13 नंवबर को झारखंड के मुख्यमंत्री धनबाद आ रहे है, उनका फूलों से स्वागत होना चाहिए और उनकी लंबी उम्र की कामना शक्ति मंदिर में होना चाहिए. बहरहाल जैसे मैने सुना की मुख्यमंत्री रघुवर दास13 नवंबर को विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय का शिलान्यास करेंगे तो मैं बेचैन हो गया. मेरी बेचैनी का हर कारण बताउंगा आपको, इसका राजनीतिक आंकलन से ज्यादा बेहतर सामाजिक आंकलन हो तो मुझे बहुत संतुष्टी होगी लेकिन मुझ नाचीज की राय बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती क्योंकी मेरा महत्व महज एक वोट का है और मेरे साथ कोई हजारों वोटर भी नहीं है. लेकिन जिन्होने हजारों लाखों वोट लेकर सत्ता संभाली उनके दौरे को लेकर एक स्वस्थ्य माहौल में सवाल तो होने चाहिए. मुख्यमंत्री विश्वविद्यालय का नींव रखेंगे, अच्छी बात है क्योंकि शिक्षा से ही समाज की तस्वीर बदली जा सकती है. लेकिन क्या मुख्यमंत्री धनबाद के एक किसी कॉलेज को उठा कर बता सकते है कि है इस कॉलेज और यहां पढ़ने वाले बच्चे इतने तेज है कि वो देश में किसी भी कॉलेज को टक्कर दे सकें? आप, पी के रॉय कालेज से लेकर जिले का कोई भी कॉलेज उठा लिजिए ? तस्वीर एक जैसी होगी ? मुख्यमंत्री रघुवर दास ने हाल में लाखों करोड़ों रुपए कॉलेजों के लिए जारी किए लेकिन ये चिंता 3 साल बाद क्यों हो रहीं है ? क्या इसलिए क्योंकि 2019 का लोकसभा चुनाव भी है औऱ काम के लिए राज्य सरकार के पास 1 साल क्योंकि अंतिम साल में तो बस चुनावी एजेंडों की छपाई औऱ दिखाई होती है.मुख्यमंत्री जी धनबाद आ रहे है तो शिक्षा के साथ कई और मामलों पर भी उनका ध्यान जिम्मेदार नागरिक होने के कारण दिलाना चाहिए. अब पानी का मसला ही ले लिजिए हर अखबार जिले के अलग अलग शहरों, कस्बों के दिक्कत से पटा रह रहा है. कहीं पानी न पहुंचने की समस्या है तो कहीं गंदा पानी लोगों तक पहुंच रहा है. जरा महुदा तेलमच्चो का ही हाल जान लीजिए, ग्रामीण जलापूर्ति योजना के नाम पर 11 करोड़ 79 लाख रुपए खर्च किए जाने के बाद भी आम जनता को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है, इस योजना का उद्घाटन मुख्यमंत्री द्वारा ऑनलाइन किया गया था, यहां के लोग तब से ऑन लाइन ही पानी पी रहे हैं, योजना साल 2013-14 में तत्कालीन पेयजल स्वच्छता मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल के कार्यकाल में बनी थी, जिसकी स्वीकृति वर्तमान पीएचईडी मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी के कार्यकाल में मिली, बड़े तामझाम गाजे-बाजे के साथ 23 जनवरी 2015 को बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो द्वारा खेलाय चंडी प्रांगण में इस योजना का शिलान्यास किया गया, जिससे पीएचईडी के आला अधिकारी, कार्य एजेंसी संवेदक मेसर्स दरोगा प्रधान के प्रतिनिधि सहित सैकड़ों लोग शामिल थे, शिलान्यास के समय लोगों के बीच उम्मीद जगी थी कि अब यहां के लोगों की पानी की समस्या का पूर्ण रूप से समाधान हो जाएगा, लेकिन आज तक ये योजना पूर्ण रुप से धरातल पर उतरी ही नहीं. ये जगह तो सेंपल भर है आप धनबाद के जिस कोने में भी जाएंगे वहां पीने की साफ पानी की समस्या से आप रुबरु होंगे. शिक्षा और पानी के बाद में स्वास्थ्य पर बात नहीं करुंगा बस इतना ही कहुंगा की कम से कम वोटरों के जान की चिंता सरकारों को होनी ही चाहिए. कानून व्यवस्था को लेकर बात की जाएं तो सीएम साहब की नैतिकता कई सवालों से घिर जाती है. मसलन बाघमारा के विधायक ढुल्लू महतो की बात करें तो सरकार उनके उपर से आपराधिक मुकदमे हटाना चाहती थी लेकिन वो तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इसपर रोक लगाया. सीएम साहब की पार्टी के विधायक ढुल्लू महतो को लेकर साल 2016 15 फरवरी को एक गजब की खबर सामने आई जिसपर विधायक जी पर आरोप लगा कि उन्होने रुसी कंपनी से ही रंगदारी मांग ली. इसको लेकर सीएम को चिट्ठी तर लिखी गई, विपक्ष ने सवाल किए लेकिन विधायक ढुल्लू महतो ने तमाम आरोपो को खारिज कर दिया. ये खबर एनडीटीवी से लेकर बीबीसी तक ने छापी ,लेकिन आपने इसपर क्या किया ? इसी 7 नवबर को उनके समर्थकों पर मजदूरों को बाघमारा के ब्लॉक 2 में दौडा- दौड़ा कर पीटने का आरोप लगा. सिर्फ एक विधायक ही क्यों , झरिया के विधायक संजीव सिंह को ले लिजिए, इनपर तो कांग्रेस के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या के आरोप लगे, वो जेल में बंद है, लेकिन आपने उन्हे अपनी पार्टी ने बनाए रखा है ? क्या ऐसे लोगों का सरकार समर्थन करती है ? अगर जवाब ना में है तो फिर पार्टी की तरफ से अबतक कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? आप तो सीएम है पार्टी में आपकी बात कौन काट सकता है ? आप कहते है कि कानून व्यवस्था बनाये रखना प्राथमिकता है तो फिर मुकदमा वापस लेने की नीति कौन सी परिपाटी का परिचय देती है ? हो सकता है कि मेरी बात पर आपको यकिन नहीं हो, लेकिन आपके पार्टी के ही सांसद पीएन सिंह ने कहा कि धनबाद की कानून व्यवस्था बिगड़ गई है, इसके जनता में आक्रोश है, विकास का काम ठप है तो फिर क्या सांसद साहब की बात भी मायने नहीं रखती ? वैसे तो राज्य और केंद्र में आपकी पार्टी की ही सरकार है तो फिर समन्वय क्यों नहीं है ? धनबाद-चंद्रपुरा रेल लाइन को लेकर आज तक कोई मुआवजे की बात हुई नहीं और आपकी पार्टी के विधायक सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे ? तो फिर इसे क्या समझा जाएं, ये मजह दिखावे की राजनीति है जिससे वोटों की फसल लहलहाती है और यहीं धारा झारखंड सहित धनबाद को बर्बादी की ओर ढकेल रही है जहां विकास की संभावनाएं लाख है. आखिर में यहीं कहूंगा की सीएम साहब आएं तो उन्हें पानी जरुर बोतलबंद पिलाइयेगा.
