Friday, November 18, 2016

तो जनता नहीं नोटबंदी दिलाएगी दोबारा सत्ता ?

सरकार की खींची लकीर जब छोटी पड़ जाएं तो क्या हो..जब 1000 का नोट अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन खड़ा हो जाए तो क्या हो ? 1000  के नोट के कमर को तोड़ने के लिए पॉलिसी भी बने तो 2000 के नोट से. फिलहाल तो अर्थव्यव्स्था वाले पंडित कुछ कहने से कतरा रहे है कि देश की व्यवस्था पर 2000 का गुलाबी नोट कौन सा रंग चढ़ाने जा रहा है...ये रंग बलखाती गुलाबी हो गई या झंझुलाहट वाली सुर्ख लाल ये सब महज कयास है लेकिन सच तो कुछ और ही बयां कर रहा है.जब संसद सड़क के सामने छोटी लगने लगे तो फिर नेताओं का रास्ता जाता किधर है। सड़क के हालात बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के करीब 55 करोड़ लोगों ने वोट डाले लेकिन आज की तारीख में शहर दर शहर गांव दर गांव 55 करोड़ से ज्यादा लोग सड़क पर उस नोट को पाने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं जिसका मूल्य ना तो अनाज से ज्यादा है और ना ही दुनिया के बाजार में डॉलर या पौंड के सामने कहीं टिकता है। फिर भी पहले वोट और अब नोट के लिये अगर सड़क पर ही जनता को जद्दोजहद करनी है तो क्या वोट की तर्ज पर नोट की कीमत भी अब प्रोडक्ट नहीं सरकार तय करेगी। क्योंकि मोदी सरकार को 31 फिसदी वोट मिले। यानी खिलाफ के 69 फिसदी वोट का कोई मूल्य संसदीय राजनीति में कोई मायने रखता ही नहीं है। ठीक इसी तरह 84 फीसदी मूल्य के नोट के खत्म होने के बाद 16 फिसदी मूल्य की रकम महत्वपूर्ण हो गई। यानी रोजाना चार हजार रकम के खर्च करने का समाजवाद सड़क पर आ गया। तो क्या समाजवाद के इस चेहरे के लिये देश तैयार हो चुका है या फिर जिस संसद की पीठ पर सवार होकर लोकतंत्र का राग देश में गाया जा रहा है, पहली बार संसदीय लोकतंत्र को ही सडक का जनतंत्र ठेंगा दिखाने की स्थिति में आ गया है। और यहीं से बड़ा सवाल निकल रहा है कि आखिर बुधवार की सुबह जब संसद शुरु होगी तब राजनीतिक सत्ता के कर्णधारों का रास्ता जायेगा किस तरफ। क्योंकि संसद का महत्व तो तभी है जब संसद में जनता के हित में कोई निर्णय है। या फिर संसद के सरोकार जनता से जुड़े। 

