Saturday, July 11, 2015

योग करके देखो अच्छा लगता हैं।


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दुनिया के किसी देश का कोई प्रस्ताव इस तरह स्वीकार हो और उसका ऐसे अनूठे तरीके से साकार होने की शुरुआत हो तो वह गर्व से सीना फुलाकर चलेगा। पूरे देश में एक आत्मसंतोष का भाव होगा। गर्व का अर्थ घमण्ड या बड़प्पन का भाव नहीं होता। इसका यह अर्थ भी नहीं होता कि हम स्वयं को अन्यों से विशिष्ट या श्रेष्ठतर मान रहे हैं। यह तो विश्व के कल्याण में, मानव समुदाय के हित में और विस्तारित करें तो प्रकृति और ब्रह्माण्ड के साथ मनुष्य को एकाकार कराने में अपनी विद्या के प्रयोग की विनम्र आत्मसंतुष्टि है। पर हम इसका खुलकर श्रेय नहीं ले सकते। ऐसा करने वाले को फुहर या अतिवादी या फिर फासीवादी तक करार दे दिया जाएगा। विचित्र स्थिति है।
अगर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून की मानें तो यमन को छोड़कर 192 देशों के लोगों ने योगाभ्यास में हिस्सा लिया जिनकी संख्या 2 अरब के आसपास जा सकती है। हमारे देश के प्रस्ताव पर योग दिवस के दिन दुनिया भर के 252 से ज्यादा शहरों में इतने ज्यादा लोगों ने योग किया। इनमें गांव, कस्बे आदि शामिल नहीं हैं। यह ऐसा रिकॉर्ड है जो शायद ही कभी टूटे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहां कि आज विश्व के किसी क्षेत्र में जिस समय सूरज की किरणें निकलेंगी वहां योगाभ्यासी होंगे। यह निश्चय ही ऐतिहासिक स्थिति है। स्वयं मून ने यह स्वीकार किया कि विश्व संस्था ने अनेक दिवस बनाए हैं लेकिन जैसा अप्रत्याशित जोश योग दिवस को लेकर दिखा वैसा पहले कभी नहीं हुआ।
यह तो विश्व के कल्याण में, मानव समुदाय के हित में और विस्तारित करें तो प्रकृति और ब्रह्माण्ड के साथ मनुष्य को एकाकार कराने में अपनी विद्या के प्रयोग की विनम्र आत्मसंतुष्टि है। क्या हम किसी बीमार की सेवा करके गर्व नहीं करते हैं? क्या हम किसी भटके हुए को सही रास्ता दिखाकर आत्मसंतोष का अनुभव नहीं करते? तो गर्व का अर्थ यह है।
वास्तव में भारत की संस्कृति की यही विशेषता रही है। हम कभी अपने योगदान को लेकर अहं भाव में नहीं आते, किसी को हेय या हीन मानने की भावना भारतीय संस्कृति सभ्यता का अंग नहीं हो सकता। योग अपने आप मनुष्य को अहं से परे निकालने की साधना है। यहां के जीवन दर्शन में सभी चर-अचर, जीव-अजीव में एक ही तत्व देखने का भाव हमें ऐसा होने से रोकता है। योग भी यही भाव पैदा करता है। योग जिसका अर्थ ही है जोड़ना यानी सम्पूर्ण दृश्य अदृश्य जगत को एक साथ जोड़ देने वाली विद्या। तो जो योग सबमें एक ही तत्व का दर्शन करता हो, योग साधक को परमतत्व से जोड़ देने की अवस्था में ले जाता हो, जो निजत्व से बाहर निकलकर समष्टितत्व तक व्यक्ति को विस्तारित कर देता हो, वहां किसी संप्रदाय, किसी जाति, किसी देश या किसी समाज को अपने से हेय या हीन मानने का भाव पैदा कहां से हो सकता है। जाहिर है, ऐसा वे लोग कह रहे है जो इसे समझते ही नहीं या इस मूल सच को स्वीकारते ही नहीं। तो जो सच जानते नहीं, जिनकी समझ की सीमायें हैं, वो अगर शोर मचा रहे हैं, उपहास उड़ा रहे हैं, इस पूरे प्रयास को हास्यास्पद करार दे रहे हैं तो इसका संज्ञान क्यों लिया जाए? ये अपना काम करें, हम अपना काम करें।