दिल कि लिखें तो कहां लिखें ...यहां लिखें कि वहां लिखें ..हमारी कलम में अगर हो स्याही किसी और की, तो फिर लिखें तो क्या लिखें।
Friday, November 10, 2017
Sunday, October 15, 2017
‘बेगुनाह’ हैं तलवार दंपित ? : आरुषि-हेमराज का हत्याकांड एक ‘अर्धसत्य’
आरुषि
हेमराज हत्याकांड एक अर्धसत्य इसलिए क्योंकि आरुषि हेमराज की हत्या हुई ये सत्य है
लेकिन इनका हत्यारा कौन है ये कोई नहीं जानता. बीतते वक्त के साथ भले ही 14 साल की
आरुषि के खून के धब्बे बिस्तर से साफ हो चुके है. हेमराज के खून के धब्बे भी उस छत
से गायब है जिस छप पर उसकी लाश मिली थी, लेकिन वो मुट्ठी भर लोग आज भी उस सूर्ख
लाल खुन के धब्बों को भूला नहीं पाएं है, कानून आजतक आरुषि और हेमराज को न्याय
नहीं दे पाया है.हर कोई ये जनाने को बेताब है कि आखिर आरुषि हेमराज का हत्यारा कौन
है, हर कोई अपनी-अपनी सोच से इस हत्या का गुनहगार तय कर रहा है लेकिन इस हत्याकांड
का असली दोषी जिसे निचली अदालत ने ठहराया उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये कहते हुए
बरी कर दिया कि जांच एजेंसियों को पास पर्याप्त सबूत नहीं है तलवार दंपति को दोषी
कहने के लिए. तलवार दंपति को निर्दोष इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इस मामले की जितने
भी लोगों ने जांच की, उन सभी
ने ये माना है कि तलवार दंपति को हत्या का दोषी मानने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद
नहीं हैं.
जांच
में अलग-अलग तथ्य
इस
दोहरे हत्याकांड की जांच कुल तीन अलग-अलग जांच दलों ने की थी. शुरूआती जांच नॉएडा
पुलिस ने की, इसके
बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और कुछ समय बाद इस टीम को बदलकर यह जांच सीबीआई
की ही एक नई टीम को सौंप दी गई थी. दिलचस्प यह भी है कि इस
मामले में देश की सर्वोच्च जांच संस्था की दो अलग-अलग टीम बिलकुल विपरीत दिशाओं
में जाती दिखती हैं. सीबीआई की पहली टीम यह मान रही थी कि यह हत्याएं हेमराज के
दोस्तों - कृष्णा, राजकुमार
और विजय - ने की हैं. जबकि सीबीआई की दूसरी टीम ने माना है कि हत्याएं तलवार दंपति
ने की हैं.
दो
अलग- अलग पक्ष
सीबीआई
की पहली टीम को कृष्णा,
राजकुमार और विजय पर इसलिए शक था क्योंकि इन लोगों ने नार्को और पॉलीग्राफ
टेस्ट में ऐसी कई बातें बोली थी जिसने यह पता लगता था कि ये लोग हत्या के दोषी
हैं. दूसरी ओर डॉक्टर राजेश और नुपुर तलवार के नार्को या पॉलीग्राफ में ऐसी कोई भी
बात सामने नहीं आई जिनसे इन लोगों के अपराध में शामिल होने की संभावना पैदा होती
हो. इन टेस्टों के अलावा कृष्णा के कमरे से सीबीआई ने बैंगनी रंग का एक तकिया भी
बरामद किया था जिस पर हेमराज के खून के निशान थे. यह सबूत इस मामले में सबसे बड़ा
मोड़ समझा जा रहा था. लेकिन जब यह मुद्दा अदालत में उठा तो नई सीबीआई टीम के
अध्यक्ष ने इसे यह कहते हुए नकार दिया कि यह तकिया असल में हेमराज के ही कमरे से
मिला था और टाइपिंग की गलती के चलते इस पर यह लिख दिया गया कि यह कृष्णा के कमरे
से मिला है.
‘निष्पक्ष
गवाहों’ ने बदले बयान
इस
मामले को यह तथ्य भी कुछ रहस्यमयी बना देता है कि कई ‘निष्पक्ष गवाहों’ ने भी इस मामले में अपने बयान
बदले हैं. आरुषि और हेमराज के शवों का पोस्टमॉर्टेम करने वाले डॉक्टर. आरुषि का
पोस्टमॉर्टेम डॉक्टर दोहरे ने किया था. पोस्टमॉर्टेम के दौरान उन्होंने आरुषि के निजी
अंगों में कुछ भी असमान्य नहीं पाया था. आरुषि की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में भी ऐसा
कुछ नहीं था जो बताता हो कि उस पर यौन हमला हुआ था या उसके निजी अंगों से कोई
छेड़छाड़ हुई थी. पोस्टमॉर्टेम के बाद भी इस तरह की कोई बात डॉक्टर दोहरे ने न तो
नॉएडा पुलिस को बताई थी, न सीबीआई
को और न ही एम्स की उस डॉक्टरों की टीम को जिसके वे खुद भी सदस्य थे. लेकिन जब
मामले की जांच सीबीआई की नई टीम करने लगी, जो तलवार दंपति को ही दोषी मान रही थी, तब पहली बार डॉक्टर दोहरे
ने कहा कि आरुषि के निजी अंगों में असामान्य रूप से फैलाव था और ऐसा भी लग रहा था
कि मरने के बाद भी उसके निजी अंग साफ़ किये गए हैं.डॉक्टर दोहरे का यह बयान
पोस्टमॉर्टेम के लगभग डेढ़ साल बाद आया. पोस्टमॉर्टेम करने के बाद वे कुल पांच बार
अपना बयान दर्ज करा चुके थे लेकिन ऐसी कोई भी बात उन्होंने पहले नहीं कही थी. कुछ
ऐसा ही हेमराज के पोस्टमॉर्टेम के मामले में भी हुआ जो डॉक्टर नरेश राज ने किया
था. उन्होंने भी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में कुछ असामान्य दर्ज नहीं किया था लेकिन
न्यायालय में बयान देते हुए उन्होंने कहा कि हेमराज के निजी अंग में सूजन था जिससे
ये शक होता है कि उसकी हत्या सेक्स करते हुए या उससे ठीक पहले की गई थी.
कई
सवालों के जवाब गायब ?
आरुषि
हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को हुई सजा पर इसलिए भी सवालिया निशान लगता रहा
क्योंकि इस मामले में कई गंभीर सवालों के जवाब न तो जांच के दौरान जांचकर्ता ढूंढ
पाए और न ही न्यायालय में अभियोजन पक्ष साबित कर पाया. जैसे ये सवाल कि हेमराज
की मौत कहां हुई? अभियोजन
की कहानी के अनुसार हेमराज और आरुषि, दोनों की हत्या आरुषि के
कमरे में हुई थी. लेकिन आरुषि का कमरा, जहां उसका खून बिखरा पड़ा
था, वहां
हेमराज के खून का एक भी निशान नहीं था. इससे यह तो साफ़ था कि हेमराज की हत्या कहीं
और की गई थी. हेमराज का शव घर की छत से बरामद हुआ था. विशेषज्ञों ने जब इस जगह और
हेमराज के शव का परीक्षण किया तो पाया कि उसके शव को किसी चादर में रखकर छत पर
घसीटा गया था. इस कारण विशेषज्ञों ने माना कि हेमराज को छत पर भी नहीं मारा गया
था. क्योंकि यदि उसकी हत्या छत पर ही हुई होती तो हत्या करने वाले को उसकी लाश
घसीटने के लिए पहले उसे चादर में रखने की जरूरत नहीं पड़ती. घर के बाकी किसी हिस्से
में भी हेमराज का खून नहीं था इसलिए यह तथ्य भी एक रहस्य ही है कि उसे कहां मारा
गया.