और सच यही है कि पहली बार राजनीतिक सत्ता ने संसदीय राजनीति की धारा के खिलाफ निर्णय लिया है। और नया संकट उस पारंपरिक राजनीति के सामने है जो अभी तक ये सोचती रही कि संसद के दायरे से सड़क को संभाला जा सकता है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या संसद छोड़ सड़क की राजनीति को थामना ही अब हर राजनीतिक दल की जरुरत है। दूसरा ,क्या संसदीय राजनीति के भीतर का भ्रष्टाचार नई परिभाषा गढ रहा है। तीसरा , क्या संसदीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चला है कि पीएम ने खुद को ही जनता के साथ जोड़ लिया है। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद ही जब सड़क के जनतंत्र को संभालने की स्थिति में नही होगा तो क्या ये कहा जा सकता है कि भारत बदल रहा है । या फिर फेल भारत सफल होने के लिये छटपटा रहा है । क्योकि बीते 70 बरस की सियासत ने दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश को बाजार में बदल दिया है। नागरिकों को कन्ज्यूमर बना दिया है। उत्पादन से बड़ा नोट हो गया है। खेती से ज्यादा कमाई सेवा क्षेत्र ने समेट ली। और संसद की नुमाइन्दगी भी रईसों के इर्द -गिर्द घुमड़ने लगी। नीतियां पैसेवालों के लिये बनने लगी। योजनाओं के दायरे में 80 फीसदी नागरिक पैकेज पर टिक गया। 20 फीसदी उपभोक्ता के लिये बजट बनाया जाने लगा तो ऐसा फैसला चाहे अनचाहे देश को ऐसे मुहाने पर खड़ा तो कर ही गया है, जहां से हर राजनेता का रास्ता अब संसद की तरफ नहीं सडक की तरफ जाता है। क्योंकि सडक की सियासत का रास्ता अभी भी एक रुपये को महत्व देता है और संसद के भीतर 500 या दो हजार के नोट मायने रखते है। और कभी नोट को ध्यान से देखिये तो सिर्फ एक रुपये की जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। बाकि हर नोट पर रिजर्व बैक धारक को नोट देने का वायदा करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे खेत खलिहानों में किसानों को बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मिल सके इस जिम्मेदारी की बात तो भारत सरकार करती है। लेकिन उपजाये गया अनाज की कीमत बाजार में होगी क्या ये भारत सरकार नहीं बल्कि मंडी चलाने वाले दलाल तय करते हैं। तो सोचना शुरु कीजिये आखिर क्यों देश की इकनॉमी नोटों की अर्थव्यवस्था पर चलायी जा रही है। ना कि उत्पादन। खेती और मानव संसाधन पर। आखिर ऐसे हालात क्यों बनाये जा रहे है, जहां किसान की फसल नोट के सामने बेबस है। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छात्र अनपढ़ करोड़पति के सामने बेबस हैं। और अपनी ही कमाई को लेने के लिये हर नागरिक बैंक के सामने बेबस हैं। 

