Tuesday, August 15, 2017

गोरखपुर हादसे ने योगी की नीयत को एक्सपोज़ किया है ?

तो बच्चो की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई ये ऐलान यूपी के सर्वे सर्वागोरखनाथ मठ के महंत और यूपी के सीएम मंहत योगी आदित्यनाथ ने कर दिया...ऐसे में फिर एक योगी की बात को समाज जस का तस स्वीकार करेगा या खारिज कर देगा ये बड़ा सवाल है ... महज चंद घंटो में 36 बच्चों की मौत हुई लेकिन राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार ने इस बात को खारिज कर दिया वो अलग बात है कि आरोपों के  खारिज होने के बाद भी सरकार जांच की दरियादिली दिखा रही है लेकिन सवाल है कि जब मौते समान्य है तो फिर जांच किस बात का करवाएगी. वैसे भी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने तो साफ साफ कह ही दिया है कि अगस्त में बच्चो की मौत तो होती ही है... 10 अगस्त को अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट चलाने वाले कर्मचारियों ने सीएमओ को लिखा कि आक्सीजन का स्टॉक खतरनाक रूप से कम हो चुका है और रात तक के लिए भी नहीं बचा है. ऑपरेटर ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई कि जल्दी कीजिए मरीज़ों की ज़िंदगी ख़तरे में है. यह दूसरा पत्र था. एक हफ्ता पहले भी ऐसा ही पत्र लिखा जा चुका था जिसका कोई जवाब उन्हें नहीं मिला.  जिस अस्पताल का दौरा राज्य के मुख्यमंत्री एक महीने में दो बार करते होंमेडिकल शिक्षा सचिव एक महीने में दो बार जाती होंस्वास्थ्य सचिव भी दौरा करते होंवहां ये घटना क्यों हुई जबकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने कानूनी नोटिस भी भेजा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जुलाई को भी आए थे और अगस्त को भी. इसके बाद भी इस अस्पताल की अनेक समस्याएं दूर नहीं हुईं. कुछ वार्ड की हालत ऐसी है कि जानकर लगेगा कि ये अस्पताल चल कैसे रहा था. और सारे प्रमुख व्यक्तियों के दौरे के बाद भी वो कौन सी शक्ति थी जो इसमें सुधार नहीं होने दे रही थी.एंसेफलाइटिस के उपचार के लिए फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैब विभाग के सभी कर्मचारियों को 28 महीने से वेतन नहीं मिला है. आज की तारीख तक किसी को वेतन नहीं मिला है. वेतन न मिलने के कारण डॉक्टर छोड़ कर चले गए. इस बाबत गोरखपुर न्यूज़लाइन के मनोज सिंह ने दि वायर के लिए एक ख़बर भी छापी थी.इस विभाग में अब कोई डॉक्टर नहीं है, 11 थेरेपिस्ट बचे हैं जिन्हें वेतन का इंतज़ार है.एक और वार्ड है जिसके स्टाफ को पांच महीने की देरी के बाद घटना से दो दिन पहले वेतन मिला था. इसी अस्पताल के नियो नेटल विभाग के छह महीने से सैलरी नहीं मिली है. इन्हें भी हाल में सैलरी मिली है. दरअसल सरकारी अस्पतालों की एक ऐसी छवि गढ़ दी जाएगीजहां कि वे सबसे बेकारलापरवाह और उनमें जाना यानी मौतों को दावत देना. निजीकरण को समाज में थोप देने का इससे सस्ता और आसान रास्ता कोई और है भी नहींजिसके दम पर निजी स्वास्थ्य और शिक्षा सरीखी सेवाएं बेहद आसानी से अपना लक्ष्य हासिल कर रही हैं. अब जरा आप यूपी का स्वास्थ्य बजट देख लिजिए.... जब योगी जी आप यूपी सरकार का बजट पेश कर रहे थे तब आपने हेल्थ के बजट को लेकर जरा भी गंभीरता नहीं दिखाई. आप 2017-2018 के सिर्फ13692 करोड़ रुपए प्रस्तावित किए. जो कि पिछले बजट से भी कम हैं. यह बजट भी यह कहकर दिया कि 108 नंबर वाली 712इमरजेंसी एंबुलेंस खरीदेंगे. क्या आप भूल गए कि आपके प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी लचर है. बीते दशकों में बच्चों के लिए काल बन रही इंसेफेलाइटिस से 18 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. मगर पिछले 34 सालों मे अकेले आपके शहर गोरखपुर मे 25 हज़ार से ज़्यादा मासूम मौते हुई लेकिन कार्रवाई के नाम पर क्या हुआ..2014 में मोदी सरकार के आने के बाद भी पूर्वांचल की इस त्रासदी को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया. शुक्रवार को जब अचानक बीआरडी कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के चलते एक साथ 30 बच्चों की मौत की खबर आई और उसमें योगी सरकार को घिरता देखा तो आनन-फानन में केन्द्र सरकार हरकत में आई. केन्द्र सरकार ने घोषणा की है कि गोरखपुर में मेडिकल रिसर्च सेंटर स्थापित करवाएगा. यह सेंटर बच्चों की बीमारियों पर रिसर्च करेगा और उन बीमारियों से लड़ने के लिए टीकों को विकसित करेगा. अपने गोरखपुर दौरे के वक्त केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने रविवार को इस बात की घोषणा की. उन्होंने कहा कि रिसर्च सेंटर बनाने के लिए केन्द्र सरकार 85 करोड़ रुपए खर्च करेगी. यहां आप ये भी जान लिजिए कि मोदी सरकार ने 2016 में 750 बेड वाले एम्स अस्पताल के निर्माण को मंजूरी दी थी और साथ ही साथ जुलाई 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद उसकी नींव रखी थी. लेकिन एम्स 2019 से पहले बनने की हालात में नहीं है. ऐसे में बीआरडी मेडिकल कॉलेज ही है जो पूर्वी उत्तर प्रदेशपश्चिमी बिहार और नेपाल के तराई इलाकों के तकरीबन 10 करोड़ लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करवा रहा है. लेकिन ये सस्ती स्वास्थ्य सेवा के पीछे की सच्चाई से तो आपका सामना हो ही गया है... सीएजी ने 2011 से 2016 तक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का हिसाब किताब किया है. गांवों कस्बों में स्वास्थ्य की हालत के लिए यह योजना बहुत महत्वपूर्ण है. सीएजी ने कहा है कि 27 राज्यों ने इस योजना के मद में दिए गए पैसे खर्च ही नहीं किए. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी. 2015-16 में 9509 करोड़ थी. ये वो राशि है जो ख़र्च नहीं हो सकी. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमारे देश में सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो बहुत ही गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट कागज़ों पर ही पूरे हुए हैंमगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं. क्या आपने सुना है कि इन 1285 प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है.  वार्षिक परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक जो जन्म लेने के सात दिन के अंदर जिंदा नहीं रह पाते जिसे हम तकनीकी भाषा में नवजात शिशु मृत्यु दर कहते हैं इसमें शीर्ष 100 जिलों में 46 उत्तप्रदेश के खाते में आते हैं. हमने उनसे बड़े बच्चों यानी शिशु मृत्यु दर (जो बच्चे जो अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते) पर नजर डाली तो उसमें भी शीर्ष 100 जिलों में सबसे ज्यादा जिले उत्तरप्रदेश के हैं. और जब हमने उससे भी बड़े यानी पांच साल तक के बच्चों अर्थात बाल मृत्यु दर को देखा तो उसमें भी उत्तरप्रदेश ही आगे खड़ा हुआ है. इन परिस्थितियों से गुजरते हुए आप इस बात को समझ गए होंगे की देश कहा खड़ा है ... मेरा सवाल फिर गोरखपुर पर ही आकर रुकता है कि क्या सरकार को जितनी संजीदगी इस मामले में दिखानी थी क्या सरकार ने दिखाई या फिर महज राजनीति के इर्द गिर्द गंभीर बयान देकर आपना पिंड छुड़वा लिया...अब तो सरकारों के खिलाफ बोलने से पहले सोचना भी होगा क्यों देश में जनता से ज्यादा लोग राजनीतिक समर्थक हो गए है और तो और सरकारें देश हो गई है, सरकार की आलोचना देश की आलोचना के समान है.  