वो
तथ्य जिसने तलवार दंपति का पक्ष मजबूत किया
राजेश
और नुपुर तलवार के कपड़े भी उनके निर्दोष होने की संभावना बताते हैं. हत्या होने से
कुछ ही घंटे पहले आरुषि ने अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में जो
कपड़े राजेश और नुपुर तलवार पहने हुए दिख रहे थे, वही
कपड़े उन्होंने अगली सुबह भी पहने हुए थे. इन कपड़ो में कहीं भी हेमराज के खून के
निशान नहीं थे. आरुषि का खून इनमें जरूर था लेकिन जांचकर्ताओं ने भी यह माना है कि
यह खून तब लगा होगा जब वे अपनी बेटी की लाश से लिपट कर रो रहे थे.
कमजोर
तर्क और तथ्य बने ‘बेगुनाही’ का
कारण
सजा सुनाने से पहले जब निचली
अदालत ने 39 सरकारी गवाहों, सबूत के 247 नमूनों, विशेषज्ञों की सैकड़ों
रिपोर्टों, अभियोजन के हजारों
दस्तावेजों और दोनों पक्षों की अनगिनत दलीलों को परखा तो माना कि इस मामले में भले
ही कोई सीधा सबूत यह नहीं कहता कि हत्याएं तलवार दंपति ने ही की हैं लेकिन कई सबूत
ये जरूर कहते हैं कि ये हत्याएं उनके अलावा किसी और ने नहीं की. इसलिए न्यायालय ने
माना कि इस मामले में कुछ खामियों के बावजूद भी तलवार दंपति को संदेह का लाभ नहीं
दिया जा सकता. लेकिन सीबीआई अदालत के इस फैसले को उच्च न्यायालय ने गलत माना और
तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया है.
इस पूरी घटना में एक बात साफ है कि 9 साल पहले हुई आरुषि की हत्या की बार बार
सिस्टम भी हत्या ही कर रही है तो ऐसे में सवाल है कि अब सीबीआई क्या करेगी ? क्या सीबीआई नए सिरे से
जांच करेगी ? क्या सीबीआई तलवार दंपति को ही दोषी मानकर आगे बढ़ेगी? क्या सीबीआई कोर्ट के फटकार
के बाद दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देगी ?
क्या सीबीआई आरुषि और हेमराज को इंसाफ दे पाएगी ? या फिर सीबीआई को किसी
विदेशी जांच एजेंसी की सहारा लेना होगा ?
Sunday, October 8, 2017
खुलासा - अडाणी के आगे बेबस है दो देशों की व्यवस्था ?
https://www.youtube.com/watch?v=6GDLHtH4zhc
तो क्या देश में सरकार के
नाम पर मुखौटा पीएम मोदी का है और असल चेहरा गौतम अडाणी का है ? ये सवाल महज इसलिए नहीं है
क्योंकि प्रधानमंत्री आए दिन उद्योगपति गौतम अडाणी के हवाई जहाज में सफऱ करते हुए
पाए जाते है बल्कि ये सवाल इसलिए है क्योंकि जिस तरह से भारत सरकार और यहां तक की
ऑस्ट्रेलिया की सरकार अडाणी पर पैसे छिड़क रही है वो वाकई कई संदेह पैदा करता है.
बिना किसी चुनाव के आज बात गौतम अडाणी की हो रही है तो उसके पीछे का तर्क ये है कि
एक ऑस्ट्रेलिया का चैनल वो कर गुजरा जो भारत में किसी के बस की बात नहीं थी. जी,
ऑस्ट्रेलिया का एक चैनल ABC ने गौतम अडाणी के साम्राज्य की पड़ताल जिस कदर की है उसमें
कई परते सामने आई है. अगर आपकी रुची उद्योगपति और राजनीतिक दलों के सांठगांठ को
जानने में नहीं है तो फिर ये लेख आप मत पढ़िए आपका वक्त खराब होगा. तो बात शुरु होती है कि अडाणी को आस्ट्रेलिया
के सबसे बड़े कोल खदान का ठेका मिला है जिसका भारी विरोध ऑस्ट्रेलिया में हो रहा
है और वहां कि सरकार का पक्ष है कि इससे 10 हजार नौकरियां पैदा होंगी.
मुख्य बिंदु
1-
अडाणी की कंपनी पर आरोप है
कि टैक्स की चोरी की गई
2-
कंपनी ने विदेशों में फर्जी कंपनियां बनाई
3-
टैक्स हैवन देशों में पैसे
ट्रांस्फर किए गए
4-
अडाणी ग्रुप ने तमाम आरोपों
को खारिज किया है.
ऑस्ट्रेलियाई चैनल के
मुताबिक
‘दरअसल अडाणी ग्रुप की ऑस्ट्रेलियाई संपत्ति में से एक अबोट प्वाइंट कोल
टर्मिनल है, जिसका विस्तार मैके क्वीन्सलैंड तक होना है और वहां 400 किलोमीटर का
रेल लाइन भी प्लान है. जो पॉर्ट से सीधे कोयले की खदान तक जाएगा. इस काम में कई
कंपनी लगी हुई है और जिस कंपनियों से अडाणी की कंपनी का जुड़ाव है वो टैक्स चोरी
के मामले में सवालों के घेरे में है.’
अंग्रेजी में यहां पढ़े-
According to ABC “Adani
Group’s assets in Australia include the Abbot Point Coal Terminal near Mackay
in Queensland, a terminal expansion project it has approval to undertake at
Abbot Point, and a planned railway line of nearly 400 kilometres from the port
to the giant mine it wants to build in the Galilee Basin,”
अस्ट्रेलिया में जो एजेंसी ऑस्ट्रेलियन सिक्योरिटी और
निवेशक कमीशन (Australian
Securities and Investments Commission इस तरह के निवेश पर नजर रखती है उसे भी धोखे में
रखे जाने की बात कहीं जा रही है. दरअसल अडाणी ग्रुप ने अतुल्य रिसोर्स कंपनी को
अपनी कंपनी सूची में दर्शा रखा है, जिसका स्वामित्व अडाणी ग्रुप से ही जुड़ा हुआ
है. ये कंपनी एबोट कंपनी के द्वारा कंट्रोल की जाती है लेकिन पड़ताल में मालूम
पड़ा की अतुल्य रिसोर्स को पीछे से ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड कंपनी जो सिगापुर के साथ
साथ कई औऱ टैक्स हैवन जहां टैक्स को बचाया जाता है वहां रजिस्ट्रर्ड है और उसे
कंट्रोल कर रही है.. ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड आडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी देखते है और विनोद अडाणी कई मामलों
में टैक्स हेराफेरी के आरोपी है. उनपर आरोप है कि जानबुझ कर इनलोगों ने मनी लौड़्री
का खेल शैल कंपनियों के जरिए किया. जिसके जवाब में अडाणी ने कहा है कि विनोद अडाणी एक
एनआरआई है और उनका अडाणी ग्रुप में किसी तरह का हस्तकक्षेप नहीं है. लेकिन अडाणी
ग्रुप के काम में विनोद अडाणी की कंपनी को सलिप्तिता बताती है की दाल में कुछ काला
है. विनोद अडाणी कई कंपनियों के डॉयरेक्टर है जो ऑस्ट्रेलियन रेल और पॉर्ट की संपत्ति को कंट्रोल करते है. तस्वीरे देख
कर आप खेल समझ सकते है.
