Thursday, December 10, 2015

देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में !


 देखो ,सत्ता बिक रही है बाज़ार में ।
खरीदने वालो की संख्या है हज़ार में ।।
जो सत्ता के  दुलारे है वो खड़े है एक कतार में।।
देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में ।
दुपट्टा गिरा कर सौदा करने वाले ,मगन है पैसो की अंधकार में।।
 देखो, सत्ता बिक रही है बाजार में ।
गरीबो की सोचने वालो की बस्तिया है यमुना के पार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
इन्साफ करने वाले ,गिने जाने लगे है सत्ता के यार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
नेता ,अभिनेता या हो वो न्याय रक्षक ,सब डूबे है सत्ता की खुमार में।।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।
 हम ,तुम भूखे नंगे सब ,हज़म हो जाते है एक डकार में ।।
देखो सत्ता बिक रही है बाजार में ।
 खरीदने वालो की संख्या है हज़ार में ।
देखो,सत्ता बिक रही है बाजार में ।।



-ऋषि राज

Tuesday, October 20, 2015

हम बिहारी शौचालय वाले !



प्रिय प्रधानमंत्री जी,
        मैं ऋषि राज पेशे से पत्रकार हूं और यह पत्र मेरे और मेरे जैसे लाखों बिहारीयों के उम्मीद की गठरी हैं। मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मुझे आपसे जवाब चाहिए ब्लकि इसलिए लिख रहा हूं कि आप गरीब लोगो कि व्यथा और परेशानी बड़े अच्छे से समझ सकते है साथ ही उस कष्ट को दूर करने के लिए कोई निर्णायक कदम ले सकें । प्रधानमंत्री जी मैं पिछले 5 साल से दिल्ली में रहता हूं । उसके पहले मैं यह नहीं जानता था कि रेल इस देश में एक विकट समस्या के रूप में हम सबके सामने उभरा है। हमारे बिहार में बहुत ज्यादा अच्छी शिक्षा और रोजगार नहीं होने के कारण अपने राज्य से लगातार पलायन करके दूसरे राज्यों में जा रहे है। हालंकि बिहार बंटने के बाद मैं झारखंड की ओर आ गया था क्योकी पिताजी वहीं नौकरी कर रहें थे लेकिन अब पापा रिटायर हो चुके है और अपना पता बिहार हो चुका हैं।बहरहाल ,यह उम्मीद की गठरी आप तक इसलिए पहुंचा रहा हुं कि अब वो दर्द सहा नहीं जा रहा है और आपसे उम्मीद भी बहुत हैं । हमारे पुरे बिहार में छठ एक  ऐसा पर्व है जिसे पूरा घर मनाता है ठीक वैसे ही जैसे आपके गुजरात में नवरात्र और गरबा के मायने हैं। इस पर्व को लोग मनाने के लिए देश –विदेश से छुट्टी लेकर घर वापस जाते है और इस 4 दिन के पर्व में अपना सबकुछ देने को तैयार रहते हैं।  