौंड के सामने कहीं टिकता है।
फिर भी पहले वोट और अब नोट के लिये अगर सड़क पर ही जनता को जद्दोजहद करनी है तो
क्या वोट की तर्ज पर नोट की कीमत भी अब प्रोडक्ट नहीं सरकार तय करेगी। क्योंकि
मोदी सरकार को 31 फिसदी वोट मिले। यानी खिलाफ के 69 फिसदी वोट का कोई मूल्य संसदीय राजनीति
में कोई मायने रखता ही नहीं है। ठीक इसी तरह 84 फीसदी मूल्य के नोट के खत्म होने के बाद 16 फिसदी मूल्य की
रकम महत्वपूर्ण हो गई। यानी रोजाना चार हजार रकम के खर्च करने का समाजवाद सड़क पर
आ गया। तो क्या समाजवाद के इस चेहरे के लिये देश तैयार हो चुका है या फिर जिस संसद
की पीठ पर सवार होकर लोकतंत्र का राग देश में गाया जा रहा है, पहली बार संसदीय
लोकतंत्र को ही सडक का जनतंत्र ठेंगा दिखाने की स्थिति में आ गया है। और यहीं से
बड़ा सवाल निकल रहा है कि आखिर बुधवार की सुबह जब संसद शुरु होगी तब राजनीतिक
सत्ता के कर्णधारों का रास्ता जायेगा किस तरफ। क्योंकि संसद का महत्व तो तभी है जब
संसद में जनता के हित में कोई निर्णय है। या फिर संसद के सरोकार जनता से जुड़े।
और सच यही है कि पहली बार राजनीतिक सत्ता ने संसदीय राजनीति की धारा के खिलाफ निर्णय लिया है। और नया संकट उस पारंपरिक राजनीति के सामने है जो अभी तक ये सोचती रही कि संसद के दायरे से सड़क को संभाला जा सकता है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या संसद छोड़ सड़क की राजनीति को थामना ही अब हर राजनीतिक दल की जरुरत है। दूसरा ,क्या संसदीय राजनीति के भीतर का भ्रष्टाचार नई परिभाषा गढ रहा है। तीसरा , क्या संसदीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चला है कि पीएम ने खुद को ही जनता के साथ जोड़ लिया है। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद ही जब सड़क के जनतंत्र को संभालने की स्थिति में नही होगा तो क्या ये कहा जा सकता है कि भारत बदल रहा है । या फिर फेल भारत सफल होने के लिये छटपटा रहा है । क्योकि बीते 70 बरस की सियासत ने दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश को बाजार में बदल दिया है। नागरिकों को कन्ज्यूमर बना दिया है। उत्पादन से बड़ा नोट हो गया है। खेती से ज्यादा कमाई सेवा क्षेत्र ने समेट ली। और संसद की नुमाइन्दगी भी रईसों के इर्द -गिर्द घुमड़ने लगी। नीतियां पैसेवालों के लिये बनने लगी। योजनाओं के दायरे में 80 फीसदी नागरिक पैकेज पर टिक गया। 20 फीसदी उपभोक्ता के लिये बजट बनाया जाने लगा तो ऐसा फैसला चाहे अनचाहे देश को ऐसे मुहाने पर खड़ा तो कर ही गया है, जहां से हर राजनेता का रास्ता अब संसद की तरफ नहीं सडक की तरफ जाता है। क्योंकि सडक की सियासत का रास्ता अभी भी एक रुपये को महत्व देता है और संसद के भीतर 500 या दो हजार के नोट मायने रखते है। और कभी नोट को ध्यान से देखिये तो सिर्फ एक रुपये की जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। बाकि हर नोट पर रिजर्व बैक धारक को नोट देने का वायदा करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे खेत खलिहानों में किसानों को बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मिल सके इस जिम्मेदारी की बात तो भारत सरकार करती है। लेकिन उपजाये गया अनाज की कीमत बाजार में होगी क्या ये भारत सरकार नहीं बल्कि मंडी चलाने वाले दलाल तय करते हैं। तो सोचना शुरु कीजिये आखिर क्यों देश की इकनॉमी नोटों की अर्थव्यवस्था पर चलायी जा रही है। ना कि उत्पादन। खेती और मानव संसाधन पर। आखिर ऐसे हालात क्यों बनाये जा रहे है, जहां किसान की फसल नोट के सामने बेबस है। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छात्र अनपढ़ करोड़पति के सामने बेबस हैं। और अपनी ही कमाई को लेने के लिये हर नागरिक बैंक के सामने बेबस हैं।