क्या हमने-आपने कभी कल्पना की थी कि भारत की पहल पर विश्व में ऐसा दृश्य कभी उत्पन्न होगा कि हर कोने से लोग निकलकर योग करेंगे और इसके लिए पूर्व तैयारी में भी उत्साह से शिरकत करेंगे? अगर यह अकल्पनीय घटित हो गया तो इस पर उत्साह मनाने, इसे अपनी उपलब्धि मानने या इस पर गर्व करने में समस्या क्या है? विश्व के किसी सुविज्ञ नागरिक को भारत के इस आचरण पर आपत्ति भी नहीं हो सकती है। जबसे संयुक्त राष्ट्रसंघ बना है, इस तरह महासभा में किसी प्रधानमंत्री द्वारा रखे गए प्रस्ताव को इतने कम समय में इतने ज्यादा देशों का सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिला था। देश के अंदर राजनीति होती है। देश के बाहर कोई राजनीति नहीं। सीमा के बाहर भारत के प्रधानमंत्री का मतलब भारत है। प्रधानमंत्री के किसी प्रस्ताव का इस तरह सोत्साह केवल औपचारिक स्वीकृति नहीं, जनता के बीच स्वीकार किए जाने का यह पहला ही अवसर है। इसलिए यह समूचे भारत के लिए गर्व का विषय है। मजहब, संप्रदाय, भाषा, संस्कृतियां ही नहीं, संप्रभुता, भूगोल और राजनीति की सीमाओं को लांघकर अगर इतनी संख्या में लोगों ने एक ही प्रकार की क्रिया किया तो इससे कुछ समय के लिए ही सही एकता का प्रादुर्भाव तो हुआ। योग ने पता नहीं कितने वर्षों बाद विश्व के हर कोने के लोगों को चाहे संख्या कितनी हो, एक धरातल पर लाकर खड़ा किया और यह मानवीय एकता का आधार बना है। इसे हम ऐतिहासिक क्यों न मानें! हम जानते हैं कि केवल एक दिन योग कर लेने से बहुत अंतर नहीं आएगा, लेकिन इसी के साथ यह रुक जाएगा ऐसा क्यों मान लें। यह हमारी ही तो जिम्मेवारी है कि प्रक्रिया आगे जारी रहे, बढ़े , इससे और लोग जुड़ते जाएं और एक कारवां विश्व समुदाय का योगमय होता रहे। इस आधार पर एक युग का बीजारोपण कह ही सकते हैं। प्रधानमंत्री ने राजपथ पर योग आरंभ होने के पूर्व के संक्षिप्त संबोधन में कहा भी आज से शांति, सदभाव को उंचाइयों पर ले जाने तथा मन के प्रशिक्षण के एक युग की शुरुआत हो रही है। प्रेम, शांति, सद्भावना एवं एकता को फैलाने का कार्यक्रम है।
इसका दूसरा पहलू भी है। हर राष्ट्र का अपना राष्ट्रीय लक्ष्य होता है। किसी राष्ट्र का लक्ष्य धन, सेना, व्यापार आदि के आधार पर महाशक्ति बनने का लक्ष्य हो सकता है। इस समय विश्व में ऐसा वातावरण निर्मित हो गया है जिसमें लगता है कि सभी राष्ट्रों को लक्ष्य एक ही है। ऐसा है नहीं। सुभाष बाबू ने कहा कि भारत की आजादी इसलिए नहीं चाहिए कि इसे सैनिक और आर्थिक महाशक्ति बनना है, इसे विश्व के लिए आदर्श महाशक्ति बनना है। यानी इसे अपने आचरण से ऐसा मानक बनना है जो आदर्श हो सके। तो क्या हो सकते हैं वे आदर्श? इसका वर्णन ज्यादातर महापुरुषों की सोच में परिलक्षित हो जाता है। उदाहरण के लिए गांधी जी ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता इसलिए नहीं चाहिए कि यह भी अन्य देशों की तरह ताकतवर होकर उन्हीं की पंक्तियों में खड़ा हो जाए, , यह भी अन्यों