तो क्या भारत की इकनामी धीरे धीरे व्यवसायिक बैंकों की खाली खातों में रकम लिखकर और भरकर आगे बढ़ कर रही है। यानी देश को बाजार में बदलने के बाद उपभोक्ता संस्कृति का असल चेहरा अब सामने आ रहा है जब बाजारों की चकाचौंध भी दुनिया के सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाले देश में इसलिये थम गई है क्योंकि ना दिखाई देने वाली इक्नामी यानी नोट की कीमत सोना, चादी, जमीन, घर , अनाज से भी ज्यादा कीमती हो गई है और नोट के जरीये राजनीतिक सत्ता ही जनता से सिर्फ वायदा कर रही है कि अच्छे दिन आ जायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे नोट पर रिजर्व बैक धारक को वायदा करता है। यानी सच पर अभासी सच हावी हो चला है । और अभासी सच का हथियार है बैंकिंग सर्विस । यानी बैंकिंग सर्विस ही अब देश की इकनॉमिक सर्विस होगी, ये संकेत तो साफ हो चले हैं। तो जिस बैंक की टकटकी लगाये हर आदमी आज देश में देख रहा है उस बैंकिंग सर्विस का सच भी समझ लीजिये। क्योंकि यही वह बैंक हैं, जिनसे विजय माल्या कर्ज लेकर बिना चुकाये लंदन भाग सकते है। और यही वो बैंक है, जिनसे कर्ज लेकर ना चुकता पाने पर किसान को खुदकुशी करता है। और देश के 20-30 औघोगिक घरानों के पास बैंक का सवा लाख करोड़ से ज्यादा पड़ा है लेकिन वह बैंक को लौटा नहीं रहे और बैंक ले नहीं पा रहा। तो दो सवालो को समझना होगा। पहला, बैंकों में पैसा देश के नागरिकों का ही है। दूसरा,बैंक का 90 फिसदी पैसा सरकार या उघोगपति कर्ज पर लेते हैं। यानी आज जिस तरह जनता अपने ही रुपयों को पाने के लिये नोट बदल रही हैं। अगर देश का नागरिक सोच लें कि वह बैंकों से सारा पैसा निकाल लेगा तो क्या बैक उसे सारा पैसा देने की स्थिति में होगा। यकीनन नहीं। तो जरा बैंकिंग सर्विस के जरीये उन हालातों को समझें जहा आप एक लाख रुपये बैक में जमा कराते है । बैक उघोगो से ब्याज लेकर 90 हजार रुपये कर्ज में दे देता है। 90 हजार लौटने पर बैक 81 हजार फिर ब्याज लेकर कर्जपर दे देता है। यानी जनता के पैसे से बैक ब्याज लेकर जनता के पैसे को ही उघोगों या कारपोरेट को कर्ज देता है। बैंक की अपनी लागत कुछ नहीं होती। लेकिन बैंक का टर्न ओवर बढता जाता है। औऱ इस प्रक्रिया में रुपये की कीमत गिरती जाती है। यानी अगर लोग ये सोच लें कि कि बैंक से रुपया निकाल कर वह जमीन, सोना या अनाज ही खरीद लें तो बैक के पास इतनी रकम होगी ही नहीं। यानी जो बड़े बुजुर्ग आज बैंक की लाइन में खडे होकर अपने ही पैसों के लिये तरस रहे है अगर वह ये सोच रहे होंगे कि पहले की ठीक था। जब सामान बदलकर जिन्दगी चलती थी। तो समझना होगा कि 1933 में बैंकों ने गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म इसीलिये किया। जिससे रुपये की ताकत खत्म हो जाये। यानी पहले जितना रुपया लेकर बैक में व्यक्ति जाता था उतने का सोना-चांदी मिल जाता था। अब ये संभव नहीं है कि जितना रुपया आपने बैंकों में जमा किया उस कीमत में एक बरस बाद उतना ही सामान मिल जाये जो जमा करते वक्त था। और अगर किसी देश को रुपये की जरुरत होगी तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ देशों को कर्ज देते हैं। देश कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में नोट छापते हैं। और फिर महंगाई बढती है। समाज में असमानता बढ़ती है। और माना यही जाता है कि बैंकिंग सर्विस के जरीये ही सत्ता अपने नागरिको पर और ताकतवर देश कमजोर देशों पर राजकर अपनी नीतियों को लागू कराते है । तो लोकतंत्र का नया राग संसद से नहीं बैंक से मिलने वाले नोट पर जा टिका है।