तो क्या भारत की इकनामी धीरे धीरे व्यवसायिक बैंकों की खाली खातों में रकम लिखकर और भरकर आगे बढ़ कर रही है। यानी देश को बाजार में बदलने के बाद उपभोक्ता संस्कृति का असल चेहरा अब सामने आ रहा है जब बाजारों की चकाचौंध भी दुनिया के सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाले देश में इसलिये थम गई है क्योंकि ना दिखाई देने वाली इक्नामी यानी नोट की कीमत सोना, चादी, जमीन, घर , अनाज से भी ज्यादा कीमती हो गई है और नोट के जरीये राजनीतिक सत्ता ही जनता से सिर्फ वायदा कर रही है कि अच्छे दिन आ जायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे नोट पर रिजर्व बैक धारक को वायदा करता है। यानी सच पर अभासी सच हावी हो चला है । और अभासी सच का हथियार है बैंकिंग सर्विस । यानी बैंकिंग सर्विस ही अब देश की इकनॉमिक सर्विस होगी, ये संकेत तो साफ हो चले हैं। तो जिस बैंक की टकटकी लगाये हर आदमी आज देश में देख रहा है उस बैंकिंग सर्विस का सच भी समझ लीजिये। क्योंकि यही वह बैंक हैं, जिनसे विजय माल्या कर्ज लेकर बिना चुकाये लंदन भाग सकते है। और यही वो बैंक है, जिनसे कर्ज लेकर ना चुकता पाने पर किसान को खुदकुशी करता है। और देश के 20-30 औघोगिक घरानों के पास बैंक का सवा लाख करोड़ से ज्यादा पड़ा है लेकिन वह बैंक को लौटा नहीं रहे और बैंक ले नहीं पा रहा। तो दो सवालो को समझना होगा। पहला, बैंकों में पैसा देश के नागरिकों का ही है। दूसरा,बैंक का 90 फिसदी पैसा सरकार या उघोगपति कर्ज पर लेते हैं। यानी आज जिस तरह जनता अपने ही रुपयों को पाने के लिये नोट बदल रही हैं। अगर देश का नागरिक सोच लें कि वह बैंकों से सारा पैसा निकाल लेगा तो क्या बैक उसे सारा पैसा देने की स्थिति में होगा। यकीनन नहीं। तो जरा बैंकिंग सर्विस के जरीये उन हालातों को समझें जहा आप एक लाख रुपये बैक में जमा कराते है । बैक उघोगो से ब्याज लेकर 90 हजार रुपये कर्ज में दे देता है। 90 हजार लौटने पर बैक 81 हजार फिर ब्याज लेकर कर्जपर दे देता है। यानी जनता के पैसे से बैक ब्याज लेकर जनता के पैसे को ही उघोगों या कारपोरेट को कर्ज देता है। बैंक की अपनी लागत कुछ नहीं होती। लेकिन बैंक का टर्न ओवर बढता जाता है। औऱ इस प्रक्रिया में रुपये की कीमत गिरती जाती है। यानी अगर लोग ये सोच लें कि कि बैंक से रुपया निकाल कर वह जमीन, सोना या अनाज ही खरीद लें तो बैक के पास इतनी रकम होगी ही नहीं। यानी जो बड़े बुजुर्ग आज बैंक की लाइन में खडे होकर अपने ही पैसों के लिये तरस रहे है अगर वह ये सोच रहे होंगे कि पहले की ठीक था। जब सामान बदलकर जिन्दगी चलती थी। तो समझना होगा कि 1933 में बैंकों ने गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म इसीलिये किया। जिससे रुपये की ताकत खत्म हो जाये। यानी पहले जितना रुपया लेकर बैक में व्यक्ति जाता था उतने का सोना-चांदी मिल जाता था। अब ये संभव नहीं है कि जितना रुपया आपने बैंकों में जमा किया उस कीमत में एक बरस बाद उतना ही सामान मिल जाये जो जमा करते वक्त था। और अगर किसी देश को रुपये की जरुरत होगी तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ देशों को कर्ज देते हैं। देश कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में नोट छापते हैं। और फिर महंगाई बढती है। समाज में असमानता बढ़ती है। और माना यही जाता है कि बैंकिंग सर्विस के जरीये ही सत्ता अपने नागरिको पर और ताकतवर देश कमजोर देशों पर राजकर अपनी नीतियों को लागू कराते है । तो लोकतंत्र का नया राग संसद से नहीं बैंक से मिलने वाले नोट पर जा टिका है।