Tuesday, July 11, 2017

भ्रष्टाचार का ‘सैंपल’ लालू ही क्यों ?





जिस एजेंसी के पिछले दो डॉयरेक्टर खुद कानून के उलंघन के दायरे में आ गए हो और तो और जिस एजेंसी को तोता कह दिया गया हो उस एजेंसी से ये कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो पूरी निष्ठा और निष्पक्षता के साथ काम कर रही होगी.जाहिर है लालू यादव को निचली आदालत ने चारा घोटाले में साजिशकर्ता मानते हुए सजा सुनाई और उन्हे जेल भी जाना पड़ा.लालू कोई छोटे मोटे नेता है नहीं लालू का अपना एक औरा है जिसके सामने तो कई बार भारतीय राजनीति बौनी पड़ती दिखाई दे चुकी है. बात आडवानी के रथ रोकने की हो या फिर महागठबंधन के अचूक फॉर्मूले की. जब पूरे देश में मोदी नाम की लहर थी उसवक्त बिहार में मोदी को मुंह की खानी पड़ी तो जाहिर है की राजनीतिक तल्खियां बढ़नी थी. मौजूदा हाल में देखा जाए तो लालू पर उसी तोते ने ये आऱोप लगाया है कि साल 2006 में लालू ने irctc के टेंडर में घालमेल किया औऱ जिन लोगों को टेंडर मिला उनसे बदले में जमीन ले ली गई.
2004 से शुरू होती है कहानी !
आईआरसीटीसी के गठन के बाद साल 2004 में ये तय किया गया कि रांची और पुरी स्थित रेलवे के होटल बीएनआर का संचालन भारतीय रेलवे से लेकर आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा. इसके ठीक बाद ही लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री के तौर पर पदभार संभाला. सीबीआई के अनुसार उनकी नजर इस फैसले पर पड़ी और वे साजिशमें लग गए.
साजिश में शुरू से शामिल थे आरोपी !
सीबीआई के अनुसार इस साजिश में सभी आरोपी शुरू से ही शामिल थे. इसमें सुजाता होटल्स के मलिक हर्ष कोचर व विनय कोचर, लालू के करीबी पीसी गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता और आईआरसीटीसी के अधिकारी की मुख्य भूमिका रही. साजिश के तहत होटलों पर अधिकार पाने के लिए पूरी योजना बनाई गई और एक साथ ही कई काम हुए.   
डेढ़ करोड़ के सौदे के साथ हुई शुरूआत