घर लौटने वालों में एक बड़ी संख्या मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की होती है । ये लोग ट्रेन में कंर्फम टिकट खरीदने तक की हैसियत नहीं रखते क्योकी जो भी दो पैसे बच जाते है उससे ये गुड्डु  ,पिंकी, पिंकी की मां और पिंकी के दादा-दादी को सस्ते नये कपड़े दिलाने की कोशिश करते हैं। ये लोग छठ पर्व के शुरू होने से तकरीबन 7 दिन पहले घर लौटने लगते हैं। चुकि लौटने वाले हम बिहारीयो की संख्या हजारों में होती है तो हम लोगो को अनेक असुविधाओ का सामना करना पड़ता है।सबसे पहले हमें जनरल डब्बे में चढ़ने के लिए घंटो पहले लाईन में लगना पड़ता है और वहां मौजूद पुलिस वाले हम पर जी भर के लाठी बरसाते है । वो लाठी चलाते वक्त यह भी नहीं देखते की उनकी लाठी किस पर और कहां पड़ रही है। वो हमें रिफ्यूजी या एक ऐसा हिस्सा मानते है जो समाज पर बोझ है लेकिन हम लोग किसी पर बोझ न बने इसीलिए तो अपने घर –बार के मोह को छोड़ कर दूसरे राज्यो में नौकरी करने आ गये । ट्रेन में चढ़ने के लिए हमें केवले दरवाजा नहीं ब्लकि खिड़कियों का भी इस्तमाल करना पड़ता हैं। हमें कोई सीट की उम्मीद नहीं होती हम लोग तो ट्रेन के फर्स पर बैठ कर भी जा सकते है । मौजूदा हालात में हम लोग और हमारे घर की मां –बहने तो  18-19 घंटे  बिना कुछ खाये ट्रेन के शौचालय में बैठ कर चले हैं। क्या हम एक बेहतर हालात में अपने घर जाने के भी हकदार नहीं है। आप सोचिए सर, शौचालय में बैठकर जाना और उससे पहले ट्रेन में चढ़ने के बैचेनी में सिपाहीयों की लाठी क्या यह उचित है । आप तो पूरे भारत को अपना मानते है ऐसे में लाठी मारने वाले से लेकर लाठी खाने और शौचालय में बैठ कर जाने वाली मां-बहन भी आपके हुए ।क्या आप उन्हें एक बेहतर हालात नहीं दे सकते । सर , हम लोगो के लिए छठ सब कुछ है इसबार छठ में घर जाने के लिए कुछ बेहतर इंतजाम करवा दिजिए ।
ऐसा नही है कि मैं आपसे केवल सवाल कर रहा हूं मैं आपको सुझाव भी देना चाहता हूं ।आपसे निवदेन है कि टिकट कंर्फम देने की प्रतिबध्ता के बीच छठ पर्व से कुछ दिन पहले 4-5 ट्रेन ऐसी चलावायी जाए जिसमे केवल जनरल डिब्बे हो । इससे लोगो को एक सहुलियत यह मिलेगी कि उन्हें शौचालय में बैठ कर जाने के लिए मजबूर नहीं होना होगा ।
मैं अपनी और लाखों बिहारीयों की उम्मीद की गठरी आपको भेज रहा हूं कि इस उम्मीद के साथ कि आप हमारे दिक्कतों को समझ कर हमें इस बार शौचालय में बैठ कर घर नहीं जाने देंगे । और सर प्लीज़-प्लीज़ कम से कम लाठी न चलाने का आदेश तो दे ही दिजीएगा बहुत जोऱ से चोट लगता है सर।
                                                        आपका उम्मीदी
                                                           बिहारी  