सौ- abc news
विवाद की दूसरी
कडी ये भी है क्योंकि भारत सरकार पर आरोप है कि अडाणी को कोयले की खनन के लिए स्टेट
बैंक से 6200 सौ करोड़ का कर्ज
दिया गया ! वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी अडाणी को सरकार ने 1 बिलियन डॉलर का लोन दिया है. अडाणी की कंपनी पर आरोप ये भी है कि प्राकृति के स्वरुप को भी तबाह किया
है. ऑस्ट्रिलिया के पत्रकारों की टीम ने गोवा से लेकर कनार्टक और ऑस्ट्रेलिया का
हाल दिखाया जहां पर्यावरण के विरूध लगातार काम हो रहा है और लोगों का जीना दुभर
है. वहीं ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार जब गुजरात पहुंचे तो उनसे क्राइम ब्रांच की टीम
ने 5 घंटे तक पूछताछ की. सवाल है किसके इशारे पर, गुजरात मोदी औऱ अमित शाह का गढ़
है, साथ ही अडाणी का बेस भी गुजरात का है. ऐसे में मतलब समझा जा सकता है कि कैसे
अडाणी फल फूल रहे है और कैसे एक अडाणी के लिए हर सिस्टम को तोड़ने के लिए बेकरार
है. सिस्टम की एक तस्वीर और दिखाते है कि कैसे भारत में जारी अडाणी के खिलाफ जांच
को सरकार ने रोक दिया. राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने कर चोरी के मामले में
अडानी ग्रुप के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रोक दिया है। डीआरआई के अतिरिक्त
महानिदेशक के वी एस सिंह ने इससे संबंधित एक आदेश जारी कर अडाणी ग्रुप के खिलाफ चल
रही जांच को रोकने का निर्देश दिया है। अडाणी के फर्मों पर कथित रूप से आयात किए
गए वस्तुओं के मूल्य में हेराफेरी करने और कम टैक्स अदा कर सरकारी खजाने को राजस्व
नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
बता दें कि अडानी ग्रुप पर बिजली और बुनियादी ढांचे
के विकास के लिए आयात किए गए सामानों का कुल मूल्य बढ़ाकर 3974.12 करोड़ रुपये
घोषित करने और उस पर शून्य या कम 5% से कम टैक्स देने के आरोप हैं। राजस्व खुफिया
निदेशालय के मुंबई क्षेत्राधिकार के एडीजी के वी एस सिंह ने 280 पन्नों के अपने
रिपोर्ट में 22 अगस्त को लिखा है,
“मैं विभाग के उस मामले से
सहमत नहीं हूं जिसमें कहा गया है कि एपीएमएल (अडानी पावर महाराष्ट्र लिमिटेड) और
एपीआरएल (अडानी पावर राजस्थान लिमिटेड) ने अपनी संबंधित इकाई यानी ईआईएफ
(इलेक्ट्रॉजन इन्फ्रा होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड) को कथित विवादित सामान आयातित
मूल्य से अधिक अधिक मूल्य पर दिया है।”
तो दूसरी तरफ भारत
की खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अडाणी की ऑस्ट्रेलिया में 16.5 अरब डॉलर की
कारमाइकल कोयला खान परियोजना के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न इलाकों में हजारों
लोगों ने प्रदर्शन कर रहे है. पर्यावरण और वित्तपोषण के मुद्दों की वजह से
परियोजना में पहले ही कई साल का विलंब हो चुका है. अडाणी ऑस्ट्रेलिया के मुख्य
कार्यकारी अधिकारी जयकुमार जनकराज ने कहा कि कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रोजगार सृजन के
लिए प्रतिबद्ध है और क्षेत्रीय लोगों से इसे व्यापक समर्थन मिल रहा है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया
की सड़कों पर विरोध के बाद भी ऐसा पहली बार हो रहा है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार
किसी के साथ ऐसे मजबूती से खड़ी है. वहीं भारत के शह पर अडाणी की बढ़ती हैसियत भी
किसी से छिपी हुई नहीं है. लेकिन जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया के चैनल के खुलासे के बाद
भी भारत में चुप्पी है खासकर हिंदी मीडिया में वो वाकई कई अनसुलझी बातों की तरफ
इशारा करती है.
-
लेख abc न्यूज़ चैनल के
खुलासे पर आधारित है.
Monday, September 25, 2017
जनतंत्र के 'लूट' का मॉडल है झारखंड !
झारखंड को बने 17 साल होने को है लेकिन झारखंड के हाथ की लकीरें अब तक नही खिंची है . ऐसा लगता है जैसे मानो अभी झारखंड की किस्मत लिखी जानी हो । लेकिन बीते सालों की कहानी देखी जाए तो ये जरूर कहा जा सकता है कि झारखंड को बना कर भी बनाया नही गया । यूं देखा जाए तो राज्य पर सबसे ज्यादा बार राज करने का मौका बीजेपी को मिला, खनिज संपदाओं से भरे राज्य में विकास की गाड़ी अब तक दौड़ नहीं पायी है । सरकारें दूसरे दलों की भी बनी लेकिन हर किसी ने राज्य के विकास के जहग खुद के विकास पर ही जोर दिया मसलन राज्य आज भी बिखरा हुआ है और संगठित महज वो लोग है जो इस राज्य पर राज कर रहे है । बात शिबू सोरेन की हो, या बाबूलाल मरांडी की राज्य की जनता ने इन नेताओं पर अपना खूब भरोसा जताया लेकिन ये भी कुछ खास नजर नही आए। शिबू सोरेन की भूमिका तो राज्य को बनाने में रही लेकिन वो भी पार्टी और बेटे से इधर उधर देख न सके और रोज झारखंड पिछड़ता चला गया । मौजूद दौर में राज्य में बीजेपी की सरकार है , बीजेपी को इस बार लगभग जनता ने पूर्ण बहुमत के करीब पहुँचाया लेकिन बीजेपी की सरकार में भी भारी निराशा देखने को मिल रही है,हालांकि सरकार ऐसा नही मानती है ।