इसी साजिश के तहत कोचर बंधुओं ने फरवरी, 2005 में पटना में तीन एकड़ की प्राइम लैंड का सौदा एक करोड़ 47 लाख में तय किया. जमीन को डिलाइट मार्केटिंग कंपनी को बेच दिया गया. इस कंपनी का मालिकाना हक प्रेम चंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता के पास था. दावा है कि यह लालू यादव की ही बेनामी कंपनी थी.  दूसरी तरफ आरोप ये भी है कि लालू को जमीन मार्केट के भाव से बेहद कम दाम पर सौदा हुआ. लेकिन असल सवाल तो ये है कि आप हम या कोई भी घर जमीन खरीदता है तो रजिस्ट्री सर्किल रेट से करता है और लेन देन मार्केट के भाव से किया जाता है तो फिर ऐसे में हर नागरिक जमीन या मकान खरीदता और बेचता है वो चोर है, भ्रष्टाचारी है. इतना ही नहीं सीबीआई ने इस केस में बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को भी साजिशकर्ता माना है जो उस वक्त नाबालिग थे. वहीं राबडी देवी को भी इस FIR  में लपेट दिया गया जबकि वो पूर्व मुख्यमंत्री है और लालू यादव की पत्नी भी. जमीन का सौदा साल 2004 में हुआ और टेंडर 2006 में तो जाहिर है तोताएक साजिश के तहत काम कर रहा है . क्योंकि सीबीआई के पास 6562 केस लंबित है , जिसमें व्यापम जैसा व्यापक घोटाला शामिल है, इस घोटाले में 2400 लोग आरोपी है, 1900 लोग जेल में है जबकि 49 लोगों की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो चुकी है बावजूद इन सबके तोता कुछ ठोस नहीं निकाल पा रहा है. न सीएम से सवाल है न सीएम के पास कोई जवाब, जबकि राज्य के स्तर पर इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया और सीएम को कानों कान खबर नहीं हुई ये सोचने वाली बात है .वहीं मध्यप्रदेश से आगे बढ़िए और चलिए छत्तीसगढ़. वहां भी बीते 15 साल से बीजेपी की सरकार है लेकिन 36000 करोड़ के चावल घोटाले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, नाही राज्य सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपा है तो फिर जिस बीजेपी की सरकार को लालू पर हुई कार्रवाई सहीं लग रही है उसके नजर में छत्तीसगढ़ का चावल घोटाला क्यों कोई जगह नहीं बना पा रहा है ये तो अपने आप में सवाल है . देश के ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकार बन चली है ऐसे में विपक्ष बीजेपी को पटखनी देने के लिए नए नए रास्ते तलाश रहा है. इसी कड़ी में लालू के फोर्मूले ने बीजेपी को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है .लालू ने बिहार में महागठबंधन तो बना ही रखा है साथ ही उनकी कोशिश है कि यूपी में मायावती और अखिलेश साथ मिलकर चुनाव लड़े . राज्यसभा न पहुंचने के काबिल रहीं मायावती को लालू ने बिहार से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया है और इसी शर्त के साथ की वो यूपी में अखिलेश के साथ 2019 के चुनाव में गठबंधन करेंगी. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो फिर 54 प्रतिशत वोट बैंक इस वोटबैंक के पास चला जाएगा और बीजेपी के हिस्से में 28 से 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे. मतलब बिहार के फोर्मूले से बीजेपी को यहां भी मात दिया जा सकता है बिहार की 40 लोकसभा की सीट और यूपी की 80 लोकसभा की सीटों पर अगर बीजेपी का गणित गड़बडा जाता है तो फिर मोदी दोबारा पीएम बनेंगे या नहीं ये कहा नहीं जा सकता. इसलिए ये माना जा सकता है बीजेपी अपने नए नीति के तहत लालू को टारगेट कर रही है  क्योंकि जिस नेता या पार्टी पर भ्रष्टाचार के दाग लगेंगे उसके साथ कोई खड़ा नहीं होना चाहेगा और अगर ऐसा होता है तो फिर विपक्ष का बिखरना और बीजेपी की जीत लगभग तय है. ऐसे हालत के बीच सरकारी तोते पर सवाल तो होना ही चाहिए की देश में लालू के केस के अलावा और भी कई बड़े केस है लेकिन उसकी दिलचस्पी उस केस में क्यों है जिसमें साक्ष्य अब भी साफ नहीं है औऱ घोटाले की रकम ज्यादा से ज्यादा 80 से 100 करोड़ के बीच की है. सीबीआई के मौजूदा एक्टिंग डॉयरेक्टर गुजरात से है और लालू के पुराने विरोधी है तो फिर साजिश की बू तो आनी तय है.. इसलिए ये सवाल लाजमी है कि क्या मोदी सरकार लालू को देश के सामने एक भ्रष्टाचार के सैंपल के तौर पर पेश कर 2019 की बिसात को बिछा रही है.   

Monday, July 3, 2017

जब जिंदगी ने यू टर्न ले ली......


   

