Tuesday, February 14, 2017

उत्तराखंड वालों वोट देना दिल नहीं !



ये साक्षात्कार तो पुराना है. आप जब इसे देख रहे होंगे तब तक उत्तराखंड में मतदान हो चुके होंगे लेकिन फिर आप सीएम हरीश रावत की बात सुनेंगे तो आपको ये महसूस होगा कि कैसे हर राजनीतिक दल के लिए चुनाव एक खेल जैसा है.हर पांच साल बाद ये आएगा और इसे राजनीतिक दल खेंलेंगे .इसमें कोई एक जीतेगा और कोई हारेगा. बहरहाल जनता के मुद्दे जस के तस ही रहेंगे. खैर आम तौर पर नैतिकता के बड़े बड़े दांवे करने वाली राजनीतिक पार्टियां, जब टिकट देने की बारी आती है तो न उनका ध्यान दागी पर होता है न बागी पर होता है..जिताउ कैंडिडेट के नाम पर पार्टिय़ां आपराधिक छवि वाले नेता से लेकर करोड़पति उम्मीदवारों को भी टिकट देने से नहीं चुकती है..जिस राज्य में अभी ठीक से मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है वहां आज  करोड़पति नेताओं की लंबी लाइन लग चुकी है...उत्तराखंड साल 2017 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर दागियों का बोलबाला देखने को मिल रहा है.। साल  2012 के चुनाव की अपेक्षा इस बार दोगुने आपराधिक मामलों में लिप्त नेता विधानसभा जाने की उम्मीद लिए चुनावी मैदान में उतरे हुए है .
कितने दागी है नेता जी ?

उत्तराखंड चुनाव में कुल 70 सीटों पर 637 प्रत्याशी है.
70 सीटों पर 637 प्रत्याशी में से  91  उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।जबकि 54  उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। 5 उम्मीदवारों के ऊपर हत्या , दूसरे 5 उम्मीदवारों के उपर हत्या की कोशिश का आरोप है. वहीं अन्य 5 उम्मीदवारों के ऊपर महिलाओं से अत्याचार के भी आरोप है.

किस पार्टी के पास कितने दागी ?

अगर दागी उम्मीदवारों को पार्टी के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी के 70  उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवार दागी है. वही  कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 17 उम्मीदवार दागी है. बीएसपी के 69 में से 7 उम्मीदवार दागी है.यूकेडी के 55 में से 4 उम्मीदवार दागी है सपा के 20 में से 2 उम्मीदवार दागी है. जबकि 261 निर्दलीयों में से 32 उम्मीदवारों के दामन पर दाग है.

किस पार्टी से कितने गंभीर आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशी

वहीं गंभीर आरोपों की बात करें तो बीजेपी के 70 उम्मीदवारों में से 10 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं वहीं कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 12 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. बीएसपी के  69 उम्मीदवारों में से 06 ,यूकेडी के 55 उम्मीदवारों में से 3 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं तो वही एसपी के 20 उम्मीदवारों में से 2 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं और 261 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 14 उम्मीदवारों पर संगीन धाराओं में मामला दर्ज है.आपको बता दें कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 में 10 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजनीतिक दलों के तरफ से हर सीट पर कम से कम 3 उम्मीदवार आपराधिक छवि वाले उतारे गए है.
कितने अमीर है नेता जी ?
उत्तराखंड में इस बार 637 उम्मीदवारों में  से दो सौ से ज्यादा करोड़पति उम्मीदवार हैं,  जबकि 78 उम्मीदवारों ने अपने आय का ब्यौरा नहीं दिया है. कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में 52 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीजेपी के 48 उम्मीदवार करोड़पति हैं। बीएसपी के 69 उम्मीदवारों में से 19 उम्मीदवारों की सम्पत्ति एक करोड़ से ज्यादा की है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार की औसत सम्पत्ति 1.57 करोड़ के आस-पास है। जबकि महिला उम्मीदवार चुनाव में पिछली बार 60 थी। इस बार कुल 28 महिलाएं ही चुनाव ऐ जंग में मोर्चा संभालने आयी हैं। 

इस लेख  को आप सहेज कर रख लीजिए औऱ जिन दिन कोई नेता उत्तराखंड में नौतिकता की बड़ी बड़ी बातें करें तो  उसे आप ये पढ़ कर सुना दिजिएगा...
मन भारी है इसलिए ज्य़ादा कुछ लिख नहीं पा रहा हूं लेकिन उत्तराखंड ंमें कोई भी जीते हारना जनता को ही है .उत्तराखंड की जनता चाहे जिसे वोट दे लेकिन दिल किसी को न दें...क्योंकि दिल तो बना ही है टूटने के लिए...नेता आपसे कुछ भी कहे लेकिन याद रखना ना ही आपके डॉक्टरों के आभाव से जुझने वाले सामुदायिक अस्पतालों के हालात बदलेंगे, न जोशीमठ में सड़कों की हालात दुरुस्त होगी.. और न ही वो  टिहरी की डोबरा चांटी पुल का अधुरा काम पूरा होगा.....

Friday, December 9, 2016

तो क्या नोटबंदी की सच्चाई पर मिट्टी डाल रही है सरकार ?