सरकार खुद के 1000 दिन को मुंबई से लेकर दिल्ली और दिल्ली से लेकर मध्यप्रदेश तक प्रचार कर जश्न मना रही है । जबकि सच्चाई जमीन पर कुछ और ही है । जमीन अधिग्रहण के दौरान अपना हक मांग रहे लोगों पर गोली चलवाने का मामला हो या फिर गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का दांव हो, हर तरफ इन मसलों पर अप्पति है क्योंकि झारखंड का मिजाज तो बिना आदिवासियों के इतर बनाया नही जा सकता, तो ऐसे में झारखंड में विकास की बात आज भी बैमानी सी ही लगती है । जिला अस्पतालों की सच्चाई छुपाए नही छिप रही है और सरकारी विभाग का लचर रवैया लोगों की जान तो लेता ही रहा है । अब बात रांची की ही ले लीजिए , सेवा सदन अस्पताल के सामने स्थित पार्किंग में एक पेड़ से शिव सरोज का झूलता शव मिला था . युवक ने दो गमछे की मदद से फांसी लगा ली थी . पीएमओ और डीजीपी समेत अन्य अधिकारियों को भेजे गये अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि चुटिया थाना की पुलिस के व्यवहार से क्षुब्ध होकर वह जान देने जा रहा है. उसने अपने पिता को पुलिस के जुल्म से बचाने की भी गुहार लगायी थी. आप सोच लीजिए जिस राज्य की राजधानी में खुलेआम ये सब होता हो वहाँ दूसरे जिलों का हाल क्या होगा ? और सत्ता बेलागम इसलिए भी दिखती है क्योंकि उसे इस बात का अंदाजा बखूबी है कि विपक्ष तो वही घिसीपिटी राजनीति ही करेगा । जब धनबाद चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद किया जा रहा था तब बीजेपी के सांसद और विधायकों ने चूं तक न कि और जब एक झटके में 30 लाख लोगों को बेसहारा कर दिया गया तो फिर सत्ता में बैठे लोग ही राजनीति पर उतारू हो गए । विधायक से लेकर सांसद और सांसद से लेकर राज्य और केंद्र में सरकार बीजेपी की बावजूद उसके जनता को बेसहारा कर दिया गया । हज़ारो लोग जिनका जीवन उस रेल रुट के सहारे चल रहा था वो एक झटके में लाचार हो गए लेकिन बीजेपी विधायक ढुल्लू महतो से लेकर सांसद पीएन सिंह और गिरिडीह के सांसद रविन्द्र पाडेय जनता को झूठा दिलासा देते रहे और नाम मात्र का विरोध करते रहे, अब असल सवाल की शुरुआत भी यही से है कि सरकार जिनकी है क्या उनकी भी नही सुनी जा रही है ? तो फिर सुनी किसकी जा रही है और सरकार काम किसके लिए और किसके इशारे पर कर रही है ? दरअसल झारखंड को लेकर वादे और संकल्प तो साल 2000 से लिये जा रहे है लेकिन जिस झारखंड में बिरसा को भगवान माना गया उनके घर को भी आज तक सरकारें कंक्रीट का नही बनवा पायी लेकिन राजनीतिक पर्यटन होता रह गया ।
झारखंड के साथ मूल सवाल आदिवासियों का है लेकिन मौजूदा तस्वीर में झारखंड के आदिवासी उस खोई हुई विरासत की तरह हो गए है जिनकी प्रदर्शनी प्रधानमंत्री, राज्यपाल या किसी विदेशी राजदूत के सामने नाँच और गाने के जरिये ही की जा रही है । आदिवासियों के बच्चों के लिए न तो सही शिक्षा है, न अस्पताल की व्यवस्था, मतलब इलाज के लिए भी आपको राजधानी का ही रुख करना होगा क्योंकि सरकारी मशीनरी अब भी सही तरीके से गांवों में पहुंच नही पायी है और छोटी छोटी बीमारी ही लोगों के मौत की वजह बन गयी लेकिन याद करें तो हर सरकार ने आदिवासियों के हित मे काम करने का वादा किया था । झारखंड में सरकारों की दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगता है कि साल 2014 तक के आंकड़े बताते है कि राज्य में 70 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित है और जच्चा बच्चा मृत्यु दर देश के औसत दर 212 को लांघ कर 261 पर पहुंच चुका है । राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर आदिवासी इलाका सारंडा की तस्वीर हर उस इंसान को अंदर से हिला के रख देगी जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर यकीन करते हुए वोट किया हो । दरअसल 2017 में सरकार के आंकड़े मानते है कि वहाँ 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है जबकि सच्चाई उससे और अधिक भयानक है । न वहाँ पीने का साफ पानी है , न खाने को खाना, लगभग वहाँ के आदिवासी बरसाती कीड़े को मारकर खाने के कगार पर है ।झारखंड में सरकारी डॉक्टरों के कुल 2900 पद है लेकिन सेवा 1600 डॉक्टर ही दे रहे है । राज्य में महज 3 सरकारी मेडिकल कॉलेज है जो मात्र हर साल 200 डॉक्टर ही राज्य को दे रहे है । वहीं 29.74 लाख हेक्टयर जमीन साल 2014 में सिंचाई के लिए उप्लब्ध थी लेकिन सिंचाई की सुविधा महज 25 प्रतिशत जमीन पर ही उपलब्ध थी और अब भी हालात नही बदले है । 17 साल के उम्र वाले राज्य में सबसे ज्यादा राज तो बीजेपी ने किया लेकिन सत्ता का जलवा तो यही है कि मौजूदा सीएम पिछली सरकारों को ही दोष देते दिखते है ।
रघुवर राज में ही शांत और अपने सौहार्द के लिए जाने जाना वाला राज्य गौ हत्या और मॉब लीनचिंग के लिए बदनाम हो गया है लेकिन सरकार अब भी मान रही है कि राज्य में तो राम राज है । लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी के विधायक ढुल्लू महतो तकरीबन दर्जनों भर मुकदमा झेल रहे है उसमें रंगदारी मांगने जैसे भी कई आरोप शामिल है , तो वही सीधे तौर पर झरिया विधायक संजीव सिंह भी सरेराह कांग्रेस के नेता और धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर की हत्या के आरोप में जेल जा चुके है , जमशेदपुर में बच्चा चोर के नाम पर बिगड़ती कानून व्यवस्था की तस्वीर भी कोई भूल नही सका है ,तो फिर रघुवर दास किस बिनाह पर राज्य में सब ठीक है का डंका बजा रहे है ? वजह चाहे जो भी हो लेकिन झारखंड के तमाम राजनीतिक दल सत्ता के छावं तले खूब बढ़ रहे है और जनता इन्हीं राजनीतिक दलों के आसरे विकास की बांट जोह रही है जो फिलहाल रघुवर राज में उन्हें नसीब होती दिख नही रही । तो फिर ये कहना तो जायज है कि जिस छोटे राज्य का कॉन्सेप्ट बीजेपी हमेशा देश के सामने देते आयी वहीं बीजेपी छोटे राज्य झारखंड का विकास करने में विफल है ।
Tuesday, August 15, 2017
गोरखपुर हादसे ने योगी की नीयत को एक्सपोज़ किया है ?