और सच यही है कि पहली बार राजनीतिक सत्ता ने संसदीय राजनीति की धारा के खिलाफ निर्णय लिया है। और नया संकट उस पारंपरिक राजनीति के सामने है जो अभी तक ये सोचती रही कि संसद के दायरे से सड़क को संभाला जा सकता है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या संसद छोड़ सड़क की राजनीति को थामना ही अब हर राजनीतिक दल की जरुरत है। दूसरा ,क्या संसदीय राजनीति के भीतर का भ्रष्टाचार नई परिभाषा गढ रहा है। तीसरा , क्या संसदीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चला है कि पीएम ने खुद को ही जनता के साथ जोड़ लिया है। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद ही जब सड़क के जनतंत्र को संभालने की स्थिति में नही होगा तो क्या ये कहा जा सकता है कि भारत बदल रहा है । या फिर फेल भारत सफल होने के लिये छटपटा रहा है । क्योकि बीते 70 बरस की सियासत ने दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश को बाजार में बदल दिया है। नागरिकों को कन्ज्यूमर बना दिया है। उत्पादन से बड़ा नोट हो गया है। खेती से ज्यादा कमाई सेवा क्षेत्र ने समेट ली। और संसद की नुमाइन्दगी भी रईसों के इर्द -गिर्द घुमड़ने लगी। नीतियां पैसेवालों के लिये बनने लगी। योजनाओं के दायरे में 80 फीसदी नागरिक पैकेज पर टिक गया। 20 फीसदी उपभोक्ता के लिये बजट बनाया जाने लगा तो ऐसा फैसला चाहे अनचाहे देश को ऐसे मुहाने पर खड़ा तो कर ही गया है, जहां से हर राजनेता का रास्ता अब संसद की तरफ नहीं सडक की तरफ जाता है। क्योंकि सडक की सियासत का रास्ता अभी भी एक रुपये को महत्व देता है और संसद के भीतर 500 या दो हजार के नोट मायने रखते है। और कभी नोट को ध्यान से देखिये तो सिर्फ एक रुपये की जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। बाकि हर नोट पर रिजर्व बैक धारक को नोट देने का वायदा करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे खेत खलिहानों में किसानों को बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मिल सके इस जिम्मेदारी की बात तो भारत सरकार करती है। लेकिन उपजाये गया अनाज की कीमत बाजार में होगी क्या ये भारत सरकार नहीं बल्कि मंडी चलाने वाले दलाल तय करते हैं। तो सोचना शुरु कीजिये आखिर क्यों देश की इकनॉमी नोटों की अर्थव्यवस्था पर चलायी जा रही है। ना कि उत्पादन। खेती और मानव संसाधन पर। आखिर ऐसे हालात क्यों बनाये जा रहे है, जहां किसान की फसल नोट के सामने बेबस है। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छात्र अनपढ़ करोड़पति के सामने बेबस हैं। और अपनी ही कमाई को लेने के लिये हर नागरिक बैंक के सामने बेबस हैं।
तो क्या भारत की इकनामी धीरे धीरे व्यवसायिक बैंकों की खाली खातों में रकम लिखकर और भरकर आगे बढ़ कर रही है। यानी देश को बाजार में बदलने के बाद उपभोक्ता संस्कृति का असल चेहरा अब सामने आ रहा है जब बाजारों की चकाचौंध भी दुनिया के सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाले देश में इसलिये थम गई है क्योंकि ना दिखाई देने वाली इक्नामी यानी नोट की कीमत सोना, चादी, जमीन, घर , अनाज से भी ज्यादा कीमती हो गई है और नोट के जरीये राजनीतिक सत्ता ही जनता से सिर्फ वायदा कर रही है कि अच्छे दिन आ जायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे नोट पर रिजर्व बैक धारक को वायदा करता है। यानी सच पर अभासी सच हावी हो चला है । और अभासी सच का हथियार है बैंकिंग सर्विस । यानी बैंकिंग सर्विस ही अब देश की इकनॉमिक सर्विस होगी, ये संकेत तो साफ हो चले हैं। तो जिस बैंक की टकटकी लगाये हर आदमी आज देश में देख रहा है उस बैंकिंग सर्विस का सच भी समझ लीजिये। क्योंकि