नोटबंदी का फैसला कितनी दूर तक मार करेगा ये कहना अभी थोड़ी जल्दबाजी होगी लेकिन मौजूदा सिस्टम के हालात को देखकर ये तो जरूर कहा ही जा सकता है कि नोटबंदी से आम जनता खुश तो है लेकिन व्यवस्था से भरपूर नाराज़ । कहीं 5 दिन बाद किसी एटीएम में पैसे आ रहे है तो कहीं पैसों के दर्शन ही दुर्लभ है क्योंकि एटीएम इतने दूर के इलाके में है कि रोज उसमें पैसे डाले नहीं जा सकते ।बात देश के किसी भी राज्य की क्यों न हो हालात तो सबके एक जैसे ही है । आप अपने हिसाब से किसी राज्य का सैंपल तो ले सकते है लेकिन लापरवाह सिस्टम के हालात एक जैसे ही होंगे । नोटबंदी के बाद बीते दिनों हमारा झारखंड  जाना हुआ था । शहर के हाल जितने खराब है उससे कही ज्यादा बुरा हाल ग्रामीण इलाकों का है। वहा 1 से 2 लाख की आबादी पर 1 बैंक है ।आप जरा अंदाजा लगाइये ही हर रोज अगर बैंक के बाहर 5 हज़ार लोग खड़े हो तो कैसा मंजर होगा । क्या आपको डर नहीं लगेगा ? बैंक में काम करने वाले कर्मचारी किस दबाव में काम कर रहे होंगे इस बात का आप अंदाजा लगा सकते है । वहा की पुलिस पर कैसा दबाव होगा आप इस बात का भी अंदाजा लगा सकते है कि कैसे 10 से 20 पुलिस वालों को हज़ारों की भीड़ को संभालना पड़ेगा । क्या पीएम ने नोटबंदी का फैसला लागू करने से पहले ऐसी परिस्थितियां होंगी ये सोचा था ? अगर सोचा तो फिर व्यवस्था क्यों नहीं हो पाई ,और इन अव्यवस्थाओं का जिम्मेदार कौन है ? अगर सोचा नहीं तो फिर जिस ग्रामीण क्षेत्र ने पीएम को आपार समर्थन दिया उसका ख्याल पीएम को क्यों नहीं आया? झारखंड जाने के बाद हमारी मुलाकात हमारे परिचित पवन जी  से हुई जिनकी शादी थी ।शादी के घरों के खर्चे का अंदाजा तो आप सबको होगा ऐसे में आप उनके हालत को बखूबी समझ भी सकते है । हमने उनसे उस दौरान बात भी की और उनके तकलीफ को समझने की कोशिश भी की । 


      बहरहाल ,   हम वापस लौट कर सत्ता के गलियारे दिल्ली की बात करते है ।जहाँ सत्ता को चलानेवालो से लेकर सत्ता की दलाली खाने वालों का अड्डा होता है ।नोटबंदी के फैसले पर पीएम ने देश से 50 दिन मांगे थे और लोगों ने पीएम की इस अपील को स्वीकार भी किया । पीएम ने कहा कि इस फैसले को टॉप सीक्रेट के तौर पर लागू किया गया ताकि चोरो को इसकी भनक नहीं लग पाएं । अब सवाल यही से खड़ा होता है कि क्या ये वाकई सीक्रेट था या बीजेपी को इसकी जानकारी थी ? क्योंकि नजर डाला जाएं तो 6 नवम्बर को बीजेपी के एक नेता संजीव कंबोज ने ट्वीट करते हुए कहा कि rbi जल्द 2 हजार के नोट लागू करेगी । साथ में उन्होंने  तस्वीर भी साझा की । 







इतना ही नहीं नोटबंदी के बाद 2000 के नए नोटों की खेप गुजरात से लेकर बंगलोर और मनाली तक में पकडे गये और इनके पास नए नोटों की खेप लाखों से लेकर करोडों तक में थी ।हाल में ही  में बीजेपी नेता मनीष  और कोल माफिया के पास से 33 लाख के नए नोट जब्त हुए,लेकिन देखा जाये तो सरकार ने देश की किसी आम नागरिक को 1 हफ्ते में 24 से ज्यादा निकालने की अनुमति दी ही नहीं है। गोवा में 1.5 करोड़ और तमिलनाडु के सीएम पनीरसेल्वम के करीबी के पास से 70 करोड़ और 100 किलो सोना का पकड़ा जाना क्या बताता है । इसके दो पहलू है कि इस देश का एक सिस्टम तो चोरी करने में मदद कर रहा है तो दूसरा उसे दबोच भी रहा है । बिज़नस क्लास से लेकर दूतावास तक हफ़्ते में 50 हज़ार से ज्यादा निकासी नहीं कर सकते ।शादी वालो को 2.5 लाख का प्रवधान दिया गया है लेकिन नियम ऐसे की आप उसे पूरा ही नहीं कर पाएं । सरकार ने शादी का पैसा उसे ही कैश में देने की अनुमति दी है जो साबित करें की उन्हें जिन्हें पैसा देना है उसके पास खाता नहीं है । सरकार ने 8 नवम्बर नोटबंदी के एलान के बाद  से अपने फैसले में छोटे बड़े कुल 27 बदलाव किये है ,लेकिन सवाल नियमों में बदलाव से ज्यादा उस व्यवस्था को लेकर है जिसमे भेदभाव नजर आ रहा है ।बिहार के ही एक पत्रकार ने ये खुलासा किया कि बीजेपी ने बिहार में बड़ी मात्रा में नोटबंदी से पहले कैश देकर जमीनों की खरीद की ,फ़िलहाल खुलासे के बाद से जांच के आदेश हुए है । बीजेपी नेता के पास से नए नोटों की खेप हो या नोटबंदी की पहले से ही जानकारी क्या ये संयोग मात्र है ?गौर किया जाए तो  कालाधन की बात करते करते अब सारी की सारी डिबेट कैशलेश इकॉनमी पर हो रही है ? नोटबंदी से कालाधन सरकार के खाते में नहीं आता देख सरकार ने 50-50 स्कीम के तहत अपना काला धन वैध कर सकते है यानि वाइट मनी में कन्वर्ट कर सकते है । कैशलेस इकॉनमी का जो मॉडल कालेधन के खिलाफ  बनाने की कोशिश हो रही है वो कितना सटीक बैठता है इसका तो बाद में पता चलेगा लेकिन सवाल तो ये है कि क्या हम वाकई कैशलेस इकॉनमी में फिट बैठते है ? क्या कैशलेस होने से हमारे देश में टैक्स की चोरी रुक जाएगी ?क्या कैशलेस लेनदेन में काला बाजारी नहीं होगी ? तो फिर इसका जवाब भी सुन लीजिए,जी नहीं । कैशलेस लेनदेन में चोरी करना बड़ी मछलियों के लिए और भी आसान होगा और बैंको को जो फायदा होगा, ऑनलाइन पेमेंट करने वाली कंपनयियों को फायदा होगा वो तो होगा ही । अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ की सालाना टैक्स चोरी होती है. जिस तरह भारत में आयकर विभाग है, उसी तरह अमेरिका के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है, जिसके अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल औसतन 458 अरब डॉलर की टैक्स चोरी हुई है. अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही हिसाब लगाया है तो अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो जाती है. यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेस का ऐसा प्रचार किया जा रहा है, जैसे यह हींग की गोली है, जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मी को दूर कर देगी. फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है. 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ रहता है. वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल पाता है. यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है. ब्रिटेन में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है. भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़ की चोरी. जापान की नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल 13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है. भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी होती है. 1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है.मान लीजिए कि पूरी आबादी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी. क्या यह उनके लिए मुमकिन होगा. दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं. आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के तकनीकी नामों वाले बहीखाते रख देंगे. लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाए, तो उसके लिए ऐसे नामों वाले बहीखाते नहीं होते. उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूदकर जान देनी पड़ती है या ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है. क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्रिब्यूनल है. 2015 में Independent Commission for the Reform of International Corporate Taxation (ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुका है.अब बताइए, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है. इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार 'गार्जियन' में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है. इतने तथ्य हैं और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए. इस रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं, उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर पड़ता है, क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं. एक-दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं. इन मल्टीनेशनल कंपनियों की टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोक कल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा कम कर देती हैं.