Friday, October 9, 2015

“भड़ास वाला पगला गया है”

भड़ास वाला पगला गया है यह शब्द मेरे नहीं बल्कि एक न्यूज़ चैनल में काम करने वाले मेरे मित्र के हैं। मैंने जैसे ही उनको यह बताया कि भड़ास4 मीडिया वालो ने एक अख
बार के घटिया पत्रकारिता की  पीडित महीला के समर्थन में आकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक आयोजन किया है यह शब्द उनके मुख से निकल पड़े । खैर, भड़ास वालो के अंदर हिम्मत तो है इसमें कोई श़क नहीं हैं। एक अखबार की घटिया पत्रकारिता के कारण कैसे एक महिला के आत्मसम्मान को तार-तार कर दिया गया और जब उस महिला ने इस घटिया पत्रकारिता के खिलाफ शिकायत की तो उन्हें इंसाफ और माफी के जगह लगातार एक तरफ़ा रिपोर्टिंग का शिकार होना पड़ा । उस महिला के पक्ष में खड़े होकर भड़ास नें पत्रकारिता के रूतबे को गिरने से रोका भी और  प्रेस क्लब में प्रेस के खिलाफ आयोजन कर एक नया उदाहरण भी पेश कर दिया ।  मौजूदा दौर की पत्रकारिता का स्तर जितनी तेजी से गिर रहा है उसे लेकर वरिष्ठ पत्रकारों से ज्यादा नये युवा पत्रकारों को चिंतित होना चाहिए क्योकी उनका पूरा भविष्य दांव पर लगा हैं । भड़ास वालों ने इस आयोजन में मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के पुर्व न्यायधीश और  प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू  को  बनाया था । सब ने पत्रकारिता पर अपनी राय रखी जिसके बाद काटजू जी अपनी बात रखने मंच पर आये । काटजू को सुनना बेहद सुखद पल था क्योकी वह जिस बेबाकी से वह अपनी राय रखते है, आपको शायद ही कोई इतना चर्चित शख्स मिले जो समाज, राजनीति,न्यापालिका के बारे में अपनी मुखर राय रखता हो । काटजू ने पत्रकारिता पर अपनी राय रखते हुए कहा कि  कुछ पत्रकारों,  मीडिया मालिको और नेताओं के गठजोड़ ने पूरी पत्रकारीता को बदनाम कर दिया है । पत्रकारों को अपना घर भी चलाना और अपनी साख भी बचानी है ऐसे में उसकी मजबूरी हो जाती है कि वह अपने मालिक की जी हूजुरी करें वहीं काटजू ने सट्रिंगर्स के हालत पर भी चिंता जताई । काटजू ने गिरते स्तर की पत्रकारिता से लेकर भारत में बदलाव तक की बात कहीं। उन्होनें गरीबों के  जीवन स्तर को सुधारने पर जोर देते हुए कहा की जब तक देश के गरीबों का जीवन स्तर नहीं बदलेगा तब तक किसी भी प्रकार की प्रगती बैमानी है । उन्होंने एक टीवी चैनल पर कहे गए बात को दोहरते हुए देश के ज्यादातर नेताओं को धूर्त और फांसी पर लटकाने की बात  कही। काटजू अपने बातों के पक्ष में कई तर्क भी देते हुए दिखे । जब पत्रकारीता की बात खत्म हुई तो काटजू ने गांधी और बोस को ऐजेंट कहने को लेकर तर्क दिए । उन्होंने क्रांति आने की बात तो बार- बार कही लेकिन उसका रूप रेखा नहीं बताया ,हालांकि उन्होंने गोरिल्ला वार का जिक्र जरूर किया । न्यायपालिका को लेकर भी काटजू की राय कुछ अच्छी नहीं है । वो सुस्त न्याय व्यवस्था को लेकर बेहद दुखी और निराश नजर आये । जब मांस को लेकर बात शुरू हुई तो उन्होनें कई किस्से भी बताये और साथ ही जिन्ना तक को पोर्क खाना वाला कह दिया । 
प्रशनकाल के वक्त कई लोगों ने काटजू से सवाल पूछा । शुरू में कुछ लोगो ने उनसे ताकतवार लोगों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ने को लेकर जब राय मांगी तो उन्होंने कहा कि एक मामूली आदमी शेर से लड़ेगा तो शेर उसे तो  चीर देगा । मुझे यह बात एक रूप में अच्छी लगी की वो कड़वी घुटी लोगों को दे रहे हैं लेकिन एक पूर्व जज द्वारा कही गयी ये बातें मुझे सिस्टम के प्रति बेहद ही उदासीन बनाने वाली लगी। वही दूसरे प्रशन पर  कुछ लोगो ने उनसे क्रांति कैसे आएगी इसको लेकर सवाल किया तो उनका जवाब थी कि क्रांति तो आएगी  लेकिन कब और कैसे यह तय नहीं है । मुझे इस सवाल को सुनने के बाद ऐसा लगा की हम लोगो के अंदर एक बुरी आदत यह भी है कि यदि हमें कोई  अंधेरे में रोशनी दिखाता है तो हम सब कुछ उस रोशनी दिखाने वाले से उम्मीद करने लगते है और अपने लिए नये रास्ते बनाने के जगह उसके पीछे चलना चाहते है जो बेहद खेदजनक हैं। 
इन सब के बावजुद एक सिस्टम के अंदर काम करते रहने के बाद भी अपने क्षेत्र के काम की आलोचना करने वाले पत्रकारों ने इस आयोजन में  बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और ऐसे लोगों को एक धागे में बांधने के लिए भड़ास4 मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह जिसे आप मीडिया के सरदार खान के रूप में भी देख सकते है उनकी प्रशंसा तो करनी ही चाहिए ।           

