Saturday, July 11, 2015

इतने से काम नहीं चलता और चाहिए....





लोग अक्सर बापू से एक सवाल करते थे कि आप एक ही धोती को पहनते भी हैं और आधा ओढ़ते भी है ,ऐसा क्यों?  बापू इस बात का जवाब बड़ी सहजता से देते हुए कहते थे कि “मैं वो पहनता हूं जो मेरे देश का न्यूनतम वर्ग का नागरिक आसानी से पहन सकें।“ जी, लेकिन अब बदलते वक्त के साथ हमारे देश के नेताओं के विचार भी बदलने लगे हैं। सभी नेताओं के जुबान से आज भी गांधी जी के आर्दशों के बारे में अक्सर सुनने को मिल जाता है लेकिन वो खुद बापू के विचारों को अपने जीवन में कितना उतारते है यह तो आपके सामने ही हैं। हमारे देश में वीवीआईपी कल्चर कुछ इस कदर बढ़ चुका हंै कि एक बच्ची घंटो जाम में फंस कर जान से हाथ धो बैठती है क्योंकि नेताजी के स्वागत में इतने समर्थक आ गये कि दो घंटे तक शहर जाम हो गया । उस बच्ची को तत्काल ईलाज की जरूरत थी लेकिन उस बच्ची के मां-बाप अपनी फूटी किसमत पर रोते रह गये । इन दिनों टीवी , रेडीयो पर सरकार समर्थवान लोगों से गैस की सब्सीडी त्यागने का आवेदन कर रही हैं लेकिन  देश के माननीय सांसद ,उनके रिशतेदार और संसद भवन में काम करने वाले सरकारी लोग खुद संसद भवन में सब्सीडी वाली लजीज व्यंजन का मजा लेते दिख जांएगे । बीते महीनें की बात है कि हमारे देश के पीएम भी संसद भवन की कैंटीन में जाकर खुद सब्सीडी वाला भोजन का लूफ्त ले आये थे । आप संसद भवन की कैंटीन का रेट तो जानते ही हैं। 20 रुपये की मटन करी और 4 रुपये प्लेट चावल। दो रुपये में पूड़ी सब्जी खा सकते हैं। अंत्योदय योजना कहीं ठीक चल रही है तो वो संसद भवन की कैंटीन है।जब कैंटीन से सब्सीडी हटाने की बात की गयी तो एक सांसद महोदय ने यहां तक कह दिया कि ऐसा करके हम गरीबों के पेट में लात नहीं मार सकते । तो इन बात को सुन कर लगा कि देश का सबसे गरीब तबका क्या संसद में है या फिर वो आंकड़े सच है जो बताते है कि देश में अब भी 28 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं  । 20 करोड़ भूखे लोग भी है जो पूरे विश्व में कहीं भी नहीं है । हम इस मामले में पहले स्थान पर है । इस बात की मुबारकबाद किसी दी जानी चाहिए ?  क्या कोई है जो इस दुर्गति का ठिकरा अपने माथे ले या फिर वहीं होगा जो देश में आक्सर होता हैं आरोप-प्रत्यारोप । खैर ,इस मसले से आगे निकलते हुए हम सांसदो के वेतन के बारे में बात करने जा रहे है ।  आपको कई जगह ऐसा मिलेगा कि सासंद साहब पार्षद का काम कर रहे हैं, विधायक जी अपनी जिम्मेदारी सांसद पर टाल रहे हैं। इसी का लाभ उठा कर कई सांसद कई जगहों से सुविधा भी ले लेते हैं।

नैनिताल से बीजेपी सांसद भगत सिंह कोश्यिरी को देहरादून में पूर्व मुख्यमंत्री के नाते एक सरकारी मकान मिला हुआ है। इस बंगले के रखरखाव और सुरक्षा पर राज्य सरकार एक साल में करीब 40 लाख रुपये खर्च कर देती है। पूर्व मुख्यमंत्री के नाते इन्हें तीन सहायक रखने के लिए हर महीने 85 हज़ार रुपये मिलते हैं।