फिलहाल सरकार जो भी कदम उठा रही है और लोकलुभावन बातें कर रही है उनसे ये तो साफ है कि सच कुछ और है और दिखाने की कोशिश कुछ और ही हो रही है.सरकार के हर कदम को संशय से देखने की जरूरत इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये संशय और आपका सवाल करना एक सकारात्मक माहौल पैदा करेगा जो मजबूत लोकतंत्र की नींव है..सरकार वक्त मांग रही है और लोग देने को तैयार है लेकिन मौजूदा हालात में सरकार का बयान सच्चाई पर मिट्टी डाल कर उसे छिपाने की कोशिश मालूम पड़ती है. ये सिलसिला यूं ही जारी रहेगा अगर आप ऐसे ही मूकदर्शक बने रहेंगे और आपकी छुप्पी भी सच्चाई पर मिट्टी डालने जैसे ही होगी. 

Friday, November 18, 2016

तो जनता नहीं नोटबंदी दिलाएगी दोबारा सत्ता ?

सरकार की खींची लकीर जब छोटी पड़ जाएं तो क्या हो..जब 1000 का नोट अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन खड़ा हो जाए तो क्या हो ? 1000  के नोट के कमर को तोड़ने के लिए पॉलिसी भी बने तो 2000 के नोट से. फिलहाल तो अर्थव्यव्स्था वाले पंडित कुछ कहने से कतरा रहे है कि देश की व्यवस्था पर 2000 का गुलाबी नोट कौन सा रंग चढ़ाने जा रहा है...ये रंग बलखाती गुलाबी हो गई या झंझुलाहट वाली सुर्ख लाल ये सब महज कयास है लेकिन सच तो कुछ और ही बयां कर रहा है.जब संसद सड़क के सामने छोटी लगने लगे तो फिर नेताओं का रास्ता जाता किधर है। सड़क के हालात बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के करीब 55 करोड़ लोगों ने वोट डाले लेकिन आज की तारीख में शहर दर शहर गांव दर गांव 55 करोड़ से ज्यादा लोग सड़क पर उस नोट को पाने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं जिसका मूल्य ना तो अनाज से ज्यादा है और ना ही दुनिया के बाजार में डॉलर या पौंड के सामने कहीं टिकता है। फिर भी पहले वोट और अब नोट के लिये अगर सड़क पर ही जनता को जद्दोजहद करनी है तो क्या वोट की तर्ज पर नोट की कीमत भी अब प्रोडक्ट नहीं सरकार तय करेगी। क्योंकि मोदी सरकार को 31 फिसदी वोट मिले। यानी खिलाफ के 69 फिसदी वोट का कोई मूल्य संसदीय राजनीति में कोई मायने रखता ही नहीं है। ठीक इसी तरह 84 फीसदी मूल्य के नोट के खत्म होने के बाद 16 फिसदी मूल्य की रकम महत्वपूर्ण हो गई। यानी रोजाना चार हजार रकम के खर्च करने का समाजवाद सड़क पर आ गया। तो क्या समाजवाद के इस चेहरे के लिये देश तैयार हो चुका है या फिर जिस संसद की पीठ पर सवार होकर लोकतंत्र का राग देश में गाया जा रहा है, पहली बार संसदीय लोकतंत्र को ही सडक का जनतंत्र ठेंगा दिखाने की स्थिति में आ गया है। और यहीं से बड़ा सवाल निकल रहा है कि आखिर बुधवार की सुबह जब संसद शुरु होगी तब राजनीतिक सत्ता के कर्णधारों का रास्ता जायेगा किस तरफ। क्योंकि संसद का महत्व तो तभी है जब संसद में जनता के हित में कोई निर्णय है। या फिर संसद के सरोकार जनता से जुड़े। 