Tuesday, October 6, 2015

आत्मघाती : द सपोर्टर


मुझे मालूम है कि आप आत्मघाती शब्द सुन कर थोड़े घबरा से गये होंगे लेकिन मेरा मकसद आपको परेशान करने का बिल्कुल भी नहीं है। मैने इस शब्द को सोच समझ कर ईस्तमाल किया है । आज के मौजूदा दौर में कोई भी राजनीतिक दल हो आपको सोशल मीडिया पर उनके समर्थक दिख जाएंगे । वो हर तरह से अपने  पसंदीदा पार्टी का समर्थन करते है और साथ ही केवल और केवल उनके दिमाग में अपनी पार्टी के तारिफ के अलावा कुछ भी नहीं होता है । अगर आप इनके पसंदीदा पार्टी के विरोध में कुछ लिख दे तो ये जी-जान से उसके बचाव में और आपके खिलाफ गोलबंद हो जाते हैं। ये सही-गलत नहीं केवल अपने पार्टी का हीत देखते है । उनके लिए देश की उन्नती, लाभ ये ज्यादा जरूरी पार्टी के पक्ष को मजबूत करना है  इसलिए मैने ऐसे लोगो के लिए आत्मघाती शब्द का उपयोग है । हो सकता है कि मेरे विचार से आपका मत अलग हो लेकिन मैं आप पर आपके विचार बदलने का दबाव तो नही बना सकता लेकिन हम तर्क कर सकते है अगर वह त्थय पर आधारित हो।
ये जो सोशल मीडिया पर या वास्तविक दुनिया में किसी दल के समर्थक होते है वो सबकुछ भूल कर केवल अपने तर्क को मजबूत करते है चाहे उन्हें कुतर्क का ही सहारा लेना पड़ जाये । मेरे दिल में अक्सर ये  सवाल उठता है कि ये जो मोदी सरकार के समर्थक है उन्हें महंगी दाल , प्याज, बोर्डर पर मरते फौजी, फसल पर न्युनतम समर्थन मूल्य 50 प्रतिशन न बढ़ना,बात –बात पर यु-टर्न लेना, ललित गेट, व्यापम, चावल घोटाला, पार्टी अध्यक्ष का कैमरे पर घूस लेते पकड़ा जाना, मूजफ्फरनगर दंगे में पार्टी के लोगो की संदिग्द भूमिका, मरते किसान ,प्रधानमंत्री की चुप्पी , मोदी की  विदेश यात्रा का मीडिया का महीमामंडन करना क्यो नहीं दिखता है ? क्या वे ये सब जानबूझ कर रहे है, क्या उन्हें इससे कोई फायदा हो रहा है?
बात कांग्रेस की भी करें तो इनके समर्थक क्यो नहीं पुछते कि सब –कुछ गांधी परिवार के आस-पास ही क्यों घुमता हैं , क्या उन्हें कोलगेट, 2जी जैसे घोटाले नहीं चुभते, क्यो ये लोग राहुल गांधी के गुप्त यात्रा पर सवाल नहीं उठाते ,क्यो से सवाल नहीं करते कि सबसे ज्यादा राज करने वालो की पार्टी देश के इस हाल की जिम्मेदारी क्यो नहीं लेती ?
 केजरावाल के समर्थक हो,या फिर लालू, नीतिश ,आखिलेश ,ममता के ये लोग कैसे हे जो अपने पसंदीदा नेताओं के खिलाफ ना कुछ सुनना चाहते है और ना सवाल करके किसी की जवाबदेही तय करना चाहते है ? क्या ऐसे लोग देश के हीत में काम कर रहे हैं, क्या इनका चुप रहना देश को आगे ले जाऐगा या फिर ये अपने सुविधा अनुसार सब कुछ तय कर के बैठे है कि खुद भी न कुछ पुछेंगे और जो पुछेगा उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि वो सब कुछ भूल कर अपना दामन साफ करने में उलझ जाएंगे ?
ये कैसे समर्थक है जो अपने ही देश के लोकतंत्र के ढांचे को धवस्त करना चाहते है , ये लोग क्या आत्मघाती नही है?  अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी या नेता का समर्थक है तो क्या वो किसी से सवाल नही कर सकता है?
हम ऐसे अनियंत्रित लोगो के चंगुल में फंसते जा रहा जो एक दिन  हमें अपना समर्थक बना लेगे या फिर अपने झुठ और सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर देने का आडंबर कर हमें कुचल देंगे ।  खैर ,मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि देश को ऐसे आत्मघातियो से मुक्त किया जाये । इसके लिए हमें अपने पीठ पर ढाल लगाने की जरूरत है क्योकि ऐसे लोग कायर होते है कभी भी सामने से नहीं बल्कि पीछे से पीठ पर वार कर के हमें अपने जद में लेना चाहते है , तो क्या आप इस जंग के लिए तैयार है ?  