Thursday, September 15, 2016

इस देश में कभी पैदा न होना 'तैय्यबा'



जी, इस वीडियों को देखने के बाद अगर आपकी रुह नहीं कांपी होगी तो आप खुद कोे परखिए की क्या वाकई आपके अंदर इंसानियत  जिंदा है भी या नहीं..क्योंकि ये शब्द यूपी के मथुरा की बेटी तयैय्बा की है जो मरने से पहले इंसाफ की भीख मांग रही थी.तय्यैबा के उपर एक सिरफिरे परिवार जो उसके पड़ोस में ही रहता था उसने उसपर एसिड फेंक दिया क्योंकि तय्यैबा उससे नहीं किसी और से शादी करना चाहती थी...बहरहाल आप जब ये वीडियों देख रहे होंगे उस वक्त तय्यैबा हमारे आपके बीच तो नहीं है लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू आप जान कर शर्मसार हो जाएंगे.जी, पीडि़त परिवार  ने यूपी के सबसे बड़े और ताकतवर नेता मुलायम सिंह के घर पर भी गुहार लगाई लेकिन वहां से भी उनके हाथ खाली रह गए...अभी तैय्यबा की जिंदगी तबाह करने वाले तीन गुनहगार फरार है और एक पुलिस की गिरफ्त में है...बड़ा सवाल है कि एसिड एटैक करने वालों के अंदर कोई खौफ क्यों नहीं है ? क्या ऐसे बेटियां महफूज रहेंगी इस मुल्क में...

Saturday, September 10, 2016

शहाबुद्दीन कैसे बने ‘साहेब'