और सच यही है कि पहली बार राजनीतिक सत्ता ने संसदीय राजनीति की धारा के खिलाफ निर्णय लिया है। और नया संकट उस पारंपरिक राजनीति के सामने है जो अभी तक ये सोचती रही कि संसद के दायरे से सड़क को संभाला जा सकता है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या संसद छोड़ सड़क की राजनीति को थामना ही अब हर राजनीतिक दल की जरुरत है। दूसरा ,क्या संसदीय राजनीति के भीतर का भ्रष्टाचार नई परिभाषा गढ रहा है। तीसरा , क्या संसदीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चला है कि पीएम ने खुद को ही जनता के साथ जोड़ लिया है। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद ही जब सड़क के जनतंत्र को संभालने की स्थिति में नही होगा तो क्या ये कहा जा सकता है कि भारत बदल रहा है । या फिर फेल भारत सफल होने के लिये छटपटा रहा है । क्योकि बीते 70 बरस की सियासत ने दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश को बाजार में बदल दिया है। नागरिकों को कन्ज्यूमर बना दिया है। उत्पादन से बड़ा नोट हो गया है। खेती से ज्यादा कमाई सेवा क्षेत्र ने समेट ली। और संसद की नुमाइन्दगी भी रईसों के इर्द -गिर्द घुमड़ने लगी। नीतियां पैसेवालों के लिये बनने लगी। योजनाओं के दायरे में 80 फीसदी नागरिक पैकेज पर टिक गया। 20 फीसदी उपभोक्ता के लिये बजट बनाया जाने लगा तो ऐसा फैसला चाहे अनचाहे देश को ऐसे मुहाने पर खड़ा तो कर ही गया है, जहां से हर राजनेता का रास्ता अब संसद की तरफ नहीं सडक की तरफ जाता है। क्योंकि सडक की सियासत का रास्ता अभी भी एक रुपये को महत्व देता है और संसद के भीतर 500 या दो हजार के नोट मायने रखते है। और कभी नोट को ध्यान से देखिये तो सिर्फ एक रुपये की जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। बाकि हर नोट पर रिजर्व बैक धारक को नोट देने का वायदा करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे खेत खलिहानों में किसानों को बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मिल सके इस जिम्मेदारी की बात तो भारत सरकार करती है। लेकिन उपजाये गया अनाज की कीमत बाजार में होगी क्या ये भारत सरकार नहीं बल्कि मंडी चलाने वाले दलाल तय करते हैं। तो सोचना शुरु कीजिये आखिर क्यों देश की इकनॉमी नोटों की अर्थव्यवस्था पर चलायी जा रही है। ना कि उत्पादन। खेती और मानव संसाधन पर। आखिर ऐसे हालात क्यों बनाये जा रहे है, जहां किसान की फसल नोट के सामने बेबस है। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छात्र अनपढ़ करोड़पति के सामने बेबस हैं। और अपनी ही कमाई को लेने के लिये हर नागरिक बैंक के सामने बेबस हैं। 

तो क्या भारत की इकनामी धीरे धीरे व्यवसायिक बैंकों की खाली खातों में रकम लिखकर और भरकर आगे बढ़ कर रही है। यानी देश को बाजार में बदलने के बाद उपभोक्ता संस्कृति का असल चेहरा अब सामने आ रहा है जब बाजारों की चकाचौंध भी दुनिया के सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाले देश में इसलिये थम गई है क्योंकि ना दिखाई देने वाली इक्नामी यानी नोट की कीमत सोना, चादी, जमीन, घर , अनाज से भी ज्यादा कीमती हो गई है और नोट के जरीये राजनीतिक सत्ता ही जनता से सिर्फ वायदा कर रही है कि अच्छे दिन आ जायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे नोट पर रिजर्व बैक धारक को वायदा करता है। यानी सच पर अभासी सच हावी हो चला है । और अभासी सच का हथियार है बैंकिंग सर्विस । यानी बैंकिंग सर्विस ही अब देश की इकनॉमिक सर्विस होगी, ये संकेत तो साफ हो चले हैं। तो जिस बैंक की टकटकी लगाये हर आदमी आज देश में देख रहा है उस बैंकिंग सर्विस का सच भी समझ लीजिये। क्योंकि यही वह बैंक हैं, जिनसे विजय माल्या कर्ज लेकर बिना चुकाये लंदन भाग सकते है। और यही वो बैंक है, जिनसे कर्ज लेकर ना चुकता पाने पर किसान को खुदकुशी करता है। और देश के 20-30 औघोगिक घरानों के पास बैंक का सवा लाख करोड़ से ज्यादा पड़ा है लेकिन वह बैंक को लौटा नहीं रहे और बैंक ले नहीं पा रहा। तो दो सवालो को समझना होगा। पहला, बैंकों में पैसा देश के नागरिकों का ही है। दूसरा,बैंक का 90 फिसदी पैसा सरकार या उघोगपति कर्ज पर लेते हैं। यानी आज जिस तरह जनता अपने ही रुपयों को पाने के लिये नोट बदल रही हैं। अगर देश का नागरिक सोच लें कि वह बैंकों से सारा पैसा निकाल लेगा तो क्या बैक उसे सारा पैसा देने की स्थिति में होगा। यकीनन नहीं। तो जरा बैंकिंग सर्विस के जरीये उन हालातों को समझें जहा आप एक लाख रुपये बैक में जमा कराते है । बैक उघोगो से ब्याज लेकर 90 हजार रुपये कर्ज में दे देता है। 90 हजार लौटने पर बैक 81 हजार फिर ब्याज लेकर कर्जपर दे देता है। यानी जनता के पैसे से बैक ब्याज लेकर जनता के पैसे को ही उघोगों या कारपोरेट को कर्ज देता है। बैंक की अपनी लागत कुछ नहीं होती। लेकिन बैंक का टर्न ओवर बढता जाता है। औऱ इस प्रक्रिया में रुपये की कीमत गिरती जाती है। यानी अगर लोग ये सोच लें कि कि बैंक से रुपया निकाल कर वह जमीन, सोना या अनाज ही खरीद लें तो बैक के पास इतनी रकम होगी ही नहीं। यानी जो बड़े बुजुर्ग आज बैंक की लाइन में खडे होकर अपने ही पैसों के लिये तरस रहे है अगर वह ये सोच रहे होंगे कि पहले की ठीक था। जब सामान बदलकर जिन्दगी चलती थी। तो समझना होगा कि 1933 में बैंकों ने गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म इसीलिये किया। जिससे रुपये की ताकत खत्म हो जाये। यानी पहले जितना रुपया लेकर बैक में व्यक्ति जाता था उतने का सोना-चांदी मिल जाता था। अब ये संभव नहीं है कि जितना रुपया आपने बैंकों में जमा किया उस कीमत में एक बरस बाद उतना ही सामान मिल जाये जो जमा करते वक्त था। और अगर किसी देश को रुपये की जरुरत होगी तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ देशों को कर्ज देते हैं। देश कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में नोट छापते हैं। और फिर महंगाई बढती है। समाज में असमानता बढ़ती है। और माना यही जाता है कि बैंकिंग सर्विस के जरीये ही सत्ता अपने नागरिको पर और ताकतवर देश कमजोर देशों पर राजकर अपनी नीतियों को लागू कराते है । तो लोकतंत्र का नया राग संसद से नहीं बैंक से मिलने वाले नोट पर जा टिका है।