वो शाम कुछ अजीब सी थी, दिल को लग रहा था कि कुछ तो अलग है लेकिन क्या ये जानने के लिए दिल बेचैन था, खिड़कियों से कभी झांकते तो कभी बालकनी में आना जाना कर रह था, मन नही लगा तो नीचे मार्केट में चला गया, सिगरेट की डिब्बी ली और चल पड़ा, कुछ समझ नही आ रहा था तो सोचा कि कुछ दूर पैदल चल लू, कुछ दूर ही आगे गया था, की सिगरेट जलाने की तलब हुई, सिगरेट जलाने ही वाला था की एक आवाज आई, कि  रोहन तुम और सिगरेट , ये कब से शुरू किया तुमने, उसकी आवाज से ही मुझे इल्म हो गया था कि ये गुंजन है , जिसने इतने अधिकार से मुझसे सवाल किया था, वो मुझसे कुछ पूछती इससे पहले मैंने बोला, अरे तुम किसी हो, यहाँ अचानक, सब ठीक तो है, वो मेरे सवालों का जवाब देती उससे पहले ही मेरी नजर उसके चेहरे पर गई, न मांग में सिंदूर था, न गले मे मंगल सूत्र, मैंने फिर सवाल किया ये क्या हाल बना रखा है तुमने, क्या हुआ ? मेरे सवालों को दोहराते हुए गुंजन ने बोला अरे बाबा वही तो पूछ रही हूँ, कि ये क्या हाल बना रखा है ? मैंने कहा ये सब तो ऐसे ही है ये छोड़ो तुम  बताओ  की माथे पर से सिंदूर गायब, न गले मे मंगलसूत्र आखिर हुआ क्या ? मायूसी भरे चेहरे के साथ वो बोली अब हम और सौरभ साथ नही है, मैन पूछा कि क्यों क्या हो गया ? वो बोली लम्बी कहानी है कभी और, फिलहाल मुझे देर हो रही है मैं बाद में मिलती हूँ, मैं कुछ और पूछता उससे पहले गुंजन bye बोल कर जा चुकी थी, मैं वही से उल्टे पाव रूम पे वापस चला आया, न खाना खाया  न पानी पिया, गहराती रात के साथ रफी और किशोर के नगमे मुझे बार बार गुंजन के बारे में सोचने पर मजबूर कर रहे थे । सिगरेट होटो पर लगा तो रहा था लेकिन जलाने की हिम्मत नही हो रही थी  न जाने गुंजन की बातें कानो में गूंजे जा रही थी, जैसे तैसे रात तो बीत गयी, सुबह से ही बाजार के चक्कर काटने शुरू कर दिए इस ख्याल से क्या पता गुंजन से मुलाकात हो जाये लेकिन 3 दिन इंतज़ार में ही कटे  । चौथे दिन एक unkonw नंबर से फोन आया , हाँ हेलो कौन , हा रोहन मैं गुंजन ,कहा हो तुम , क्या तुम मिल सकते हो अभी, मैने बिना किसी देर के कहा हा बोलो कहा आना है , उसने कहा कि यहा नही citiiwalk में मिलते है  मैंने झट से हा कहा और 4 बजे का वक़्त तय हुआ । मारे खुशी के तो जैसे मेरा ठिकाना ही न रहा, मैं वक़्त से पहले पहुँच कर इंतज़ार करने लगा, 4  बजकर 10 मिनट हो चुके थे,  गुंजन को मेरी नजरे बेसब्री से तलाश रही थी वक़्त 4 बजकर 30 मिनट हो चुका था लेकिन  वो अब भी नही आई, मैन सोचा कि उसे फोन करू, फिर नही किया, 5बज ने को हुआ तो मैंने सोचा अब तो फोन कर लेना चाहिए लेकिन तभी आवाज आई सॉरी , वो क्या है न बाल कोंब नही हो पा रहे थे, मैन मुस्कुरा कर बोला कोई बात नही, फिर गुंजन ने अपने मिलने का कारण बताया, दरअसल गुंजन अपने डिवोर्स को लेकर परेशान थी और बीते 3 दिन से वो इसी सिलसिले से यूपी के सहारनपुर में थी ।   अपने बीते 5 साल की पूरी दास्तान सुनाई, इसी बीच हमने हल्दीराम की राज कचौरी खाई और बीकानेर के मसाले डोसे हम दोनों बातों में इतने मसगुल थे कि वक़्त का पता ही नही चला कि कब 9 बज गए,  अपनी आप बीती सुनाते कभी गुंजन की आंखे नम होती  तो कभी मेरे जवाब पर वो मुस्कुरा देती , फिर रात में मैं और गुंजन साथ ही वहाँ से निकले, चूंकि रात हो गयी थी  तो मैंने गुंजन को ऑटो से उसके घर तक छोड़ दिया , फिर पूरी रात गुंजन की बातों को सोच कर बीत गयी ।कैसे उसके पति ने उसे यातनाएं दी कैसे वो अपने जिंदगी के 5 सबसे बुरे साल बिता कर आई थी , यही सब सोचते सोचते न जाने कब सुबह हो गयी  । मै आफिस के लिए तैयार ही हो रहा था तभी गुंजन का फोन आया कि यार क्या तुम मेरे लायक कोई नौकरी ढूंढ सकते हो ? मैन बिना कुछ सोचे हा बोल दिया और बोला कि एक cv तुम मुझे भेज दो ।  फिर मैं देखता हूँ ।  देर शाम गुंजन ने अपना cv भेज दिया था, मैं उसकी cv को एडिट कर रहा था तभी मेरे दोस्त अभिनव का फोन आया कि यार कोई अकाउंटेंट हो तो बता दे, उसके कंपनी को जरूरत है मैंने कहा कि कल तक का वक़्त दे बताता हूँ, । कल सुबह मैन अभिनव से मिलने का वक़्त  मांग लिया फिर मैं अभिनव के दफ्तर गया और उसे एक cv दी, cv देखते ही अभिनव ने कहा कि तू होश में तो है, तुझे ये कहा से मिली, फिर मैंने अभिनव को सारी कहानी बताई  , अभिनव ने मेरी बातों को सुन कर कहा कि यार क्या बुरी किस्मत है उसकी,  तेरे जैसे बतमीज़ से दूर हुई तो बेचारी के किस्मत में सनकी आ गया , खैर तू कॉफी पी मैं कोशिश करता हूँ । अभिनव  ने जिस बतमीज़ की बात की वो दरअसल बीते सालों में वो मेरे ऊपर पूरी तरह से हावी था, अपनी बात मैं सबसे मनवता तो था साथ ही सबसे बतमीजी से बात भी करता था, यही कारण था कि धीरे धीरे गुंजन मुझसे दूर हो गयी थी ।लेकिन वक़्त बदला और गुजन के जाने के बाद मैं भी .... वक़्त बीतता गया और बीतते वक़्त के साथ गुंजन और मेरी बात फिर ज्यादा ज्यादा देर के लिए होने लगी । गुंजन को अभिनव की कंपनी में नौकरी भी मिल गयी थी ।  6 महीने कब बीत गए पता ही नही चला, पहले तो एक दिन भी काटना मुश्किल था ।एक दिन अचानक  गुजन का फोन आया कि  कहा हो तुम अभी मिलो मुझसे , मैन बोला बताओ  कहा आना है  उसने बोला तुम कहा हो , मैं तो अपने कमरे में हूँ, kk आती हूँ । थोड़ी देर में गुजन मेरे घर पर थी , वो दरवाजे पर ही थी तभी मैने बोला कि ये मायूसी क्या बात है बताओ , गुजन के  जुबां से शब्द बाहर नही आये थे लेकिन उसकी आंखों की मोतियों ने बात बता दी , मैं उसे चुप करवा ही रहा था की वो सिसकते हुए बोली आज कोर्ट ने हमारे डिवोर्स पर मुहर लगा दिया है , और आज ही पिताजी मुझसे कोई मिश्रा जी के बेटे के बारे में सोचने को कह रहे है , मैन तो साफ साफ बोल दिया कि भाई मेरे बस की नही  ये शादी वादी, मुझे नही करना ।दोबारा गुजन की शादी के नाम से जो मेरे अंदर डर अभी जन्म ले रहा था  वो गुजन की आखरी बातों को सुन कर खत्म हो  गया । थोड़ी देर की चुप्पी के बाद गुजन ने मुझसे पूछा कि तुमने अभी तक शादी क्यों नही की , मेरे दिल ने कहा कि कैसे करता तुम जो चली गयी थी मुझसे दूर ,,, लेकिन जज्बातों को संभालते हुए मैने कहा कि जो गलतियां कि मैंने कम से कम इस जन्म तो उसका पश्चाताप कर लेने दो , मेरी बातों को गौर से सुन रही गुजन बोली अरे ऐसे कौन करता है , वो मुझसे कुछ और पूछती  उससे पहले मैने कहा कि जानती नही हो मुझे मैं तो जो चाहता हूँ वही करता हूँ ,, इस बात को बोलने के बाद मैं कॉफी बनाने चला गया  और गुजन पीछे से मुझे शादी करने के 50 फायदे गिनवाती रही ...... 