तो 63 मुकदमों से घिरा, गैंगस्टर होने का आरोप झेल रहा, बाहुबली का तमगा पा चुका शख्स मोहम्म्द शहाबुद्दीन भागलपुर जेल से जमानत पर रिहा हो गए लेकिन उनको जमानत मिलने मात्र से बिहार की सियासत गरमा गई है. बीजेपी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने जानबूझ कर शहाबुद्दीन के केस में कमजोर पैरवी की है जिससे शहाबुद्दीन को जमानत मिल गई. वही सोशल मीडिया पर भी बिहार के लोगों से लेकर बिहार की सरकार तक को लोग दुत्कार रहे है लेकिन मैं आपको राजनीति नहीं बल्कि शहाबुद्दीन के बारे में कुछ अहम चीजें बताउंगा. मेरी इस लेख को पढ़कर आप ये समझ सकेंगे की क्यों बिहार के सिवान जिले में एक बड़ा तबका शहाबुद्दीन की पैरोकारी करता है.जी,तो सबसे पहले 1982-87 के दौर में चलिए जहां से शहाबुद्दीन के साहेब बनने का सफर शुरू हुआ. दरअसल शहाबुद्दीन को खुद को साहेब कहलवाने का बहुत शौक था लेकिन 1982-87 के दौर में लोग शहाबुद्दीन को शहाबुद्दीन के नाम से ही जानते थे.1980 का दौर और उससे पहले सिवान जिला कामरेडो का जिला था मतलब वामपंथियों का लेकिन शुरूआत में क्रांति जैसा मालूम होने वाला वामपंथ सिवान के लिए नासूर बन चुका था क्योंकि सिवान में न सिर्फ वामपंथ हावी था बल्कि माओवादियों का भी खूब बोल बाला था और इसी से त्रस्त होकर सिवान जिले के भुमिहारों ने शहाबुद्दीन को सशक्त करना शुरू कर दिया. भूमिहारों का साथ मिलते ही शहाबुद्दीन के दिन बदल गए. छोटे मोटे कांड में शामिल होने वाला शहाबुद्दीन पैसे और अपने गुर्गों से सश्कत होने लगा.धीरे-धीरे  शुरूआत हुई तो लोग शहाबुद्दीन के पास अपने काम को करवाने पहुंचने लगे और शहाबुद्दीन के यहां दरबार सजने शुरू हो गए.जनता और सत्ता का साथ पाता देख शहाबुद्दीनके हौसले आसामान छूने लगे और इसी कड़ी में शहाबुद्दीन ने माओवादियों और वामपंथियों के घर को खोखला करना शुरू कर दिया. शहाबुद्दीन की ताकत बढ़ती गई और वाम औप माओ सिवान से घटते गए.वाम और माओ के घटने के साथ ही शहाबुद्दीन का रुतवा बढ़ने लगा और लोग शहाबुद्दीन के साथ खड़े होते चले गए. भुमिहारों के समर्थन से खड़ा हुआ शहाबुद्दीन का नाम न जाने कब इतना बड़ा हो गया किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. बढ़ते नाम के साथ शहाबुद्दीन का कारोबार भी बढ़ने लगा और शहाबुद्दीन ने अपने आस पास नाजायज कामों का एक साम्राज्य ही खड़ा कर दिया. ऑटोमेटिक हथियार हो या रंगदारी या फिर हत्या या किसी का अपहरण हो हर जगह बस एक नाम . ऐसे में बढ़ते ताकत के साथ शहाबुद्दीन ने राजनीति में एंट्री बतौर विधायक की लेकिन बाद में देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानि लोकसभा तक जा पहुंचे.सत्ता और बाहुबल के खुमार में डूबे शहाबुद्दीन बिहार का बड़ा और खुंखार चेहरा साबित हुए. लेकिन उससे पहले आप एक किस्सा भी जान लिजीए कि जब शहाबुद्दीन के पिता मरने वाले थे तो सिवान के मशहुर वकील श्रीकांत बाबू से अपने औलाद पर आशिर्वाद बनाए रखने का वादा लेते गए.पहले के जमाने में नैतिकता और जमीर जैसे भारी भरकम शब्दों के सामने वादा बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी. ठीक ऐसा हुआ भी, श्रीकांत बाबू के आशिर्वाद  होने के कारण साहेब का मनोबल और बढ़ गया. चुनाव के दौरान 90 के दौर में बूथ कैपचरिंग बेहद आम बात हुआ करती थी औऱ साहेब के लड़को के लिए बूथ लूटना खेल से ज्यादा कुछ था भी नहीं. लेकिन जिस बूथ पर श्रीकांत बाबू को वोट देने जाना होता था उस बूथ के वोटर लिस्ट  पर शहाबुद्दीन खुद हरी कलम से उनके नाम को घेर देते और वहां अपना हस्ताक्षर भी कर देते ताकि बूथ में भोकस वोटिंग के दौरान इस बात का ख्याल उनके लड़के जरूर रखे की श्रीकांत बाबू का वोट कोई औऱ न दे पाए क्योंकि श्रीकांत बाबू वोट देने शाम के 4 बजे आते थे.  ऐसे ही कई कड़ियां मिली और शहाबुद्दीन धीरे-धीरे साहेब बनते चले गए.जब सिवान की जनता वाम और माओ से परेशान होकर शहाबुद्दीन को चुन रही थी तो किसी ने न सोचा होगा कि शहाबुद्दीन के जरिए वो जिस खौफ को खत्म करना चाहते है वो खौफ एक दिन खुद शहाबुद्दीन के रूप में उनके सामने खड़ा होगा.सिवान का एक धड़ा शहाबुद्दीन को रोबिन हुड का अवतार भी मानता है क्योकिं डॉक्टरों, व्यापारियों, इंजिनियरों से रंगदारी लेने वाले शहाबुद्दीन गरीबों   की मदद में जी खोल कर पैसा भी लूटाते है. गरीब के घर में शादी हो या कोई बीमारी वहां धन शहाबुद्दीन ने जी खोल कर खर्चा इसलिए सिवान का एक तबका मुसलमानों के अलावा भी उन्हें रहनुमा मानता है.तो वही शहाबुद्दीन को खडा करने वाले भूमिहारों को भी शहाबुद्दीन ने कभी आंख तिरछा कर नहीं देखा.राजनीति में भारी सफलता ने शहाबुद्दीन को ऐसी खुमारी दी कि सिवान में कोई बड़ी लूट हो या फिर हत्या या फिर अपहरण हर जगह शहाबुद्दीन के हाथ होने की खबर आने लगी. शहाबुद्दीन को तेजाब कांड के बाद भले ही जेल जाना पड़ा हो और फिर उन्हे चुनाव में हार का मुंह भी देखना पड़ा हो लेकिन एक दौर वो भी था किसी भी पार्टी का बड़ा नेता सिवान में कदम रखने से पहले उनकी इज्जात लेकर कदम रखता था. सिवान की धरती पर भले ही प्रभुनाथ सिंह और उमाशंकर सिंह जैसे बाहुबली नेताओं ने अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की हो लेकिन सिवान की धरती पर शहाबुद्दीन जैसा न कोई था न कोई मौजूदा दौर में हैं और अब शायद ही सिवान फिर किसी को शहाबुद्दीन बनाएं. 