Thursday, September 15, 2016

इस देश में कभी पैदा न होना 'तैय्यबा'



जी, इस वीडियों को देखने के बाद अगर आपकी रुह नहीं कांपी होगी तो आप खुद कोे परखिए की क्या वाकई आपके अंदर इंसानियत  जिंदा है भी या नहीं..क्योंकि ये शब्द यूपी के मथुरा की बेटी तयैय्बा की है जो मरने से पहले इंसाफ की भीख मांग रही थी.तय्यैबा के उपर एक सिरफिरे परिवार जो उसके पड़ोस में ही रहता था उसने उसपर एसिड फेंक दिया क्योंकि तय्यैबा उससे नहीं किसी और से शादी करना चाहती थी...बहरहाल आप जब ये वीडियों देख रहे होंगे उस वक्त तय्यैबा हमारे आपके बीच तो नहीं है लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू आप जान कर शर्मसार हो जाएंगे.जी, पीडि़त परिवार  ने यूपी के सबसे बड़े और ताकतवर नेता मुलायम सिंह के घर पर भी गुहार लगाई लेकिन वहां से भी उनके हाथ खाली रह गए...अभी तैय्यबा की जिंदगी तबाह करने वाले तीन गुनहगार फरार है और एक पुलिस की गिरफ्त में है...बड़ा सवाल है कि एसिड एटैक करने वालों के अंदर कोई खौफ क्यों नहीं है ? क्या ऐसे बेटियां महफूज रहेंगी इस मुल्क में...

Saturday, September 10, 2016

शहाबुद्दीन कैसे बने ‘साहेब'