Friday, June 16, 2017

मोदी जी! कतरास और मेरी पहचान मिटाने का दोषी कौन ?

देश की सत्ता जहाँ से चलती है वहाँ से 1280 किलोमीटर दूर मेरी एक पहचान मिट गई । अब मैं उसके बारे में सिर्फ यादों के हिसाब से बात कर पाऊंगा । कभी वहाँ जाकर उसका प्रत्यक्षदर्शी नही बन पाऊंगा । पीएमओ और रेल विभाग ने झारखंड के जिला धनबाद के अंतर्गत आने वाले कतरास गढ़ और चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद कर दिया है । तकरीबन 32 किलोमीटर की रेल लाइन बन्द हो गयी ।  सरकार कह रही है कि रेल की पटरियों के नीचे आग का दरिया बह रहा है जो कभी भी ट्रेन में सफर करने वाले हज़ारों लोगो को अपने अंदर ले सकता है । तो जाहिर है कि सरकार ने जनहित में ये फैसला ले लिया । आप लोग मेरे यादों से बहुत दूर है तो सबसे पहले आपका और मेरी यादों का परिचय होना जरूरी है । मैं वही कतरास और चंद्रपुरा के बीच रहता था । मंडल केंदुआडीह के पास एक रेलवे हाल्ट है बुदौढा । हम ,पापा और मेरे बड़े भाई अक्सर शनिवार को यहाँ से ट्रेन पकड़ के कतरास जाया करते थे और ये लगभग हर हफ्ते होता था । पापा घर के लिए समान खरीदने जाते और हम और भैया मीठा खोआ वाला समोसा खाने । कतरास हमारे इलाके का आज भी सबसे बड़ा बाजार है धनबाद और झरिया के बाद । कतरास का दुर्गा पूजा तो आस पास के जिलों तक प्रचलित है । दुर्गा पूजा में यहाँ मेला घूमने करोड़ों लोग आते है । भीड़ इतनी की पैर नही रख सकते । हम भी जाते थे । पाप लेकर जाते थे उसी बुदौढा स्टेशन से कतरास तक । कतरास में मेला लगता था,मौत का कुआं,ब्रेक डांस,तारा माची । ट्रेन में इतनी भीड़ होती थी कि एक रुपया का सिक्का भी नही रखा जा सकता था लेकिन पापा मुझे कंधे पर बिठा लेते थे ,फिर हम मेला घूमते,खिलौना खरीदते और घर लौटते वक्त माँ और दीदी के लिए ढेर सारी मिठाई लेकिन वो मिठाई भी हम ही खाते थे घर पर ।ऐसा बरसों तक होता रहा जब तक हम वहां रहे । आज भी जब जाता हूं तो मेरी पहली कोशिश होती है कि कतरास उतरु । खैर अब ये सब महज याद है क्योंकि अब ये रेल लाइन बन्द हो गया । आखिर ये रेल लाइन बन्द क्यों हुई ये भी जान लीजिए । धनबाद का पूरा इलाका कोयले से भरा हुआ है । ये कोयले की कटाई 100 साल से अधिक वक़्त से हो रही है । कोयला  निकाल कर उस जहग पर बालू भरने का रिवाज है लेकिन भ्रष्ट तंत्र,नेता,ठेकेदारों ने इसमें खेल किया और कागजों पर  बालू भराई को दिखाया ,नतीजा ये हुआ कि पैसे कमाने के खेल में ये काम कई सालों तक किया गया और जमीन के अंदर आग लग गई । ऊपर से धनबाद का कोयला कोकिंग कोल ( कोयला दो तरह का होता है कोकिंग और नॉन कोकिंग कोल, कोकिंग कोल ज्यादा कीमती होता है ) ।  जमीन में आग लगने के बाद भी इसपर किसी ने ध्यान नही दिया और आग बढ़ती गयी , आज के वक़्त में वहा आपको जमीन के अंदर से निकलते धुंए दिन में भी साफ साफ दिखेंगे  । धनबाद से लेकर चंद्रपुरा के बीच कुल 13 रेलवे स्टेशन  प्रभावित हुए है ,इनके आस पास हज़ारो लोगो का घर चलता था,बाजार चलता था सब उजड़ जाएंगे । मुझे आज भी भोला झालमूढ़ी वाला याद है ,ट्रेन में झालमूढ़ी बेचता था और गाना गाता था,चुटकुले सुनता था, आज भोला जैसे सैकड़ों लोग बर्बाद हो गए है ।कोयला मंत्रालय और रेल मंत्रालय इस बात के लिए लड़ रहे है कि पटरियों की शिफ्टिंग का खर्चा कौन देगा ? स्टेशन  बन्द है अब इनमे से कोयला निकाला जाएगा ,आउटसोर्स होगा, मुनाफा होगा, जो विधायक और सांसद, नेता आज लोगों के पक्ष में उतर के तमाशा कर रहे है वही लोग कल कोयला निकालने के लिए ठेका लेंगे, अपना परसेंटेज बांधेंगे, पैसा नही देने पर इनके लड़के धमकी भी देंगे । लेकिन सवाल इससे भी आगे का है कि आग को रोकने के लिए वक़्त पर कदम क्यों नही उठाया गया ? अगर उठाया गया तो आग पर काबू क्यों नही पाया जा सका? कौन से लोग इसपर काम कर रहे थे ? उनके फ़ेल होने की जिम्मेदारी किसकी है ?  ऐसे लोगों पर कार्रवाई हुई या कब होगी ? मौजूदा समय मे इलाके के सांसद,विधायक और राज्य और केंद्र में बीजेपी की सरकार है लेकिन किसी ने इस फैसले को रोकने की जहमत नही उठाई ? इस रूट पर रेल परिचालन की बन्दी की मंजूरी  पीएमओ ने दी है । क्या पीएमओ ने ये नही पूछा कि इन स्टेशन पर निर्भर लोगो की  जिंदगी का क्या होगा ? ये लोग अपना पेट कैसे पालेंगे ? क्या पैसे के खेल में जिंदगी की कोई मायने नही है ?  इलाके के मौजूदा विधायक ढुल्लू महतो, सांसद पीएन सिंह सड़को पर है लेकिन ये लोग साल भर से कहा थे ? अखबारों में बयान छपवाने के अलावा क्या किया है ? ये मसला सिर्फ रेल लाइन का नही लाखों लोगों की जिंदगी का है, कोयला निकासी में हुए व्यापक भ्र्ष्टाचार का है । मैं अपने तमाम साथियों से अपील करता हूँ कि हमे अब लाखों लोगों को भूखे मरने से बचाने के लिए कदम उठाना होगा । ये वक़्त बहुत मुश्किल है , राज्य में विपक्ष के लोग सुस्त है, स्थानीय नेता ढुल्लू महतो से टकराने की हिम्मत नही रखते, सांसद से सवाल पूछने वालों का क्या होगा ये हम जानते है । मीडिया अब भी चरण वंदना में जुटा है लेकिन क्या हम लोगों को मरने के लिए छोड़ दे ? भ्रष्ट तंत्र की साजिशों का भेंट मेरे बचपन का एक अहम हिस्सा चढ़ गया। ये ठीक मेरी यादों को मिटाने जैसा है । ऐसे लाखों लोग है जिनकी यादे और जिंदगी इस रेल  रूट से जुड़ी है तो क्या सत्ता सिर्फ तमाशबीन बनी रहेगी , मुस्कुराती रहेगी, मुनाफा कमाएगी या उजड़ती जिंदगी और यादों को बचाने के लिए कोई उठाएगी,  यही असल सवाल है ।