के समान अपनी आर्थिक और सैनिक शक्ति से भय पैदा करे। गांधी जी के अनुसार उसे धर्म के अनुसार आचरण कर दुनिया को सही रास्ते दिखाना है। वह रास्ता है, सत्य, अहिंसा, अस्तेय का। सत्य अहिंसा अस्तेय ये तीनों आष्टांग योग की पहली सीढ़ी यम के पांच तत्वों में से तीन हैं। तो भारत का राष्ट्रीय लक्ष्य यह है कि विश्व को भौतिकता की, भोग साधनों की और इसके लिए जितने तनाव, संघर्ष, टकराव, अस्त्र प्रतिस्पर्धायें हैं, मजहबी, सांप्रदायिक संघर्ष हैं उन सबसे बाहर निकालने के लिए विश्व की सामूहिक चेतना में परिवर्तन लाना। योग इसका केन्द्रीय साधन हो सकता है। व्यायाम योग का अंग है, लेकिन यही योग नहीं है। आसन, प्रणायामों के साथ यम नियम का ऐस भाव व्यक्ति के अंदर अपने आप पैदा होने लगता है कि वह राग, द्वेष, उपभोग लालसा से परे होकर विश्व कल्याण की दिशा में विचार करने लगता है। अगर व्यक्ति अकेले हैं तो फिर एक व्यक्ति का चरित्र ऐसा बनेगा, लेकिन अगर सामूहिक रुप से इसमें ज्यादा लोग जुड़ते हैं तो ऐसी चेतना का विकास सामूहिक होगा।
कांग्रेस प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरु द्वारा शीर्षासन करती हुई तस्वीर दिखाकर कह रही है कि नरेन्द्र मोदी को ऐसा करने में 15 वर्ष लग जाएंगे। किसने कहा कि कांग्रेस के नेता योग नहीं करते थे या नहीं करते हैं? योग न करते तो आजादी के संघर्ष में उतनी परिश्रम और सहनशीलता की शक्ति नहीं आती। किंतु इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को हीन साबित करना जरुरी नहीं था। यह तो अशालीनता है। ऐसे अवसर राजनीति के लिए नहीं होते। कांग्रेस जिस प्रकार से सूर्य नमस्कार का विरोध करने में लगी थी उससे तो यह साफ था कि देश में राजनीति अब यहां तक आ चुकी है कि हम एक विश्व स्तरीय कार्यक्रम पर एक सहमति बनाकर देश का नाम स्वर्ण अक्षरों में नहीं लिख सकते ।राजनीतिक सीमाओं से बाहर निकलकर इतिहास निर्माण और विश्व कल्याण में भूमिका निभाने के अवसर में सबको भागीदारी करने की आवश्यकता होती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राजपथ योग कार्यक्रम में भाग लिया जो कि स्वागत योग्य था। लेकिन उत्तराखंड सरकार ने स्वयं को इससे अलग रखा जो दुखद है। यह नहीं होना चाहिए था। यह किसी पार्टी का नहीं , भारत का आयोजन है जिससे पूरी दुनिया जुड़ रही है। पूरे देश को इसके महत्व, और अपनी भूमिका का भाना होना चाहिए।
  वास्तव में 21 जून 2015 से भारतीयों को यह अहसास होना चाहिए कि आपका अपने प्रति और विश्व के प्रति दायित्व क्या हैं। उस दायित्व के अनुरुप आपको आगे काम करना है। भारत के अंदर और इसकी सीमाओं को पार करते हुए व्यक्ति से समष्टि तक योग का सामूहिक विस्तार करने में तथा हमारी अपनी भूमिका का निर्धारण हमें ही करना है। हम ही अगर इस एक दिन को उपलब्धि मानकर इतिहास निर्माण मानकर  रुक जाएंगे तो फिर हमारा जो राष्ट्रीय लक्ष्य है, भटके हुए विश्व को बिना अहं पाले और बहुत तामझाम किए चेतना के स्वतः विकास की धारा बनाने का जो सपना है वह यही थम जाएगा। इसलिए 21 जून के बाद से भारत की व्यापक और चैतन्य भूमिका की शुरुआत होती है।