तो बच्चो की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई ये ऐलान यूपी के सर्वे सर्वा, गोरखनाथ मठ के महंत और यूपी के सीएम मंहत योगी आदित्यनाथ ने कर दिया...ऐसे में फिर एक योगी की बात को समाज जस का तस स्वीकार करेगा या खारिज कर देगा ये बड़ा सवाल है ... महज चंद घंटो में 36 बच्चों की मौत हुई लेकिन राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार ने इस बात को खारिज कर दिया , वो अलग बात है कि आरोपों के खारिज होने के बाद भी सरकार जांच की दरियादिली दिखा रही है लेकिन सवाल है कि जब मौते समान्य है तो फिर जांच किस बात का करवाएगी. वैसे भी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने तो साफ साफ कह ही दिया है कि अगस्त में बच्चो की मौत तो होती ही है... 10 अगस्त को अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट चलाने वाले कर्मचारियों ने सीएमओ को लिखा कि आक्सीजन का स्टॉक खतरनाक रूप से कम हो चुका है और रात तक के लिए भी नहीं बचा है. ऑपरेटर ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई कि जल्दी कीजिए मरीज़ों की ज़िंदगी ख़तरे में है. यह दूसरा पत्र था. एक हफ्ता पहले भी ऐसा ही पत्र लिखा जा चुका था जिसका कोई जवाब उन्हें नहीं मिला. जिस अस्पताल का दौरा राज्य के मुख्यमंत्री एक महीने में दो बार करते हों, मेडिकल शिक्षा सचिव एक महीने में दो बार जाती हों, स्वास्थ्य सचिव भी दौरा करते हों, वहां ये घटना क्यों हुई जबकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने कानूनी नोटिस भी भेजा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 9 जुलाई को भी आए थे और 9 अगस्त को भी. इसके बाद भी इस अस्पताल की अनेक समस्याएं दूर नहीं हुईं. कुछ वार्ड की हालत ऐसी है कि जानकर लगेगा कि ये अस्पताल चल कैसे रहा था. और सारे प्रमुख व्यक्तियों के दौरे के बाद भी वो कौन सी शक्ति थी जो इसमें सुधार नहीं होने दे रही थी.एंसेफलाइटिस के उपचार के लिए फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैब विभाग के सभी कर्मचारियों को 28 महीने से वेतन नहीं मिला है. आज की तारीख तक किसी को वेतन नहीं मिला है. वेतन न मिलने के कारण 4 डॉक्टर छोड़ कर चले गए. इस बाबत गोरखपुर न्यूज़लाइन के मनोज सिंह ने दि वायर के लिए एक ख़बर भी छापी थी.इस विभाग में अब कोई डॉक्टर नहीं है, 11 थेरेपिस्ट बचे हैं जिन्हें वेतन का इंतज़ार है.एक और वार्ड है जिसके स्टाफ को पांच महीने की देरी के बाद घटना से दो दिन पहले वेतन मिला था. इसी अस्पताल के नियो नेटल विभाग के छह महीने से सैलरी नहीं मिली है. इन्हें भी हाल में सैलरी मिली है. दरअसल सरकारी अस्पतालों की एक ऐसी छवि गढ़ दी जाएगी, जहां कि वे सबसे बेकार, लापरवाह और उनमें जाना यानी मौतों को दावत देना. निजीकरण को समाज में थोप देने का इससे सस्ता और आसान रास्ता कोई और है भी नहीं, जिसके दम पर निजी स्वास्थ्य और शिक्षा सरीखी सेवाएं बेहद आसानी से अपना लक्ष्य हासिल कर रही हैं. अब जरा आप यूपी का स्वास्थ्य बजट देख लिजिए.... जब योगी जी आप यूपी सरकार का बजट पेश कर रहे थे तब आपने हेल्थ के बजट को लेकर जरा भी गंभीरता नहीं दिखाई. आप 2017-2018 के सिर्फ13692 करोड़ रुपए प्रस्तावित किए. जो कि पिछले बजट से भी कम हैं. यह बजट भी यह कहकर दिया कि 108 नंबर वाली 712इमरजेंसी एंबुलेंस खरीदेंगे. क्या आप भूल गए कि आपके प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी लचर है. बीते 4 दशकों में बच्चों के लिए काल बन रही इंसेफेलाइटिस से 18 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. मगर पिछले 34 सालों मे अकेले आपके शहर गोरखपुर मे 25 हज़ार से ज़्यादा मासूम मौते हुई लेकिन कार्रवाई के नाम पर क्या हुआ..2014 में मोदी सरकार के आने के बाद भी पूर्वांचल की इस त्रासदी को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया. शुक्रवार को जब अचानक बीआरडी कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के चलते एक साथ 30 बच्चों की मौत की खबर आई और उसमें योगी सरकार को घिरता देखा तो आनन-फानन में केन्द्र सरकार हरकत में आई. केन्द्र सरकार ने घोषणा की है कि गोरखपुर में मेडिकल रिसर्च सेंटर स्थापित करवाएगा. यह सेंटर बच्चों की बीमारियों पर रिसर्च करेगा और उन बीमारियों से लड़ने के लिए टीकों को विकसित करेगा. अपने गोरखपुर दौरे के वक्त केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने रविवार को इस बात की घोषणा की. उन्होंने कहा कि रिसर्च सेंटर बनाने के लिए केन्द्र सरकार 85 करोड़ रुपए खर्च करेगी. यहां आप ये भी जान लिजिए कि मोदी सरकार ने 2016 में 750 बेड वाले एम्स अस्पताल के निर्माण को मंजूरी दी थी और साथ ही साथ जुलाई 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद उसकी नींव रखी थी. लेकिन एम्स 2019 से पहले बनने की हालात में नहीं है. ऐसे में बीआरडी मेडिकल कॉलेज ही है जो पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और नेपाल के तराई इलाकों के तकरीबन 10 करोड़ लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करवा रहा है. लेकिन ये सस्ती स्वास्थ्य सेवा के पीछे की सच्चाई से तो आपका सामना हो ही गया है... सीएजी ने 2011 से 2016 तक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का हिसाब किताब किया है. गांवों कस्बों में स्वास्थ्य की हालत के लिए यह योजना बहुत महत्वपूर्ण है. सीएजी ने कहा है कि 27 राज्यों ने इस योजना के मद में दिए गए पैसे खर्च ही नहीं किए. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी. 2015-16 में 9509 करोड़ थी. ये वो राशि है जो ख़र्च नहीं हो सकी. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमारे देश में सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो बहुत ही गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट कागज़ों पर ही पूरे हुए हैं, मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं. क्या आपने सुना है कि इन 1285 प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है. वार्षिक परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक जो जन्म लेने के सात दिन के अंदर जिंदा नहीं रह पाते जिसे हम तकनीकी भाषा में नवजात शिशु मृत्यु दर कहते हैं इसमें शीर्ष 100 जिलों में 46 उत्तप्रदेश के खाते में आते हैं. हमने उनसे बड़े बच्चों यानी शिशु मृत्यु दर (जो बच्चे जो अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते) पर नजर डाली तो उसमें भी शीर्ष 100 जिलों में सबसे ज्यादा जिले उत्तरप्रदेश के हैं. और जब हमने उससे भी बड़े यानी पांच साल तक के बच्चों अर्थात बाल मृत्यु दर को देखा तो उसमें भी उत्तरप्रदेश ही आगे खड़ा हुआ है. इन परिस्थितियों से गुजरते हुए आप इस बात को समझ गए होंगे की देश कहा खड़ा है ... मेरा सवाल फिर गोरखपुर पर ही आकर रुकता है कि क्या सरकार को जितनी संजीदगी इस मामले में दिखानी थी क्या सरकार ने दिखाई या फिर महज राजनीति के इर्द गिर्द गंभीर बयान देकर आपना पिंड छुड़वा लिया...अब तो सरकारों के खिलाफ बोलने से पहले सोचना भी होगा क्यों देश में जनता से ज्यादा लोग राजनीतिक समर्थक हो गए है और तो और सरकारें देश हो गई है, सरकार की आलोचना देश की आलोचना के समान है.
Tuesday, July 11, 2017
भ्रष्टाचार का ‘सैंपल’ लालू ही क्यों ?
जिस एजेंसी के पिछले दो डॉयरेक्टर खुद
कानून के उलंघन के दायरे में आ गए हो और तो और जिस एजेंसी को तोता कह दिया गया हो उस
एजेंसी से ये कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो पूरी निष्ठा और निष्पक्षता के साथ
काम कर रही होगी.जाहिर है लालू यादव को निचली आदालत ने चारा घोटाले में साजिशकर्ता
मानते हुए सजा सुनाई और उन्हे जेल भी जाना पड़ा.लालू कोई छोटे मोटे नेता है नहीं
लालू का अपना एक औरा है जिसके सामने तो कई बार भारतीय राजनीति बौनी पड़ती दिखाई दे
चुकी है. बात आडवानी के रथ रोकने की हो या फिर महागठबंधन के अचूक फॉर्मूले की. जब
पूरे देश में मोदी नाम की लहर थी उसवक्त बिहार में मोदी को मुंह की खानी पड़ी तो
जाहिर है की राजनीतिक तल्खियां बढ़नी थी. मौजूदा हाल में देखा जाए तो लालू पर उसी
तोते ने ये आऱोप लगाया है कि साल 2006 में लालू ने irctc के टेंडर में घालमेल किया औऱ जिन लोगों को
टेंडर मिला उनसे बदले में जमीन ले ली गई.
2004 से शुरू
होती है कहानी !