Friday, June 9, 2017

ये जो देश मेरा महान है ......!

 जय जवान और जय किसान, ये नारा तो हम सब जानते है कि किसने दिया है लेकिन अब ये एक सवाल भी है कि क्या अब भी जय किसान है , अगर है तो जो लोग कह रहे है कि इस देश में अब भी किसान की जय है तो फिर सवाल ये है कि उनपर गोली क्यों चलाई गई, मध्यप्रदेश की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय है कि शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार ने किसानो पर गोली चलवा दी और 5 लोगों की जान चली गई. पहले तो पुलिस और सरकार ने किसी तरह की गोली चलाए जाने के आदेश से इनकार किया लेकिन आईजी ने बाद में माना की पुलिस ने गोली चलाई है . ये देश का दुर्भाग्य है कि जो अन्नदाता इस देश का मतदाता भी है उसके हालत पर कोई गंभीर नहीं है.गंभीरता होती तो आप खुद सोचिए की कैसे जिस राज्य के किसान सड़कों पर है उस राज्य को 3 साल लगातार कृषि रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जाता रहा... डॉ. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नवंबर 2004 को 'नेशनल कमीशन ऑन फारमर्स' बना था. दो सालों में इस कमेटी ने 6 रिपोर्ट तैयार की. इन रिपोर्ट्स में तेज और समावेशी विकास की खातिर सुझाव दिए गए थे. फ़सल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले. किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाएं. गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए. महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं. किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके. 28 फीसदी भारतीय परिवार ग़रीब रेखा से नीचे रह रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का इंतज़ाम करने की सिफारिश आयोग ने की लेकिन नतीजा क्या है आप देख सकते है. विभिन्न बैंकों से देशभर के किसान कितना कर्ज लिए, इस पर 30 सितंबर 2016 को अंतिम आंकड़ा जारी किया गया था, जिसके मुताबिक देश के 10 बड़े कर्जदार राज्यों में उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है। प्रदेश के 79,08,100 किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। किसान कर्जदार परिवारों में जहां महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है, वहीं राजस्थान तीसरे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में चार अप्रैल को प्रदेश के 86 लाख लघु और सीमांत किसानों को कर्जमाफी का तोहफा दिया था। लेकिन सरकार के इस फैसले के दो महीना पूरा होने के बाद कर्जमाफी की आस लगाए किसानों को निराशा होने लगी है। किसानों को उम्मीद थी कि कर्जमाफी होने पर एक तरफ जहां उन्हें कर्ज से छुटकारा मिलेगा, वहीं उन्होंने कर्ज की जो एक-दो किश्त जमा की हैं, उसका पैसा वापस मिलेगा। कर्जमाफी की जानकारी लेने के लिए प्रदेशभर के किसान संबंधित बैंकों का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन बैंक की तरफ से उनको कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। साल 2012-13 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के अनुसार, पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18,059 रुपये थी. इसके बाद हरियाणा के किसानों का नंबर आता है. उनकी मासिक आमदनी 14, 434 रुपये थी. सबसे कम बिहार के किसानों की मासिक आमदनी थी, 3,588 रुपये. इस सर्वे के मुताबिक , भारत के किसानों की औसत मासिक आमदनी होती है, मात्र 6, 426 रुपये. मध्यप्रदेश में प्रदर्शन कर रहे किसानों की मांग है कि उनके फसलों के  उचित दाम तय किए जाएं, कर्ज माफ हो,मंडी शुल्क वापस हो फसलों के समर्थन मुल्य बढ़ाए जाएं...15 साल से मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है....ऐसे में वहां के किसानों के हालात इतने बुरे है तो इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाए, मध्यप्रदेश के मंदसौर जहां किसानो पर गोली चलाई गई वहां के किसानों का कहना है कि कश्मीर में पत्थरबाजी करने वालों पर पैलट गल और रबर बुलेट का इस्तेमाल होता है जबकि देश के किसानों पर पुलिस सीधे गोली चलाती है, ये दोहरा मापदंड नहीं है तो क्या है...मिनीमम सपोर्ट प्राइस पर मोदी सरकार क्यों कुछ नहीं बोल रही है, ये कब तक हो पाएगा , क्या स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशे सिर्फ बाते करने के लिए ही सीमित है या फिर उसे लागू भी किया जाएगा, किसानो का आरोप है कि सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है कि वो किसानों के ज्यादा फसल का सहीं दाम दिलवा पाएं या उत्पाद कम होने पर उसकी मदद की जा सकें....तो देश के अन्नदाता के लिए खेतों में मौत की फसल उपज रही  है  ,ये वाकई डरावना है  की पहले जो पार्टी और  उसके समर्थक  किसानो के लेकर बड़ी बड़ी बातें करती थी वो सत्ता में आने के बाद क्यों भूल गए है ? क्यों अब केंद्र कद फैसलों की आलोचना नही होती जबकि असल सवाल तो ये है किसानों को लेकर इस सरकार ने कुछ भी ठोस किया है तो वो कहा है ? शिवराज सिंह चौहान  किसानों के लिए उपवास  करते है  इसका मतलब क्या है ? क्या वो अपनी गलती मानते है ?  अगर उनकी गलती है तो कार्रवाई क्यों नही होनी चाहिए ?   देश के मौजूदा माहौल में ज्यादा सवाल पूछना भी ठीक नही लगता, कब कौन आपकी देशभक्ति को सवालों के घेरे में ले आये ये कौन जानता है ?  आप खुद से पूछिए की जब कांग्रेस के वक़्त आप सवाल करते थे तो क्या आपकी देशभक्ति जांची जाती थी ? बीजेपी विपक्ष में थी तो पॉलिसी पैरालाइसिस का आरोप कांग्रेस पर लगती थी लेकिन मौजूदा बीजेपी सरकार की पॉलिसी क्या है ? विदेश मंत्री, विदेश मंत्रालय  लगातार ये कहता है कि पीएम मोदी पाकिस्तानी पीएम से नही मिलेंगे लेकिन होता ठीक उसके उलट है । 2 दिन में 2 बार मुलाकात होती है । देश मे कहा जाता है कि आतंक और क्रिकेट एक साथ नही चल सकता , पाकिस्तान जब तक आतंकियों को भेजना बन्द नही करेगा तब तक बात नही होगी । तो सवाल ये है कि पीएम ने क्यों मुलाकात की ? भारत सरकार का पाकिस्तान को लेकर स्टैंड क्या है ? आप खुद सोचिए ,क्या ये सवाल आपके मन मे नही उठते ,अगर नही तो क्यों नहीं  और अगर उठते है तो फिर इसका जवाब तलाशिए । कुल मिलाकर मेरी जो समझ है जिससे मुझे तो यही लगता है  मोदी सरकार और मनमोहन सरकार में कुछ ज्यादा अंतर नही है ।।।।