तो 63 मुकदमों से घिरा, गैंगस्टर होने का आरोप झेल रहा, बाहुबली का तमगा पा चुका शख्स मोहम्म्द शहाबुद्दीन भागलपुर जेल से जमानत पर रिहा हो गए लेकिन उनको जमानत मिलने मात्र से बिहार की सियासत गरमा गई है. बीजेपी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने जानबूझ कर शहाबुद्दीन के केस में कमजोर पैरवी की है जिससे शहाबुद्दीन को जमानत मिल गई. वही सोशल मीडिया पर भी बिहार के लोगों से लेकर बिहार की सरकार तक को लोग दुत्कार रहे है लेकिन मैं आपको राजनीति नहीं बल्कि शहाबुद्दीन के बारे में कुछ अहम चीजें बताउंगा. मेरी इस लेख को पढ़कर आप ये समझ सकेंगे की क्यों बिहार के सिवान जिले में एक बड़ा तबका शहाबुद्दीन की पैरोकारी करता है.जी,तो सबसे पहले 1982-87 के दौर में चलिए जहां से शहाबुद्दीन के साहेब बनने का सफर शुरू हुआ. दरअसल शहाबुद्दीन को खुद को साहेब कहलवाने का बहुत शौक था लेकिन 1982-87 के दौर में लोग शहाबुद्दीन को शहाबुद्दीन के नाम से ही जानते थे.1980 का दौर और उससे पहले सिवान जिला कामरेडो का जिला था मतलब वामपंथियों का लेकिन शुरूआत में क्रांति जैसा मालूम होने वाला वामपंथ सिवान के लिए नासूर बन चुका था क्योंकि सिवान में न सिर्फ वामपंथ हावी था बल्कि माओवादियों का भी खूब बोल बाला था और इसी से त्रस्त होकर सिवान जिले के भुमिहारों ने शहाबुद्दीन को सशक्त करना शुरू कर दिया. भूमिहारों का साथ मिलते ही शहाबुद्दीन के दिन बदल गए. छोटे मोटे कांड में शामिल होने वाला शहाबुद्दीन पैसे और अपने गुर्गों से सश्कत होने लगा.धीरे-धीरे  शुरूआत हुई तो लोग शहाबुद्दीन के पास अपने काम को करवाने पहुंचने लगे और शहाबुद्दीन के यहां दरबार सजने शुरू हो गए.जनता और सत्ता का साथ पाता देख शहाबुद्दीनके हौसले आसामान छूने लगे और इसी कड़ी में शहाबुद्दीन ने माओवादियों और वामपंथियों के घर को खोखला करना शुरू कर दिया. शहाबुद्दीन की ताकत बढ़ती गई और वाम औप माओ सिवान से घटते गए.वाम और माओ के घटने के साथ ही शहाबुद्दीन का रुतवा बढ़ने लगा और लोग शहाबुद्दीन के साथ खड़े होते चले गए. भुमिहारों के समर्थन से खड़ा हुआ शहाबुद्दीन का नाम न जाने कब इतना बड़ा हो गया किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. बढ़ते नाम के साथ शहाबुद्दीन का कारोबार भी बढ़ने लगा और शहाबुद्दीन ने अपने आस पास नाजायज कामों का एक साम्राज्य ही खड़ा कर दिया. ऑटोमेटिक हथियार हो या रंगदारी या फिर हत्या या किसी का अपहरण हो हर जगह बस एक नाम . ऐसे में बढ़ते ताकत के साथ शहाबुद्दीन ने राजनीति में एंट्री बतौर विधायक की लेकिन बाद में देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानि लोकसभा तक जा पहुंचे.सत्ता और बाहुबल के खुमार में डूबे शहाबुद्दीन बिहार का बड़ा और खुंखार चेहरा साबित हुए. लेकिन उससे पहले आप एक किस्सा भी जान लिजीए कि जब शहाबुद्दीन के पिता मरने वाले थे तो सिवान के मशहुर वकील श्रीकांत बाबू से अपने औलाद पर आशिर्वाद बनाए रखने का वादा लेते गए.पहले के जमाने में नैतिकता और जमीर जैसे भारी भरकम शब्दों के सामने वादा बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी. ठीक ऐसा हुआ भी, श्रीकांत बाबू के आशिर्वाद  होने के कारण साहेब का मनोबल और बढ़ गया. चुनाव के दौरान 90 के दौर में बूथ कैपचरिंग बेहद आम बात हुआ करती थी औऱ साहेब के लड़को के लिए बूथ लूटना खेल से ज्यादा कुछ था भी नहीं. लेकिन जिस बूथ पर श्रीकांत बाबू को वोट देने जाना होता था उस बूथ के वोटर लिस्ट  पर शहाबुद्दीन खुद हरी कलम से उनके नाम को घेर देते और वहां अपना हस्ताक्षर भी कर देते ताकि बूथ में भोकस वोटिंग के दौरान इस बात का ख्याल उनके लड़के जरूर रखे की श्रीकांत बाबू का वोट कोई औऱ न दे पाए क्योंकि श्रीकांत बाबू वोट देने शाम के 4 बजे आते थे.  ऐसे ही कई कड़ियां मिली और शहाबुद्दीन धीरे-धीरे साहेब बनते चले गए.जब सिवान की जनता वाम और माओ से परेशान होकर शहाबुद्दीन को चुन रही थी तो किसी ने न सोचा होगा कि शहाबुद्दीन के जरिए वो जिस खौफ को खत्म करना चाहते है वो खौफ एक दिन खुद शहाबुद्दीन के रूप में उनके सामने खड़ा होगा.सिवान का एक धड़ा शहाबुद्दीन को रोबिन हुड का अवतार भी मानता है क्योकिं डॉक्टरों, व्यापारियों, इंजिनियरों से रंगदारी लेने वाले शहाबुद्दीन गरीबों   की मदद में जी खोल कर पैसा भी लूटाते है. गरीब के घर में शादी हो या कोई बीमारी वहां धन शहाबुद्दीन ने जी खोल कर खर्चा इसलिए सिवान का एक तबका मुसलमानों के अलावा भी उन्हें रहनुमा मानता है.तो वही शहाबुद्दीन को खडा करने वाले भूमिहारों को भी शहाबुद्दीन ने कभी आंख तिरछा कर नहीं देखा.राजनीति में भारी सफलता ने शहाबुद्दीन को ऐसी खुमारी दी कि सिवान में कोई बड़ी लूट हो या फिर हत्या या फिर अपहरण हर जगह शहाबुद्दीन के हाथ होने की खबर आने लगी. शहाबुद्दीन को तेजाब कांड के बाद भले ही जेल जाना पड़ा हो और फिर उन्हे चुनाव में हार का मुंह भी देखना पड़ा हो लेकिन एक दौर वो भी था किसी भी पार्टी का बड़ा नेता सिवान में कदम रखने से पहले उनकी इज्जात लेकर कदम रखता था. सिवान की धरती पर भले ही प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे बाहुबली नेताओं ने अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की हो लेकिन सिवान की धरती पर शहाबुद्दीन जैसा न कोई था न कोई मौजूदा दौर में हैं और अब शायद ही सिवान फिर किसी को शहाबुद्दीन बनाएं. 