Thursday, September 10, 2015

लालू का बिहार और बिहार का लालू


लालू का बिहार और बिहार का लालू हो जाना
 जी, बिहार विधानसभा में हर पार्टी का मुख्यमुद्दा यही है कि बिहार में सत्ता में कौन आएगा और कैसे आएगा  ? इसके लिए हर पार्टी अपने तौर-तरीके से चुनावी क्षेत्र में उतरने जा रही है । लेकिन मेरे नज़र में बिहार में सारी राजनीति लालू का बिहार और बिहार का लालू हो जाना है । शुरुआत लालू के उस दौर से करते है जब लालू सत्ता में काबिज हुए थे और 15 साल सत्ता में रहे । लालू पर जंगलराज और बिहार को गर्त में ढकेल देने का आरोप लगा । जब लालू सत्ता में  तो उस वक़्त   बिहार में स्वर्णो का जबरदस्त तरीके से हुकुमत चलता था । दलितों को समाज में वो अधिकार नहीं था जो स्वर्णो को था । दलितों का शोषण होना  और उनसे जबरदस्ती बन्धुआ मजदूरी करवाना आम बात थी । लालू जब सत्ता में आये तो समाजिक तौर पर दलितों के अंदर भरोसा पैदा करने का काम किया । समाज में जो दलितों को बोलने और स्वर्णो के समान बैठने का अधिकार नहीं था उसके खात्मे का काम किया । आप आज के दौर का बिहार देख लीजिए ज्यादातर जगह में आज दलितों को दबाया नहीं जा सकता है और सच्चाई ये भी है कि समाज से बुराई पूरी तरह नहीं ख़त्म हो सकता । अगर यह हक़ीक़त नहीं है तो लालू को जनता ने 3 बार लगातार क्यों जीत दिलाई होती । हा ये सच है कि लालू की सरकार बिजली और सड़क के मोर्चे पर पूरी तरह विफल रही । लालू के दौर में जंगलराज का जिक्र होता है और कानून व्यवस्था भी धुमिल होने की बात कही जाती है ।आप इस मोर्चे में लालू यादव को फेल मान सकते है लेकिन जिस राज्य में दलितों और पिछडो को जूते के नोख पर रखा जाता हो वहा समाजिक न्याय करने में कानून व्यवस्था का लड़खड़ाना तो लाजमी है खैर इस तरीके से किसी भी क्रिया का हम समर्थन  नहीं करते है । 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद लालू सत्ता से जब बेदखल हुए तो बुरी तरह   । लालू को हार भी ऐसे मिली जिसने उनको चारो खाने चित कर दिया । हाशिए पर पड़े लालू को जब केंद्र में रेल मंत्री बनाया गया तो सब के इस आंकलन को लालू ने धता बता दिया कि रेल का हाल बिहार की तरह हो जायेगा । लालू ने भारतीय रेल का कायाकल्प किया । रेल को प्रॉफिट में चलाया साथ ही  रेल कर्मचारियों के बदहाली को दूर किया । बिहार के कई