Tuesday, March 14, 2017

यूपी में बीजेपी के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां ?



यूपी को नया सियासी सवेरा मिल चुका है, प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई बीजेपी यूं तो जश्न में डूबी है लेकिन अंदरखाने बेचैनी सत्ता को संभालने को लेकर है, ये कहने के पीछे कारण भी है क्योंकि बीजेपी को उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में साफ बहुमत मिला तो वहीं गोवा और मणिपुर में बीजेपी बहुमत के मामले में पीछे रह गई, लेकिन जहां बहुमत नहीं मिला वहां के सीएम का चेहरा तय कर दिया गया, गोवा में तो मनोहर पर्रिकर ने शपथ तक ले ली लेकिन बीजेपी ये कमाल उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में नहीं दिखा पाई, हम बात उत्तरप्रदेश में बीजेपी को मिले बहुमत पर करेंगे और ये समझने की कोशिश करेंगे की बीजेपी के सामने कौन कौन सी और कैसी चुनौतियां हैं . सबसे पहले बात यूपी में बीजेपी के सीएम चेहरे की करें तो पूर्व सीएम और केंद्र में मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह की चर्चा सबसे ज्यादा है . लेकिन खबर ये भी है कि राजनाथ यूपी की कमान नहीं चाहते, ऐसा करने के पीछे दो कारण हैं पहला तो ये की वो केंद्र की राजनीति में खुद को ज्यादा फिट पाते हैं और दूसरा ये कि अगर वो खुद यूपी की कमान संभालेंगे तो फिर नवनिर्वाचित विधायक पंकज सिंह जो गृहमंत्री के बेटे हैं उनको कैबिनेट में जगह दे पाना बेहद मुश्किल होगा .. इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती,  केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा, यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, हिन्दुत्व के पोस्टर बॉय योगी आदित्यनाथ, अमित शाह के करीबी और संघ के नेता स्वतंत्र देव सिंह से लेकर मथुरा सीट से चुनाव जीते श्रीकांत शर्मा, इलाहाबाद पश्चिम से चुनाव जीतकर आए पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के नाती सिद्धार्थनाथ सिंह के नामों की चर्चा यूपी के बाजार में सीएम की कुर्सी के लिए गर्म है,....हर नाम की अपनी खूबी है ऐसे में पार्टी किस पर दांव लगाती है ये बड़ा दिलचस्प होगा जाहिर है यूपी में जो प्रचंड बहुमत बीजेपी को मिला है उसको लेकर पार्टी के उपर खासा दबाव भी है कि उस बहुमत को कैसे संभाला जाए और साथ ही पार्टी में भी एकजुटता बनाई रखी जाए..पार्टी ऐसे नेता को समाने लेकर आना चाहती है जिसको लेकर सर्वसहमति हो साथ ही वो अच्छा प्रशासक भी हो...वहीं सीएम की बात से आगे बढ़े तो बीजेपी के सामने कई और चुनौतियां है जैसे कि चुनाव के वक्त सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों की कर्ज माफी से लेकर, बूचड़खानों पर तालेबंदी की बात कही हो या फिर सभी कॉलेज, यूनिवर्सिटी में फ्री वाई-फाई का वादा हो, फ्री लैपटॉप के साथ 1 जीबी डाटा, 24 घंटे बिजली, 15 मिनट में आपके दरवाजे पर पुलिस, राम मंदिर, तीन तलाक और एंटी रोमियो दल जैसे मुद्दे बीजेपी के लिए खासा परेशानी का सबब बन सकते हैं लेकिन एक चुनौती बीजेपी के सामने इस बात की भी है कि वो अपने कद्दावर नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों की लाज रखे, क्योंकि यूपी में चुनाव के वक्त बीजेपी के लिए पीएम मोदी ही चेहरा थे और चुनाव बाद मिले बहुमत पर बीजेपी ने पीएम को ही केड्रिट दिया है ऐसे में पीएम मोदी की लाज रखना भी बीजेपी के विधायकों के लिए चुनौती है.... हम ये इसलिए भी कह रहे है क्योंकि अभी यूपी में विधायकों ने शपथ तक नहीं ली है और ऐसे में विधायकों की दबंगई की खबर सामने आने लगी है..यूपी के हरदोई जिले की सवायजपुर विधानसभा से विधायक बने माघवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ 'रानू'  पर वहीं के पुलिस अधिकारी जो इलाके के सीओ हैं उनको फोन पर जमकर खरी खोटी सुनाने और धमकाने का मामला सामने आया है और इस पूरे घटनाक्रम का ऑडियों भी वायरल हो गया है...ऐसे में सवाल है कि जो नेता चुनाव से पहले पीएम मोदी के नारों पर दम भरा करते थे वहीं नेता चुनाव के बाद पीएम मोदी की बातों का लाज लिहाज भूल गए है..