Wednesday, July 27, 2016

गाय के नाम पर इंसान जानवर बन गया ।

पुरानी सभ्यताओं का अध्यन का मौका मिले तो पढियेगा की इंसान इंसान को ही मार के खा जाता था । बहरहाल आज कल जानवर को मारने के नाम पर इंसान अपनी जान गवा रहा है ।इसलिए आपके जानकारी के लिए ये सब हाजिर है । देश में बीफ़ पर क्या है नियम जानिए .बीफ़ पर चर्चा गर्म है। गाय-भैंस के मांस के नियम-क़ायदों पर लोग काफी पेंच में हैं। आइए नियम जानिए- 1.केरल – सब कुछ लीगल है। गाय-भैंस सब। काटना, खाना, बेचना सब लीगल। 2.पश्चिम बंगाल- सेम टू सेम। सब लीगल। 3.मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल, मिज़ोरम और सिकिक्म- सब लीगल। गाय, भैंस सब। 4.मणिपुर- गाय काटना बैन है। खाना, बेचना, रखना लीगल है। भैंस में सब लीगल है। 5.असम- स्लॉटर के लिए सर्टिफिकेट नहीं है तो गाय नहीं काट सकते। बाक़ी खा सकते हैं, बेच सकते हैं। भैंस के लिए सब ओके है। 6.आंध्र प्रदेश+तेलंगाना- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। सांढ और बैल को सर्टिफिकेट मिलने के बाद काटा जा सकता है, बशर्ते वो अब प्रजनन, खेती और हल चलाने के काबिल न हो। भैंस- ओके। 7.बिहार- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। 15 साल सेज़्यादा बड़े सांढ़ और बैल का स्लॉटर लीगल है। खाना, रखना वगैरह लीगल है। भैंस में तो सबकुछ लीगल है।8.झारखंड- गाय, बैल वगैरह काटना, मांस रखना, खाना सब प्रतिबंधित है। भैंस- ओके। 9.गुजरात- गाय, बछड़ा, सांढ़, बैल पर प्रतिबंध है। काटना, खाना और ले जाना प्रतिबंधित है। भैंस पर कोई प्रतिबंध नहीं यानी ओके। 10.मध्य प्रदेश- गाय, बछड़ा, सांढ़ वगैरह सब प्रतिबंधित है। भैंस ओके है। 11.छत्तीसगढ़- गाय, बछड़ा,बैल, सांढ़ प्रतिबंधित। हर तरह से प्रतिबंधि। भैंस- ओके। 12.उत्तर प्रदेश- गाय, बछड़े, सांढ़, बैल का स्लॉटर प्रतिबंधित। इनका मांस खाना भी प्रतिबंधित। विदेशियों को खाने की अनुमति है। सील पैक्ड डब्बे में मांस लाया जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ विदेशियों के लिए उसे पकाया जा सकता है। भैंस में सब ओके। 13.दिल्ली- गाय, बछड़ा, बैल, सांढ़ प्रतिबंधित है। पूरी तरह प्रतिबंधित। किसी दूसरे राज्य से भी मांस लाकर खाना मना है। भैंस- ओके। 14.हरियाणा- गाय पर सब बैन है। खाने पर मैं श्योर नहीं हूं। भैंस- ओके है। 15.चंडीगढ़- यहां सब प्रतिबंधित है। गाय, भैंस सब। खाना, काटना, बेचना सब। 16.हिमाचल प्रदेश- सिर्फ़ रिसर्च के लिए काटने की अनुमति है या फिर अगर जानवर बीमार हो।बाक़ी सब ग़ैर-क़ानूनी है। 17.राजस्थान- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ पर पूरी तरह प्रतिबंध। भैंस में सब ओके। 18.पंजाब- गाय का मांस बाहर से मंगाकर खा सकते हैं। पंजाब में खाने के लिए काट नहीं सकते। भैंसके लिए वही नियम है। भैंसे को निर्यात के लिएकाट सकते हैं। इसलिए यहां नियम पेंचीदा है। अगर आप खा रहे हैं तो ये बता सकते हैं कि आपने बाहरी राज्यों से मंगवाया है।19.ओडिशा- सिर्फ़ संक्रमण वाली बीमारी से ग्रसित गाय काट सकते हैं। बाक़ी नहीं। बूढ़े बैल, सांढ़ को सर्टिफिकेट के साथ काटा जा सकता है। भैंस के लिए कोई नियम नहीं। सब ओके। 20.महाराष्ट्र- 2015 के बाद गाय काटना, खाना, मांस रखना ग़ैर-क़ानूनीहै। भैंस- सब लीगल। 21.जम्मू-कश्मीर- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ को काटना, खाना, मांस रखना सब ग़ैर-क़ानूनी है। हाल ही में ये नियम बना। भैंस- ओके। 22.कर्नाटक- गाय अगर उम्रदराज़ या फिर बीमार है तो काट सकते हैं। खाना, मांस रखना, सब लीगल है। भैंस में सब लीगल। 23.तमिलनाडु- गाय, बछड़े पर प्रतिबंध। बेकार और बूढ़ी गायों और बछड़ों का स्लॉटर ओके। खाना, मांस रखना ओके। भैंस में सब ओक

Monday, June 6, 2016

सरकार को जीत के हैंगओवर से निकलने की जरूरत है...!