आईआरसीटीसी के
गठन के बाद साल 2004 में ये तय किया गया कि रांची और पुरी स्थित रेलवे के होटल
बीएनआर का संचालन भारतीय रेलवे से लेकर आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा. इसके ठीक बाद
ही लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री के तौर पर पदभार संभाला. सीबीआई के अनुसार उनकी
नजर इस फैसले पर पड़ी और वे ‘साजिश’ में लग गए.
साजिश में शुरू
से शामिल थे आरोपी !
सीबीआई के अनुसार
इस साजिश में सभी आरोपी शुरू से ही शामिल थे. इसमें सुजाता होटल्स के मलिक हर्ष
कोचर व विनय कोचर, लालू के करीबी पीसी गुप्ता की पत्नी सरला
गुप्ता और आईआरसीटीसी के अधिकारी की मुख्य भूमिका रही. साजिश के तहत होटलों पर
अधिकार पाने के लिए पूरी योजना बनाई गई और एक साथ ही कई काम हुए.
डेढ़ करोड़ के
सौदे के साथ हुई शुरूआत
इसी साजिश के तहत
कोचर बंधुओं ने फरवरी, 2005 में पटना
में तीन एकड़ की प्राइम लैंड का सौदा एक करोड़ 47 लाख में तय किया. जमीन को डिलाइट
मार्केटिंग कंपनी को बेच दिया गया. इस कंपनी का मालिकाना हक प्रेम चंद गुप्ता की
पत्नी सरला गुप्ता के पास था. दावा है कि यह लालू यादव की ही बेनामी कंपनी थी. दूसरी तरफ आरोप
ये भी है कि लालू को जमीन मार्केट के भाव से बेहद कम दाम पर सौदा हुआ. लेकिन असल
सवाल तो ये है कि आप हम या कोई भी घर जमीन खरीदता है तो रजिस्ट्री सर्किल रेट से
करता है और लेन देन मार्केट के भाव से किया जाता है तो फिर ऐसे में हर नागरिक जमीन
या मकान खरीदता और बेचता है वो चोर है, भ्रष्टाचारी है. इतना ही नहीं सीबीआई ने इस
केस में बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को भी साजिशकर्ता माना है जो उस वक्त नाबालिग
थे. वहीं राबडी देवी को भी इस FIR में लपेट दिया गया जबकि वो पूर्व मुख्यमंत्री है
और लालू यादव की पत्नी भी. जमीन का सौदा साल 2004 में हुआ और टेंडर 2006 में तो जाहिर
है ‘तोता’ एक साजिश के तहत
काम कर रहा है . क्योंकि सीबीआई के पास 6562 केस लंबित है , जिसमें व्यापम जैसा
व्यापक घोटाला शामिल है, इस घोटाले में 2400 लोग आरोपी है, 1900 लोग जेल में है
जबकि 49 लोगों की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो चुकी है बावजूद इन सबके तोता कुछ
ठोस नहीं निकाल पा रहा है. न सीएम से सवाल है न सीएम के पास कोई जवाब, जबकि राज्य
के स्तर पर इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया और सीएम को कानों कान खबर नहीं हुई
ये सोचने वाली बात है .वहीं मध्यप्रदेश से आगे बढ़िए और चलिए छत्तीसगढ़. वहां भी
बीते 15 साल से बीजेपी की सरकार है लेकिन 36000 करोड़ के चावल घोटाले में कोई ठोस
कार्रवाई नहीं हुई है, नाही राज्य सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपा है तो फिर जिस
बीजेपी की सरकार को लालू पर हुई कार्रवाई सहीं लग रही है उसके नजर में छत्तीसगढ़
का चावल घोटाला क्यों कोई जगह नहीं बना पा रहा है ये तो अपने आप में सवाल है . देश
के ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकार बन चली है ऐसे में विपक्ष बीजेपी को
पटखनी देने के लिए नए नए रास्ते तलाश रहा है. इसी कड़ी में लालू के फोर्मूले ने
बीजेपी को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है .लालू ने बिहार में महागठबंधन तो
बना ही रखा है साथ ही उनकी कोशिश है कि यूपी में मायावती और अखिलेश साथ मिलकर
चुनाव लड़े . राज्यसभा न पहुंचने के काबिल रहीं मायावती को लालू ने बिहार से राज्यसभा
भेजने का फैसला लिया है और इसी शर्त के साथ की वो यूपी में अखिलेश के साथ 2019 के
चुनाव में गठबंधन करेंगी. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो फिर 54 प्रतिशत वोट बैंक इस
वोटबैंक के पास चला जाएगा और बीजेपी के हिस्से में 28 से 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे.
मतलब बिहार के फोर्मूले से बीजेपी को यहां भी मात दिया जा सकता है बिहार की 40
लोकसभा की सीट और यूपी की 80 लोकसभा की सीटों पर अगर बीजेपी का गणित गड़बडा जाता
है तो फिर मोदी दोबारा पीएम बनेंगे या नहीं ये कहा नहीं जा सकता. इसलिए ये माना जा
सकता है बीजेपी अपने नए नीति के तहत लालू को टारगेट कर रही है क्योंकि जिस नेता या पार्टी पर भ्रष्टाचार के
दाग लगेंगे उसके साथ कोई खड़ा नहीं होना चाहेगा और अगर ऐसा होता है तो फिर विपक्ष
का बिखरना और बीजेपी की जीत लगभग तय है. ऐसे हालत के बीच सरकारी तोते पर सवाल तो
होना ही चाहिए की देश में लालू के केस के अलावा और भी कई बड़े केस है लेकिन उसकी
दिलचस्पी उस केस में क्यों है जिसमें साक्ष्य अब भी साफ नहीं है औऱ घोटाले की रकम
ज्यादा से ज्यादा 80 से 100 करोड़ के बीच की है. सीबीआई के मौजूदा एक्टिंग डॉयरेक्टर
गुजरात से है और लालू के पुराने विरोधी है तो फिर साजिश की बू तो आनी तय है.. इसलिए
ये सवाल लाजमी है कि क्या मोदी सरकार लालू को देश के सामने एक भ्रष्टाचार के सैंपल
के तौर पर पेश कर 2019 की बिसात को बिछा रही है.
Monday, July 3, 2017
जब जिंदगी ने यू टर्न ले ली......