Tuesday, February 14, 2017

उत्तराखंड वालों वोट देना दिल नहीं !



ये साक्षात्कार तो पुराना है. आप जब इसे देख रहे होंगे तब तक उत्तराखंड में मतदान हो चुके होंगे लेकिन फिर आप सीएम हरीश रावत की बात सुनेंगे तो आपको ये महसूस होगा कि कैसे हर राजनीतिक दल के लिए चुनाव एक खेल जैसा है.हर पांच साल बाद ये आएगा और इसे राजनीतिक दल खेंलेंगे .इसमें कोई एक जीतेगा और कोई हारेगा. बहरहाल जनता के मुद्दे जस के तस ही रहेंगे. खैर आम तौर पर नैतिकता के बड़े बड़े दांवे करने वाली राजनीतिक पार्टियां, जब टिकट देने की बारी आती है तो न उनका ध्यान दागी पर होता है न बागी पर होता है..जिताउ कैंडिडेट के नाम पर पार्टिय़ां आपराधिक छवि वाले नेता से लेकर करोड़पति उम्मीदवारों को भी टिकट देने से नहीं चुकती है..जिस राज्य में अभी ठीक से मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है वहां आज  करोड़पति नेताओं की लंबी लाइन लग चुकी है...उत्तराखंड साल 2017 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर दागियों का बोलबाला देखने को मिल रहा है.। साल  2012 के चुनाव की अपेक्षा इस बार दोगुने आपराधिक मामलों में लिप्त नेता विधानसभा जाने की उम्मीद लिए चुनावी मैदान में उतरे हुए है .
कितने दागी है नेता जी ?

उत्तराखंड चुनाव में कुल 70 सीटों पर 637 प्रत्याशी है.
70 सीटों पर 637 प्रत्याशी में से  91  उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।जबकि 54  उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। 5 उम्मीदवारों के ऊपर हत्या , दूसरे 5 उम्मीदवारों के उपर हत्या की कोशिश का आरोप है. वहीं अन्य 5 उम्मीदवारों के ऊपर महिलाओं से अत्याचार के भी आरोप है.

किस पार्टी के पास कितने दागी ?

अगर दागी उम्मीदवारों को पार्टी के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी के 70  उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवार दागी है. वही  कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 17 उम्मीदवार दागी है. बीएसपी के 69 में से 7 उम्मीदवार दागी है.यूकेडी के 55 में से 4 उम्मीदवार दागी है सपा के 20 में से 2 उम्मीदवार दागी है. जबकि 261 निर्दलीयों में से 32 उम्मीदवारों के दामन पर दाग है.

किस पार्टी से कितने गंभीर आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशी

वहीं गंभीर आरोपों की बात करें तो बीजेपी के 70 उम्मीदवारों में से 10 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं वहीं कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 12 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. बीएसपी के  69 उम्मीदवारों में से 06 ,यूकेडी के 55 उम्मीदवारों में से 3 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं तो वही एसपी के 20 उम्मीदवारों में से 2 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं और 261 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 14 उम्मीदवारों पर संगीन धाराओं में मामला दर्ज है.आपको बता दें कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 में 10 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजनीतिक दलों के तरफ से हर सीट पर कम से कम 3 उम्मीदवार आपराधिक छवि वाले उतारे गए है.
कितने अमीर है नेता जी ?
उत्तराखंड में इस बार 637 उम्मीदवारों में  से दो सौ से ज्यादा करोड़पति उम्मीदवार हैं,  जबकि 78 उम्मीदवारों ने अपने आय का ब्यौरा नहीं दिया है. कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में 52 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीजेपी के 48 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीएसपी के 69 उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवारों की सम्पत्ति एक करोड़ से ज्यादा की है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार की औसत सम्पत्ति 1.57 करोड़ के आस-पास है। जबकि महिला उम्मीदवार चुनाव में पिछली बार 60 थी। इस बार कुल 28 महिलाएं ही चुनाव ऐ जंग में मोर्चा संभालने आयी हैं। 

इस लेख  को आप सहेज कर रख लीजिए औऱ जिन दिन कोई नेता उत्तराखंड में नौतिकता की बड़ी बड़ी बातें करें तो  उसे आप ये पढ़ कर सुना दिजिएगा...
मन भारी है इसलिए ज्य़ादा कुछ लिख नहीं पा रहा हूं लेकिन उत्तराखंड ंमें कोई भी जीते हारना जनता को ही है .उत्तराखंड की जनता चाहे जिसे वोट दे लेकिन दिल किसी को न दें...क्योंकि दिल तो बना ही है टूटने के लिए...नेता आपसे कुछ भी कहे लेकिन याद रखना ना ही आपके डॉक्टरों के आभाव से जुझने वाले सामुदायिक अस्पतालों के हालात बदलेंगे, न जोशीमठ में सड़कों की हालात दुरुस्त होगी.. और न ही वो  टिहरी की डोबरा चांटी पुल का अधुरा काम पूरा होगा.....