Wednesday, July 27, 2016

गाय के नाम पर इंसान जानवर बन गया ।

पुरानी सभ्यताओं का अध्यन का मौका मिले तो पढियेगा की इंसान इंसान को ही मार के खा जाता था । बहरहाल आज कल जानवर को मारने के नाम पर इंसान अपनी जान गवा रहा है ।इसलिए आपके जानकारी के लिए ये सब हाजिर है । देश में बीफ़ पर क्या है नियम जानिए .बीफ़ पर चर्चा गर्म है। गाय-भैंस के मांस के नियम-क़ायदों पर लोग काफी पेंच में हैं। आइए नियम जानिए- 1.केरल – सब कुछ लीगल है। गाय-भैंस सब। काटना, खाना, बेचना सब लीगल। 2.पश्चिम बंगाल- सेम टू सेम। सब लीगल। 3.मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल, मिज़ोरम और सिकिक्म- सब लीगल। गाय, भैंस सब। 4.मणिपुर- गाय काटना बैन है। खाना, बेचना, रखना लीगल है। भैंस में सब लीगल है। 5.असम- स्लॉटर के लिए सर्टिफिकेट नहीं है तो गाय नहीं काट सकते। बाक़ी खा सकते हैं, बेच सकते हैं। भैंस के लिए सब ओके है। 6.आंध्र प्रदेश+तेलंगाना- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। सांढ और बैल को सर्टिफिकेट मिलने के बाद काटा जा सकता है, बशर्ते वो अब प्रजनन, खेती और हल चलाने के काबिल न हो। भैंस- ओके। 7.बिहार- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। 15 साल सेज़्यादा बड़े सांढ़ और बैल का स्लॉटर लीगल है। खाना, रखना वगैरह लीगल है। भैंस में तो सबकुछ लीगल है।8.झारखंड- गाय, बैल वगैरह काटना, मांस रखना, खाना सब प्रतिबंधित है। भैंस- ओके। 9.गुजरात- गाय, बछड़ा, सांढ़, बैल पर प्रतिबंध है। काटना, खाना और ले जाना प्रतिबंधित है। भैंस पर कोई प्रतिबंध नहीं यानी ओके। 10.मध्य प्रदेश- गाय, बछड़ा, सांढ़ वगैरह सब प्रतिबंधित है। भैंस ओके है। 11.छत्तीसगढ़- गाय, बछड़ा,बैल, सांढ़ प्रतिबंधित। हर तरह से प्रतिबंधि। भैंस- ओके। 12.उत्तर प्रदेश- गाय, बछड़े, सांढ़, बैल का स्लॉटर प्रतिबंधित। इनका मांस खाना भी प्रतिबंधित। विदेशियों को खाने की अनुमति है। सील पैक्ड डब्बे में मांस लाया जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ विदेशियों के लिए उसे पकाया जा सकता है। भैंस में सब ओके। 13.दिल्ली- गाय, बछड़ा, बैल, सांढ़ प्रतिबंधित है। पूरी तरह प्रतिबंधित। किसी दूसरे राज्य से भी मांस लाकर खाना मना है। भैंस- ओके। 14.हरियाणा- गाय पर सब बैन है। खाने पर मैं श्योर नहीं हूं। भैंस- ओके है। 15.चंडीगढ़- यहां सब प्रतिबंधित है। गाय, भैंस सब। खाना, काटना, बेचना सब। 16.हिमाचल प्रदेश- सिर्फ़ रिसर्च के लिए काटने की अनुमति है या फिर अगर जानवर बीमार हो।बाक़ी सब ग़ैर-क़ानूनी है। 17.राजस्थान- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ पर पूरी तरह प्रतिबंध। भैंस में सब ओके। 18.पंजाब- गाय का मांस बाहर से मंगाकर खा सकते हैं। पंजाब में खाने के लिए काट नहीं सकते। भैंसके लिए वही नियम है। भैंसे को निर्यात के लिएकाट सकते हैं। इसलिए यहां नियम पेंचीदा है। अगर आप खा रहे हैं तो ये बता सकते हैं कि आपने बाहरी राज्यों से मंगवाया है।19.ओडिशा- सिर्फ़ संक्रमण वाली बीमारी से ग्रसित गाय काट सकते हैं। बाक़ी नहीं। बूढ़े बैल, सांढ़ को सर्टिफिकेट के साथ काटा जा सकता है। भैंस के लिए कोई नियम नहीं। सब ओके। 20.महाराष्ट्र- 2015 के बाद गाय काटना, खाना, मांस रखना ग़ैर-क़ानूनीहै। भैंस- सब लीगल। 21.जम्मू-कश्मीर- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ को काटना, खाना, मांस रखना सब ग़ैर-क़ानूनी है। हाल ही में ये नियम बना। भैंस- ओके। 22.कर्नाटक- गाय अगर उम्रदराज़ या फिर बीमार है तो काट सकते हैं। खाना, मांस रखना, सब लीगल है। भैंस में सब लीगल। 23.तमिलनाडु- गाय, बछड़े पर प्रतिबंध। बेकार और बूढ़ी गायों और बछड़ों का स्लॉटर ओके। खाना, मांस रखना ओके। भैंस में सब ओक

Monday, June 6, 2016

सरकार को जीत के हैंगओवर से निकलने की जरूरत है...!