हरिद्वार से बीजेपी सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक को भी पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सरकारी बंगला मिला हुआ है। आरटीआई की जानकारी बताती है कि 2010 से 2011 के बीच यानी एक साल में पूर्व मुख्यमंत्री के नाते निशंक को मिली सरकारी कार के पेट्रोल और रखरखाव पर 22 लाख रुपया खर्च हुआ है। मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उत्तराखंड से विधायक बनने के बाद भी दिल्ली में मिले सरकारी मकान को छोड़ नहीं पा रहे हैं। नारायण दत्त तिवारी के पास देहरादून और लखनऊ में पूर्व सीएम के नाते सरकारी मकान मिला हुआ है।

 तो दूसरी ओर पंद्रह जून से हमारे सैनिक जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद कितनी आसानी से अपनी सुख सुविधा और सैलरी बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं। संसदीय कमिटी ने सांसदों की तनख्वाह डबल करने का सुझाव दिया है। इसके बाद हमने कमेटी के चैयरमैन गोरखपुर से सासंद योगी आदित्यनाथ की सैलरी का हिसाब लोकसभा की साइट से निकाला है। उसी के आधार पर मौजूदा और प्रस्तावित हिसाब बताते हैं।
मार्च 2015 में आदित्यनाथ जी को कुल 3 लाख 8 हज़ार 666 रुपये मिले थे।
बेसिक - 50,000
संसदीय क्षेत्र भत्ता - 45,000
आफिस का खर्चा - 15,000
सहायक की सैलरी - 30,000
यात्रा और दैनिक भत्ता - 1,68,666

कमेटी ने सुझाव दिया है कि बेसिक 50,000को से बढ़ाकर 1 लाख कर दिया जाए। पूर्व सांसद के पेंशन को 20,000 से बढ़ाकर 35,000कर दिया जाए। सहायक को भी सांसद के साथ रेल में प्रथम श्रेणी एसी का फ्री टिकट मिले। पूर्व सांसद को भी एक साल में हवाई यात्रा के लिए 20- 25 टिकट फ्री मिले।
दिल्ली में घर, फोन, फर्नीचर मुफ्त मिलता है। स्टीमर का भी भत्ता मिलता है। देश की संसद में कोई-कोई  बिल पास करवाने में महीनों और साल गुजर जाते है लेकिन इस वेतन बढ़ाने के मामले में तो बमुश्किल 5 मिनट लगेंगे और ध्वनि मत से प्रस्ताव सभी पार्टियों की सहमती से पास हो जाएगा। जिस पार्टी की सरकार केन्द्र में है वही पार्टी दिल्ली विधानसभा के विपक्ष में हैं। जब दिल्ली के नेताओं में अपने वेतन को बढ़ाने की बात कही तो विपक्ष के नेता ने कहा कि हम वेतन बढ़ाने के खिलाफ में है और हम एक रुपये के वेतन में  भी काम करने को तैयार हैं। एक ही पार्टी के दो नेताओं का दो अलग-अलग पक्ष हैं किसे सहीं ठहराये और किसे गलत । खबर यह भी है कि गुजरात सरकार उन सरकारी स्कूल के टीचरों के वेतन नहीं बढाएगी जहां के बच्चे 10 वीं और 12वीं के परिक्षा में 30 प्रतिशत से कम पास हुए है । संयोग देखिए कि वहां भी बीजेपी की सरकार हैं। अगर यह व्यवस्था टीचरों पर लागू हो सकता है तो देश के सांसदो पर क्यो नहीं ? हर साल सांसदो के काम की समीक्षा करके उनके वेतन को बढ़ाने -घटाने का काम क्यों नहीं किया जा सकता है?सासंदों के काम को देखकर अगर वेतन तय किया जाने लगे तो इससे सुस्त पड़ी परियोजनाओं को भी बल मिलेगा और सांसद को चुन कर भेजने वाले नागरिकों की भी बल्ले - बल्ले हो जाएगी ।