यही वह बैंक हैं, जिनसे विजय माल्या कर्ज लेकर बिना चुकाये लंदन भाग सकते है। और यही वो बैंक है, जिनसे कर्ज लेकर ना चुकता पाने पर किसान को खुदकुशी करता है। और देश के 20-30 औघोगिक घरानों के पास बैंक का सवा लाख करोड़ से ज्यादा पड़ा है लेकिन वह बैंक को लौटा नहीं रहे और बैंक ले नहीं पा रहा। तो दो सवालो को समझना होगा। पहला, बैंकों में पैसा देश के नागरिकों का ही है। दूसरा,बैंक का 90 फिसदी पैसा सरकार या उघोगपति कर्ज पर लेते हैं। यानी आज जिस तरह जनता अपने ही रुपयों को पाने के लिये नोट बदल रही हैं। अगर देश का नागरिक सोच लें कि वह बैंकों से सारा पैसा निकाल लेगा तो क्या बैक उसे सारा पैसा देने की स्थिति में होगा। यकीनन नहीं। तो जरा बैंकिंग सर्विस के जरीये उन हालातों को समझें जहा आप एक लाख रुपये बैक में जमा कराते है । बैक उघोगो से ब्याज लेकर 90 हजार रुपये कर्ज में दे देता है। 90 हजार लौटने पर बैक 81 हजार फिर ब्याज लेकर कर्जपर दे देता है। यानी जनता के पैसे से बैक ब्याज लेकर जनता के पैसे को ही उघोगों या कारपोरेट को कर्ज देता है। बैंक की अपनी लागत कुछ नहीं होती। लेकिन बैंक का टर्न ओवर बढता जाता है। औऱ इस प्रक्रिया में रुपये की कीमत गिरती जाती है। यानी अगर लोग ये सोच लें कि कि बैंक से रुपया निकाल कर वह जमीन, सोना या अनाज ही खरीद लें तो बैक के पास इतनी रकम होगी ही नहीं। यानी जो बड़े बुजुर्ग आज बैंक की लाइन में खडे होकर अपने ही पैसों के लिये तरस रहे है अगर वह ये सोच रहे होंगे कि पहले की ठीक था। जब सामान बदलकर जिन्दगी चलती थी। तो समझना होगा कि 1933 में बैंकों ने गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म इसीलिये किया। जिससे रुपये की ताकत खत्म हो जाये। यानी पहले जितना रुपया लेकर बैक में व्यक्ति जाता था उतने का सोना-चांदी मिल जाता था। अब ये संभव नहीं है कि जितना रुपया आपने बैंकों में जमा किया उस कीमत में एक बरस बाद उतना ही सामान मिल जाये जो जमा करते वक्त था। और अगर किसी देश को रुपये की जरुरत होगी तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ देशों को कर्ज देते हैं। देश कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में नोट छापते हैं। और फिर महंगाई बढती है। समाज में असमानता बढ़ती है। और माना यही जाता है कि बैंकिंग सर्विस के जरीये ही सत्ता अपने नागरिको पर और ताकतवर देश कमजोर देशों पर राजकर अपनी नीतियों को लागू कराते है । तो लोकतंत्र का नया राग संसद से नहीं बैंक से मिलने वाले नोट पर जा टिका है।
Thursday, September 15, 2016
इस देश में कभी पैदा न होना 'तैय्यबा'
जी, इस वीडियों को देखने के बाद अगर आपकी रुह नहीं कांपी होगी तो आप खुद कोे परखिए की क्या वाकई आपके अंदर इंसानियत जिंदा है भी या नहीं..क्योंकि ये शब्द यूपी के मथुरा की बेटी तयैय्बा की है जो मरने से पहले इंसाफ की भीख मांग रही थी.तय्यैबा के उपर एक सिरफिरे परिवार जो उसके पड़ोस में ही रहता था उसने उसपर एसिड फेंक दिया क्योंकि तय्यैबा उससे नहीं किसी और से शादी करना चाहती थी...बहरहाल आप जब ये वीडियों देख रहे होंगे उस वक्त तय्यैबा हमारे आपके बीच तो नहीं है लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू आप जान कर शर्मसार हो जाएंगे.जी, पीडि़त परिवार ने यूपी के सबसे बड़े और ताकतवर नेता मुलायम सिंह के घर पर भी गुहार लगाई लेकिन वहां से भी उनके हाथ खाली रह गए...अभी तैय्यबा की जिंदगी तबाह करने वाले तीन गुनहगार फरार है और एक पुलिस की गिरफ्त में है...बड़ा सवाल है कि एसिड एटैक करने वालों के अंदर कोई खौफ क्यों नहीं है ? क्या ऐसे बेटियां महफूज रहेंगी इस मुल्क में...