हिस्सों में रेल की परियोजनाएं साथ ही त्योहारो के मौके पर बिहार और अन्य राज्यो के लिए वैकल्पिक ट्रेन इतनी चलाई गयी कि हर इंसान आसानी से अपने घर गया। तत्काल टिकट आसानी से उपलब्ध होती थी साथ ही गरीब रथ जैसी ट्रेनों को चलवाना लालू की बड़ी उपलब्धि रही । रेल में दिए जाने वाले खाने हो या फिर कुल्लढ़ की चाय लालू ने सबको सुपरहिट किया । इसमें किसी प्रकार की दोराय नहीं है ।  लालू के जाने के बाद रेल फिर से दुर्गति में चलने लगा । बीजेपी की सरकार के वक़्त कन्फर्म टिकट सौदा बढ़ाने के लिए जेनरल डब्बो की संख्या में भारी कटौती  कर दी गयी । लोग त्यौहारो में घर जाने के लिए ट्रेन के बाथरूम में बैठ कर गए । इससे बुरा क्या हो सकता है । लोगो बिहार को पिछड़ा बोलते है बीमारू बोलते है  और जिम्मेवार पिछली सरकारो को मानते है । सन् 2000 के पहले बिहार में संसाधन था लेकिन बिहार इतना बड़ा था कि पुरे राज्य का विकास होना वह भी एक साथ संभव नहीं था ।साल 2000 में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार ने बिहार से झारखण्ड को अलग कर दिया गया । झारखण्ड के अलग होते ही कोयला ,खनिज और कई अन्य पदार्थ झारखण्ड की झोली में चला गया । जो बिहार उपजाऊ था वो बटवारे के साथ खाऊ बन गया । उस वक़्त कि सरकार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा तक नहीं दिया और बिहार दुर्गति के रास्ते पर चल निकला । हालाँकि दूसरे राज्यो को विशेष राज्य का दर्जा मिला जैसे उत्तराखंड, तेलांगना ,हिमाचल । आज के दौर में ये सभी राज्य खाऊ से उपजाऊ  बन गए लेकिन बिहार जस का तस । अब आप बताइये कि बिहार का  सन् 2000 के पहले और सन् 2000 के बाद का दुर्गति का जिम्मेवार किसे माना जाये । आज के वक़्त में लालू को चारा घोटाले में सजा होने के कारण वो चुनावी प्रक्रिया से दूर है  । वो केंद्र से भी गए और राज्य से भी लेकिन आज फिर बिहार में चुनाव है और लालू अपनी पार्टी के लिए ताल ठोक रहे है । लालू के साथ नीतीश बाबू है जिन्होंने लाख कठिनाइयों के बाद भी बिहार को विकास दिखाया है । दूसरी तरफ वही बीजेपी है जिसने बिहार को बाटा था। अब तय आपको अपने विवेक से करना है कि लालू का बिहार बनाना है जिसमे समाजिक न्याय और विकास का कॉकटेल है या फिर बिहार का लालू बनाना है जिसमे लालू की दुर्गति जैसी बिहार की दुर्गति हो जाये ।