वो शाम कुछ अजीब सी थी, दिल को लग रहा था कि कुछ तो अलग है लेकिन क्या ये जानने के लिए दिल बेचैन था, खिड़कियों से कभी झांकते तो कभी बालकनी में आना जाना कर रह था, मन नही लगा तो नीचे मार्केट में चला गया, सिगरेट की डिब्बी ली और चल पड़ा, कुछ समझ नही आ रहा था तो सोचा कि कुछ दूर पैदल चल लू, कुछ दूर ही आगे गया था, की सिगरेट जलाने की तलब हुई, सिगरेट जलाने ही वाला था की एक आवाज आई, कि रोहन तुम और सिगरेट , ये कब से शुरू किया तुमने, उसकी आवाज से ही मुझे इल्म हो गया था कि ये गुंजन है , जिसने इतने अधिकार से मुझसे सवाल किया था, वो मुझसे कुछ पूछती इससे पहले मैंने बोला, अरे तुम किसी हो, यहाँ अचानक, सब ठीक तो है, वो मेरे सवालों का जवाब देती उससे पहले ही मेरी नजर उसके चेहरे पर गई, न मांग में सिंदूर था, न गले मे मंगल सूत्र, मैंने फिर सवाल किया ये क्या हाल बना रखा है तुमने, क्या हुआ ? मेरे सवालों को दोहराते हुए गुंजन ने बोला अरे बाबा वही तो पूछ रही हूँ, कि ये क्या हाल बना रखा है ? मैंने कहा ये सब तो ऐसे ही है ये छोड़ो तुम बताओ की माथे पर से सिंदूर गायब, न गले मे मंगलसूत्र आखिर हुआ क्या ? मायूसी भरे चेहरे के साथ वो बोली अब हम और सौरभ साथ नही है, मैन पूछा कि क्यों क्या हो गया ? वो बोली लम्बी कहानी है कभी और, फिलहाल मुझे देर हो रही है मैं बाद में मिलती हूँ, मैं कुछ और पूछता उससे पहले गुंजन bye बोल कर जा चुकी थी, मैं वही से उल्टे पाव रूम पे वापस चला आया, न खाना खाया न पानी पिया, गहराती रात के साथ रफी और किशोर के नगमे मुझे बार बार गुंजन के बारे में सोचने पर मजबूर कर रहे थे । सिगरेट होटो पर लगा तो रहा था लेकिन जलाने की हिम्मत नही हो रही थी न जाने गुंजन की बातें कानो में गूंजे जा रही थी, जैसे तैसे रात तो बीत गयी, सुबह से ही बाजार के चक्कर काटने शुरू कर दिए इस ख्याल से क्या पता गुंजन से मुलाकात हो जाये लेकिन 3 दिन इंतज़ार में ही कटे । चौथे दिन एक unkonw नंबर से फोन आया , हाँ हेलो कौन , हा रोहन मैं गुंजन ,कहा हो तुम , क्या तुम मिल सकते हो अभी, मैने बिना किसी देर के कहा हा बोलो कहा आना है , उसने कहा कि यहा नही citiiwalk में मिलते है मैंने झट से हा कहा और 4 बजे का वक़्त तय हुआ । मारे खुशी के तो जैसे मेरा ठिकाना ही न रहा, मैं वक़्त से पहले पहुँच कर इंतज़ार करने लगा, 4 बजकर 10 मिनट हो चुके थे, गुंजन को मेरी नजरे बेसब्री से तलाश रही थी वक़्त 4 बजकर 30 मिनट हो चुका था लेकिन वो अब भी नही आई, मैन सोचा कि उसे फोन करू, फिर नही किया, 5बज ने को हुआ तो मैंने सोचा अब तो फोन कर लेना चाहिए लेकिन तभी आवाज आई सॉरी , वो क्या है न बाल कोंब नही हो पा रहे थे, मैन मुस्कुरा कर बोला कोई बात नही, फिर गुंजन ने अपने मिलने का कारण बताया, दरअसल गुंजन अपने डिवोर्स को लेकर परेशान थी और बीते 3 दिन से वो इसी सिलसिले से यूपी के सहारनपुर में थी । अपने बीते 5 साल की पूरी दास्तान सुनाई, इसी बीच हमने हल्दीराम की राज कचौरी खाई और बीकानेर के मसाले डोसे हम दोनों बातों में इतने मसगुल थे कि वक़्त का पता ही नही चला कि कब 9 बज गए, अपनी आप बीती सुनाते कभी गुंजन की आंखे नम होती तो कभी मेरे जवाब पर वो मुस्कुरा देती , फिर रात में मैं और गुंजन साथ ही वहाँ से निकले, चूंकि रात हो गयी थी तो मैंने गुंजन को ऑटो से उसके घर तक छोड़ दिया , फिर पूरी रात गुंजन की बातों को सोच कर बीत गयी ।कैसे उसके पति ने उसे यातनाएं दी कैसे वो अपने जिंदगी के 5 सबसे बुरे साल बिता कर आई थी , यही सब सोचते सोचते न जाने कब सुबह हो गयी । मै आफिस के लिए तैयार ही हो रहा था तभी गुंजन का फोन आया कि यार क्या तुम मेरे लायक कोई नौकरी ढूंढ सकते हो ? मैन बिना कुछ सोचे हा बोल दिया और बोला कि एक cv तुम मुझे भेज दो । फिर मैं देखता हूँ । देर शाम गुंजन ने अपना cv भेज दिया था, मैं उसकी cv को एडिट कर रहा था तभी मेरे दोस्त अभिनव का फोन आया कि यार कोई अकाउंटेंट हो तो बता दे, उसके कंपनी को जरूरत है मैंने कहा कि कल तक का वक़्त दे बताता हूँ, । कल सुबह मैन अभिनव से मिलने का वक़्त मांग लिया फिर मैं अभिनव के दफ्तर गया और उसे एक cv दी, cv देखते ही अभिनव ने कहा कि तू होश में तो है, तुझे ये कहा से मिली, फिर मैंने अभिनव को सारी कहानी बताई , अभिनव ने मेरी बातों को सुन कर कहा कि यार क्या बुरी किस्मत है उसकी, तेरे जैसे बतमीज़ से दूर हुई तो बेचारी के किस्मत में सनकी आ गया , खैर तू कॉफी पी मैं कोशिश करता हूँ । अभिनव ने जिस बतमीज़ की बात की वो दरअसल बीते सालों में वो मेरे ऊपर पूरी तरह से हावी था, अपनी बात मैं सबसे मनवता तो था साथ ही सबसे बतमीजी से बात भी करता था, यही कारण था कि धीरे धीरे गुंजन मुझसे दूर हो गयी थी ।लेकिन वक़्त बदला और गुजन के जाने के बाद मैं भी .... वक़्त बीतता गया और बीतते वक़्त के साथ गुंजन और मेरी बात फिर ज्यादा ज्यादा देर के लिए होने लगी । गुंजन को अभिनव की कंपनी में नौकरी भी मिल गयी थी । 6 महीने कब बीत गए पता ही नही चला, पहले तो एक दिन भी काटना मुश्किल था ।एक दिन अचानक गुजन का फोन आया कि कहा हो तुम अभी मिलो मुझसे , मैन बोला बताओ कहा आना है उसने बोला तुम कहा हो , मैं तो अपने कमरे में हूँ, kk आती हूँ । थोड़ी देर में गुजन मेरे घर पर थी , वो दरवाजे पर ही थी तभी मैने बोला कि ये मायूसी क्या बात है बताओ , गुजन के जुबां से शब्द बाहर नही आये थे लेकिन उसकी आंखों की मोतियों ने बात बता दी , मैं उसे चुप करवा ही रहा था की वो सिसकते हुए बोली आज कोर्ट ने हमारे डिवोर्स पर मुहर लगा दिया है , और आज ही पिताजी मुझसे कोई मिश्रा जी के बेटे के बारे में सोचने को कह रहे है , मैन तो साफ साफ बोल दिया कि भाई मेरे बस की नही ये शादी वादी, मुझे नही करना ।दोबारा गुजन की शादी के नाम से जो मेरे अंदर डर अभी जन्म ले रहा था वो गुजन की आखरी बातों को सुन कर खत्म हो गया । थोड़ी देर की चुप्पी के बाद गुजन ने मुझसे पूछा कि तुमने अभी तक शादी क्यों नही की , मेरे दिल ने कहा कि कैसे करता तुम जो चली गयी थी मुझसे दूर ,,, लेकिन जज्बातों को संभालते हुए मैने कहा कि जो गलतियां कि मैंने कम से कम इस जन्म तो उसका पश्चाताप कर लेने दो , मेरी बातों को गौर से सुन रही गुजन बोली अरे ऐसे कौन करता है , वो मुझसे कुछ और पूछती उससे पहले मैने कहा कि जानती नही हो मुझे मैं तो जो चाहता हूँ वही करता हूँ ,, इस बात को बोलने के बाद मैं कॉफी बनाने चला गया और गुजन पीछे से मुझे शादी करने के 50 फायदे गिनवाती रही ......
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