Saturday, September 10, 2016
शहाबुद्दीन कैसे बने ‘साहेब'
तो 63 मुकदमों से घिरा,
गैंगस्टर होने का आरोप झेल रहा, बाहुबली का तमगा पा चुका शख्स मोहम्म्द शहाबुद्दीन
भागलपुर जेल से जमानत पर रिहा हो गए लेकिन उनको जमानत मिलने मात्र से बिहार की
सियासत गरमा गई है. बीजेपी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने
जानबूझ कर शहाबुद्दीन के केस में कमजोर पैरवी की है जिससे शहाबुद्दीन को जमानत मिल
गई. वही सोशल मीडिया पर भी बिहार के लोगों से लेकर बिहार की सरकार तक को लोग
दुत्कार रहे है लेकिन मैं आपको राजनीति नहीं बल्कि शहाबुद्दीन के बारे में कुछ अहम
चीजें बताउंगा. मेरी इस लेख को पढ़कर आप ये समझ सकेंगे की क्यों बिहार के सिवान
जिले में एक बड़ा तबका शहाबुद्दीन की पैरोकारी करता है.जी,तो सबसे पहले 1982-87 के
दौर में चलिए जहां से शहाबुद्दीन के साहेब बनने का सफर शुरू हुआ. दरअसल शहाबुद्दीन
को खुद को साहेब कहलवाने का बहुत शौक था लेकिन 1982-87 के दौर में लोग शहाबुद्दीन
को शहाबुद्दीन के नाम से ही जानते थे.1980 का दौर और उससे पहले सिवान जिला कामरेडो
का जिला था मतलब वामपंथियों का लेकिन शुरूआत में क्रांति जैसा मालूम होने वाला
वामपंथ सिवान के लिए नासूर बन चुका था क्योंकि सिवान में न सिर्फ वामपंथ हावी था
बल्कि माओवादियों का भी खूब बोल बाला था और इसी से त्रस्त होकर सिवान जिले के
भुमिहारों ने शहाबुद्दीन को सशक्त करना शुरू कर दिया. भूमिहारों का साथ मिलते ही
शहाबुद्दीन के दिन बदल गए. छोटे मोटे कांड में शामिल होने वाला शहाबुद्दीन पैसे और
अपने गुर्गों से सश्कत होने लगा.धीरे-धीरे
शुरूआत हुई तो लोग शहाबुद्दीन के पास अपने काम को करवाने पहुंचने लगे और
शहाबुद्दीन के यहां दरबार सजने शुरू हो गए.जनता और सत्ता का साथ पाता देख शहाबुद्दीनके
हौसले आसामान छूने लगे और इसी कड़ी में शहाबुद्दीन ने माओवादियों और वामपंथियों के
घर को खोखला करना शुरू कर दिया. शहाबुद्दीन की ताकत बढ़ती गई और वाम औप माओ सिवान
से घटते गए.वाम और माओ के घटने के साथ ही शहाबुद्दीन का रुतवा बढ़ने लगा और लोग
शहाबुद्दीन के साथ खड़े होते चले गए. भुमिहारों के समर्थन से खड़ा हुआ शहाबुद्दीन
का नाम न जाने कब इतना बड़ा हो गया किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. बढ़ते नाम के
साथ शहाबुद्दीन का कारोबार भी बढ़ने लगा और शहाबुद्दीन ने अपने आस पास नाजायज
कामों का एक साम्राज्य ही खड़ा कर दिया. ऑटोमेटिक हथियार हो या रंगदारी या फिर
हत्या या किसी का अपहरण हो हर जगह बस एक नाम . ऐसे में बढ़ते ताकत के साथ
शहाबुद्दीन ने राजनीति में एंट्री बतौर विधायक की लेकिन बाद में देश के लोकतंत्र