Friday, July 17, 2015

डिजीटल हो जाने पर सवालों का सायां






प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इंदिरा गांधी इन्डॉर स्टेडियम में  डिजीटल इंडिया मिशन लॉन्च कर दिया। डिजीटल इंडिया का अर्थ है पूरे भारत को इंटरनेट से जोड़ देना, अधिकतम काम को ऑन लाइन कर देना तथा प्रत्येक व्यक्ति तक ऑन लाईन सेवा की पहुंच। 125 करोड़ देश में यह अंग्रेजी में जिसे हर्क्युलियन टास्क कहते हैं वही होगा।
प्रधानमंत्री के चुनावी वायदों में यह शामिल था। अपने एक वर्ष के कार्यकाल में वे कई बार अपने डिजीटल इंडिया सपने पर जो बातें करते रहे हैं उनसे कई बातें स्पष्ट होतीं हैं। मसलन, वे चाहते हैं कि भारत का कोई भी गांव ऐसा न रहे जहां की इंटरनेट की पहुंच न हो और आवश्यक ऑन लाईन सेवा वहां उपलब्ध न हो। गांव के किसान भी अपना सामान बेचने के लिए ऑन लाइन कृषि बाजार पर मूल्य देखें, अपने सामानों की उपलब्धता बताएं और खरीदार आकर उनका सामान खरीदकर ले जाएं। निश्चय ही यह सुनने में सपना ही लगता है। ऐसा लगता है जैसे यह हकीकत नहीं, सोते समय आने वाला सुनहरा ख्वाब हो।
प्रधानमंत्री  मोदी के डिजीटल इंडिया के नौ मुख्य बिंदु है दृ
1. ब्रॉडबैंड हाइवे - सड़क हाइवे की तर्ज पर ब्रॉडबैंड हाइवे से शहरों को जोड़ा जाएगा.
2. सभी नागरिकों की टेलीफोन सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित की जाएगी.

3. सार्वजनिक इंटरनेट एक्सेस कार्यक्रम जिसके तहत इंटरनेट सेवाएं मुहैया कराई जाएंगी.
4. ई-गवर्नेंस - इसके अंतर्गत तकनीक के माध्यम से शासन प्रशासन में सुधार लाया जाएगा.
5. ई-क्रांति - इसके तहत विभिन्न सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक रूप में लोगों को मुहैया कराया जाएगा.
6. इंफोर्मेशन फॉर ऑल यानी सभी को जानकारियाँ मुहैया कराई जाएंगी.
7. इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन - सरकार का लक्ष्य भारत में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए कल-पुर्जों के आयात को शून्य करना है.
8. आईटी फॉर जॉब्स यानी सूचना प्राद्योगिकी के जरिए अधिक नौकरियां पैदा की जाएंगी.
9. अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम - इसका संबंध स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थियों और शिक्षकों की हाजिरी से है.

इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए  मिशन मोड में काम करना होगा। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे नेट पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर आधारभूत ढांचे का निर्माण करना होगा।  पूरे देश में केबल बिछाना होगा। पहाड़ों, नदियों, जंगलों से होकर दूरस्थ गांवों तक केबल ले जाना कितना कठिन काम है इसका अनुमान स्वयं लगाइए।
डिजीटल इंडिया में ऑन लाइन बुक  पढ़ने और ऑन लाइन लौकर जैसी सेवा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। यानी आपने कोई पुस्तक जहां तक पढ़ी वहीं उसको लौक कर दीजिए और अगली बार वहां से फिर आपको उपलब्ध होगा। आपने कोई औनलाइन नोट बनाया तो वह भी लौक हो जाएगा। आप अपने जरूरी डाक्यूमेंट भी ऑन लाईन रख सकते हैं। ऑन लाईन अस्पताल का भी सपना है। तो अभी यह सब ख्वाब ही लगता है।क्योंकी बीते दिनों ही राजस्थान सरकार के वेबसाइट को हैक कर लिया गया था जिसके बाद अब सवाल यह उठ रहा हैं कि डिजीटल इंडिया के तहत तैयार होने वाले ई-लौकर कितने सुरक्षित होंगे ?  हमारे रखे गये डाटा को कोई चुरा कर गलत इस्तमाल तो नहीं करेगा ?  डाटा को सुरक्षित रखने और हैकिंग जैसी विसाल समस्या से निपटने के लिए सरकार क्या करेगी ?
इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए एकदम मिशन मोड में काम करना होगा। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे नेट पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर आधारभूत ढांचे का निर्माण करना होगा। इसमें भारी खर्च की आवश्यकता है। इस समय डिजीटल फाइबर केबल ही पूरे देश में नहीं है। पूरे देश में केबल बिछाना होगा। पहाड़ों, नदियों, जंगलों से होकर दूरस्थ गांवों तक केबल ले जाना कितना कठिन काम है इसका अनुमान स्वयं लगाइए। इसी तरह इसके अन्य उपादान हैं। जगह-जगह एक्सचेंज की आवश्यकता होगी। अनुमान है कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र काफी निवेश करेंगे।
करीब 400 के आसपास कॉरपोरेट्स ने इस कार्यक्रम में उपस्थित दर्ज की। देखना होगा वे निवेश की कितनी घोषणाएं करते हैं। बगैर निजी क्षेत्र के यह संभव हो ही नहीं सकता। निजी क्षेत्र अगर आएंगी तो फिर सेवा भी वैसी सस्ती नहीं हो सकती जितनी आम आदमी को इस सेवा के उपयोग के लिए चाहिए। हमारे देश में स्पेक्ट्रम काफी महंगे हैं। वे कैसे सस्ती होंगी? इंटरनेट को निजी कंपनियों ने अभी काफी महंगा कर रखा है और जितनी स्पीड बताते हैं उसकी आधी भी नही देते। यह स्थिति दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रों शहरों की हैं। गांवों तक उनकी स्पीड की क्या दशा होगी? कैसे स्पीड बढ़ाई जाएगी?
आप अगर सेवा दे भी दें तो उसका उपयोग करने का ज्ञान भी तो लोगों को चाहिए। इसलिए इंटरनेट साक्षरता के विस्तार की बात है। इसे कैसे पूरा किया जाएगा? क्या साक्षरता कार्यक्रम के साथ इंटरनेट साक्षरता को भी समाहित किया जा सकता है?
तो हम तैयार रहें। डिजीटल इंडिया के रुप मे भारत के सम्पूर्ण रुपांतरण के महाअभियान की शुरुआत के लिए। उसमें अपनी भूमिका और योगदान की भी हमें तैयारी करनी चाहिए।

Thursday, July 16, 2015

छत्तीसगढ़ के सिस्टम को पोलियो हो गया हैं...आप देखिये तस्वीर और दया दिखाईये...



पहली चार तस्वीरे उन 4 शहीद पुलिस वालों का है जो सिस्टम की भेंट चढ़ गये... जब उनकी लाश सड़क पर पड़ी हुई थी तो (पिछले ब्लॉग में तस्वीरे उपलब्ध हैं) पुलिस को लाश उठाने में 3 घंटे कावक्त लगा और कुत्ते उनकी लाश को तब तक चाट रहे था... जिसके बाद उन लोगो को श्रद्धांजली दी गयी....





अब इन तस्वीरो को देखिये ... पहले पिताजी  बताते थे की पढ़ने के लिए उन लोगों को नदी पार करके जाना पड़ता था लोकिन वो दौर दूसरा था उस वक्त भारत को नयी -नयी आजादी मिली थी लेकिन आज के वक्त में सिस्टम का ये हाल... बच्चो को  स्कूल  जाने के लिए कितनी मुसीबत उठानी पड़ रही  है... मामला समझा जा सकता है कि हमारे देश के सिस्टम से अबतक पोलियो खत्म नहीं हुआ हैं... 



 पानी बहती पुल से जब पानी निकल गया तो देखीये ये गढ़ा ...इसमें आये दिन लोग गिरते है और घायल होते है.. हमारा सिस्टम खुद गढ़े में है तो क्या हम गढ़े में एक बार गिर नहीं सकते...?
टूटी हुई पुलिया की तस्वीर गरियाबंद इलाके  की हैं। 
ये तमाम तस्वीरे छत्तीसगढ़ राज्य की हैं...