देश की मौजूदा स्थिति किसी से छिपी तो नहीं हैं लेकिन मौजूदा दौर में पैसे और सपने को पूरा करने की बेतहसा दौड़ के बीच लोग इन हालातों से या तो समझौता कर आगे बढ़ गए है या फिर उन्हें देश के हालात से ज्यादा उनके जेब में बढ़ता नोटों का दबाव मजा देने लगा है. जी,  ठीक –ठाक तरीकें से अगर आपको इस देश के हालात को समझना हो और ब्यूरोक्रेसी की मोटी चमड़ी से रूबरू होना हो तो आपको यूपी के बुंलदेलखंड, महाराष्ट्र के विदर्भ या लातूरया फिर छत्तीसगढ़ के बस्तर ,दंतेवाड़ा, जगदलपुर और झारखंड के लातेहार, सिंहभूम ,गढ़वा ,चतरा जाना पड़ेगा.ऐसा नहीं हैं कि देश में ये हालात पिछले 2 सालों से इस देश पर राज कर रहीं मोदी सरकार के दौरान बने है.दरअसल हमारे देश का इतिहास ही कुछ ऐसा रहा है जिससे देश कभी उबर ही नहीं पाया. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को राज करने में मदद करने वाला कोई विदेश से आये लोग नहीं बल्कि इसी मुल्क के लोग थे जो लगातर अंग्रेजी हुकूमत को मदद पहुंचा रहे थे और लगातार देश लूटता चला जा रहा था. ऐसा नहीं था की देश को आजादी मिलते ही देश में सब कुछ सुधर गया था. आजाद भारत के दामन में सबसे पहला दाग जीप घोटाले का लगा.खैर इस देश में घाटोला होना और उसको लेकर आरोप-प्रत्यारोप होना इन दिनों आम बात हो चुकी है.इन सब के बीच मोदी सरकरा ने अपने कार्यकाल के 2 साल पूरे कर लिए है और सरकार अपना लगातार महिमामंडन खुद कर रही है और दुसरों से भी करवा रहीं है। कांग्रेस के कार्यकाल के बारे में बहुत चर्चा हो चुकी है और अब जरूरत हैं कि केंद्र में बैठी मोदी सरकरा के बीते 2 सालों का भी आंकलन करना शुरू कर दिया जाए.मोदी सरकार के 2 साल के कार्यकाल पूरा होने पर एक नारा दिया जा रहा है कि मेरा देश बदल रहा हैं और आज के दौर का मौजूदा सवाल भी यही है कि क्या वाकई देश बदल रहा है या फिर सब कुछ जस का तस है ! बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम काज को देखा जाए तो जरूर ये कहा जा सकता है कि देश के मौजूदा दौर को हो रहे उर्जा के संचार का एक बड़ा केंद्र खुद पीएम मोदी है लेकिन अगर हम मोदी के मंत्रीमंडल का आंकलन शुरू करे तो जरूर ये महसूस हो रहा है कि ये सरकार भी पिछली सरकार की तरह ही है बस सत्ता में बैठे लोगों के चेहरे बदल गए है ।पिछली सरकार में भी राज्यसभा के जरीए देश चल रहा था और इस बार की सरकार भी देश राज्यसभा के जरिए ही चला रही हैं । सत्ता में बैठी पार्टी के लिए सबसे जरूरी चीज हैं कि वो जनता के मन में असंतोष पैदा नहीं होने दे .मोदी के विवादित मंत्रियों के काम काज का आंकलन भी जरूरी हैं क्योंकी देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा मोदी से संतुष्ट तो हैं लेकिन उनके मंत्रियों से खार खाए बैठे है .बतौर शिक्षा मंत्री स्मृति इरानी के ही कामकाज को देखा जाए तो देश में छात्रों का एक बड़ा तबका स्मृति से नाराज बैठा है क्योंकि लगातार एक के बाद एक देश के बड़े विश्वविद्यालयों में विवाद को जिस तरह से निपटाने की कोशिश हो रही हैं उससे उन्हें लग रहा है कि उनकी आवाज को कही न कही दबाया जा रहा है । पीएम मोदी को इस बात का ख्याल रखना भी जरूरी हैं कि एक वक्त इंदिरा गांधी से नाराज छात्रों का ही आंदोलन इंदिरा गांधी के इतिहास को काला कर गया था और मौजूदा दौर के पीएम इस बात को जितनी जल्दी समझे उनके लिए उतना ही फायदेमंद होगा.यहां जिक्र देश के वित्त मंत्री अरूण जेटली का भी जरूरी है.देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था उसी दौर में अब भी दिख रही हैं जिस दौर में यूपीए कि सरकार उसे छोड़ गई थी.बल्की एक कदम और आगे इस व्यवस्था पर गौर करें तो मालूम होगा कि पिछली सरकार के नीतियों को आगे बढाते हुए मौजूदा वित्त मंत्री अरूण जेटली ने देश की जनता के जेब में हाथ मारते हुए कई जगहों पर टैक्स बढ़ा दिया जिससे छोटी से छोटी चीज भी मंहगी हो गई. यहां बात पेट्रोल और डीजल की भी जरूरी है जिससे सरकार और तेल बेचने वाली कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही है। यूपीए के दौर में पैट्रोल उस वक्त 70 रूपय का था जब अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल130 डॉलर प्रति बैरल का हुआ करता था और आज के वक्त में पेट्रोल 60 का हैं जबकि अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल 50डॉलर प्रति बैरल से भी कम हैं.ये तो बात शिक्षा और वित्त मंत्रालय कि हुई. हमें एक नजर देश के गृह मंत्री के भी काम पर डालना जरूरी है .देश की मौजूदा मोदी सरकार पर लगातार अष्हिणु होने के आरोप लगते आ रहे थे और साथ ही किसी भी विवाद में एक पक्ष को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगता रहा है।देश में बीफ के लेकर हो रही बहस हो या दो समुदाय का आमना – सामना , मोदी सरकार पर लगातार ऐसे मामलो को दबाने और अपने निजी स्वार्थ के हिसाब से काम करने का आरोप भी लगा। वहीं पीएम मोदी के लिए बेहद जरूरी है कि जिस नक्सलवाद को लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने जो अपनी चिंता जताई थी उसका हल वो अपने कार्यकाल में जरूर ढूंढ ले क्योंकि देश का मौजूदा नक्सलवाद नासूर बनता जा रहा है और सहीं कार्रवाई नहीं होने के कारण देश की जनता के अंदर असंतोष भी पैदा कर रहा है।मोदी सरकार के आने के बाद हिंदूवादी संगठन भी लगातार अपना विस्तार करना चाहते है और उसी का नतीजा है कि कथित तौर पर जानवर का कारोबार करने वालों को, बीफ खानेवाले को , कथित देशद्रोह करने वालों पर भीड़ हमला कर देती है.कई जगह भीड़ इतनी हिंसक होती है कि खुद को इस देश के सर्वोच्य व्यवस्था से उपर उठ कर सड़क पर कथित इंसाफ कर देती है। देश ही नहीं बल्की विदेश की मीडिया द्वारा भी अपने देश की ऐसी कई घटनाओं को जोर शोर से उठाया गया लेकिन आश्वासन के अलावा सरकार इस देश को इन मुद्दो पर ज्यादा कुछ दे नहीं पाई. यकिन मानिए ये सारी चीजें धीर –धीरे एक बड़े अंसतोष का रूप ले लगी जिससे मोदी सरकार को पार पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा इसलिए जरूरी है कि पीएम मोदी पहले ही इन तमाम चीजों से सबक ले .मोदी सरकार के कई ऐसे मंत्री भी है जो अब मोदी के लिए गले की फांस बन गए है. चाहे वो उमा भारती हो या फिर गिरिराज सिंह या इनके जैसे कई और मंत्री जिनके मंत्रालय में काम से ज्यादा तामझाम है और जनहित नदारद. पीएम मोदी के पास 3 साल और है जिनमें उनकी कोशिश होनी चाहिए कि वो देश के विकास को और तेजी दे पाएं. साथ ही पीएम मोदी को जनता की मूड का भी ख्याल रखना जरूरी होगा, कहीं ऐसा न हो जाए की देश की अर्थव्यवस्था की बगड़ती तबीयत को सुधारने के चक्कर में जनता का ही मूड बिगड़ जाए और देश बदलने से पहले 3 साल बाद फिर सरकार ही बदल दी जाएं. तो ऐसे में कहना होगा की सरकार को अपने जीत के हैंगओवर से निकल कर जमीनी हकीकत से रूबरू होने की जरूरत है ....

 ऋषिराज