के सबसे बड़े मंदिर यानि लोकसभा तक जा पहुंचे.सत्ता और बाहुबल के खुमार में डूबे
शहाबुद्दीन बिहार का बड़ा और खुंखार चेहरा साबित हुए. लेकिन उससे पहले आप एक किस्सा
भी जान लिजीए कि जब शहाबुद्दीन के पिता मरने वाले थे तो सिवान के मशहुर वकील
श्रीकांत बाबू से अपने औलाद पर आशिर्वाद बनाए रखने का वादा लेते गए.पहले के जमाने
में नैतिकता और जमीर जैसे भारी भरकम शब्दों के सामने वादा बहुत बड़ी चीज हुआ करती
थी. ठीक ऐसा हुआ भी, श्रीकांत बाबू के आशिर्वाद
होने के कारण साहेब का मनोबल और बढ़ गया. चुनाव के दौरान 90 के दौर में बूथ
कैपचरिंग बेहद आम बात हुआ करती थी औऱ साहेब के लड़को के लिए बूथ लूटना खेल से ज्यादा
कुछ था भी नहीं. लेकिन जिस बूथ पर श्रीकांत बाबू को वोट देने जाना होता था उस बूथ
के वोटर लिस्ट पर शहाबुद्दीन खुद हरी कलम
से उनके नाम को घेर देते और वहां अपना हस्ताक्षर भी कर देते ताकि बूथ में भोकस
वोटिंग के दौरान इस बात का ख्याल उनके लड़के जरूर रखे की श्रीकांत बाबू का वोट कोई
औऱ न दे पाए क्योंकि श्रीकांत बाबू वोट देने शाम के 4 बजे आते थे. ऐसे ही कई कड़ियां मिली और शहाबुद्दीन
धीरे-धीरे साहेब बनते चले गए.जब सिवान की जनता वाम और माओ से परेशान होकर
शहाबुद्दीन को चुन रही थी तो किसी ने न सोचा होगा कि शहाबुद्दीन के जरिए वो जिस
खौफ को खत्म करना चाहते है वो खौफ एक दिन खुद शहाबुद्दीन के रूप में उनके सामने
खड़ा होगा.सिवान का एक धड़ा शहाबुद्दीन को रोबिन हुड का अवतार भी मानता है क्योकिं
डॉक्टरों, व्यापारियों, इंजिनियरों से रंगदारी लेने वाले शहाबुद्दीन गरीबों की मदद में जी खोल कर पैसा भी लूटाते है. गरीब
के घर में शादी हो या कोई बीमारी वहां धन शहाबुद्दीन ने जी खोल कर खर्चा इसलिए
सिवान का एक तबका मुसलमानों के अलावा भी उन्हें रहनुमा मानता है.तो वही शहाबुद्दीन
को खडा करने वाले भूमिहारों को भी शहाबुद्दीन ने कभी आंख तिरछा कर नहीं
देखा.राजनीति में भारी सफलता ने शहाबुद्दीन को ऐसी खुमारी दी कि सिवान में कोई
बड़ी लूट हो या फिर हत्या या फिर अपहरण हर जगह शहाबुद्दीन के हाथ होने की खबर आने
लगी. शहाबुद्दीन को तेजाब कांड के बाद भले ही जेल जाना पड़ा हो और फिर उन्हे चुनाव
में हार का मुंह भी देखना पड़ा हो लेकिन एक दौर वो भी था किसी भी पार्टी का बड़ा
नेता सिवान में कदम रखने से पहले उनकी इज्जात लेकर कदम रखता था. सिवान की धरती पर
भले ही प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे बाहुबली नेताओं ने अपनी एक अलग पहचान
बनाने में कामयाबी हासिल की हो लेकिन सिवान की धरती पर शहाबुद्दीन जैसा न कोई था न
कोई मौजूदा दौर में हैं और अब शायद ही सिवान फिर किसी को शहाबुद्दीन बनाएं.
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