देश की मौजूदा स्थिति किसी से छिपी तो नहीं हैं लेकिन मौजूदा दौर में पैसे और सपने को पूरा करने की बेतहसा दौड़ के बीच लोग इन हालातों से या तो समझौता कर आगे बढ़ गए है या फिर उन्हें देश के हालात से ज्यादा उनके जेब में बढ़ता नोटों का दबाव मजा देने लगा है. जी,  ठीक –ठाक तरीकें से अगर आपको इस देश के हालात को समझना हो और ब्यूरोक्रेसी की मोटी चमड़ी से रूबरू होना हो तो आपको यूपी के बुंलदेलखंड, महाराष्ट्र के विदर्भ या लातूरया फिर छत्तीसगढ़ के बस्तर ,दंतेवाड़ा, जगदलपुर और झारखंड के लातेहार, सिंहभूम ,गढ़वा ,चतरा जाना पड़ेगा.ऐसा नहीं हैं कि देश में ये हालात पिछले 2 सालों से इस देश पर राज कर रहीं मोदी सरकार के दौरान बने है.दरअसल हमारे देश का इतिहास ही कुछ ऐसा रहा है जिससे देश कभी उबर ही नहीं पाया. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को राज करने में मदद करने वाला कोई विदेश से आये लोग नहीं बल्कि इसी मुल्क के लोग थे जो लगातर अंग्रेजी हुकूमत को मदद पहुंचा रहे थे और लगातार देश लूटता चला जा रहा था. ऐसा नहीं था की देश को आजादी मिलते ही देश में सब कुछ सुधर गया था. आजाद भारत के दामन में सबसे पहला दाग जीप घोटाले का लगा.खैर इस देश में घाटोला होना और उसको लेकर आरोप-प्रत्यारोप होना इन दिनों आम बात हो चुकी है.इन सब के बीच मोदी सरकरा ने अपने कार्यकाल के 2 साल पूरे कर लिए है और सरकार अपना लगातार महिमामंडन खुद कर रही है और दुसरों से भी करवा रहीं है। कांग्रेस के कार्यकाल के बारे में बहुत चर्चा हो चुकी है और अब जरूरत हैं कि केंद्र में बैठी मोदी सरकरा के बीते 2 सालों का भी आंकलन करना शुरू कर दिया जाए.मोदी सरकार के 2 साल के कार्यकाल पूरा होने पर एक नारा दिया जा रहा है कि मेरा देश बदल रहा हैं और आज के दौर का मौजूदा सवाल भी यही है कि क्या वाकई देश बदल रहा है या फिर सब कुछ जस का तस है ! बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम काज को देखा जाए तो जरूर ये कहा जा सकता है कि देश के मौजूदा दौर को हो रहे उर्जा के संचार का एक बड़ा केंद्र खुद पीएम मोदी है लेकिन अगर हम मोदी के मंत्रीमंडल का आंकलन शुरू करे तो जरूर ये महसूस हो रहा है कि ये सरकार भी पिछली सरकार की तरह ही है बस सत्ता में बैठे लोगों के चेहरे बदल गए है ।पिछली सरकार में भी राज्यसभा के जरीए देश चल रहा था और इस बार की सरकार भी देश राज्यसभा के जरिए ही चला रही हैं । सत्ता में बैठी पार्टी के लिए सबसे जरूरी चीज हैं कि वो जनता के मन में असंतोष पैदा नहीं होने दे .मोदी के विवादित मंत्रियों के काम काज का आंकलन भी जरूरी हैं क्योंकी देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा मोदी से संतुष्ट तो हैं लेकिन उनके मंत्रियों से खार खाए बैठे है .बतौर शिक्षा मंत्री स्मृति इरानी के ही कामकाज को देखा जाए तो देश में छात्रों का एक बड़ा तबका स्मृति से नाराज बैठा है क्योंकि लगातार एक के बाद एक देश के बड़े विश्वविद्यालयों में विवाद को जिस तरह से निपटाने की कोशिश हो रही हैं उससे उन्हें लग रहा है कि उनकी आवाज को कही न कही दबाया जा रहा है । पीएम मोदी को इस बात का ख्याल रखना भी जरूरी हैं कि एक वक्त इंदिरा गांधी से नाराज छात्रों का ही आंदोलन इंदिरा गांधी के इतिहास को काला कर गया था और मौजूदा दौर के पीएम इस बात को जितनी जल्दी समझे उनके लिए उतना ही फायदेमंद होगा.यहां जिक्र देश के वित्त मंत्री अरूण जेटली का भी जरूरी है.देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था उसी दौर में अब भी दिख रही हैं जिस दौर में यूपीए कि सरकार उसे छोड़ गई थी.बल्की एक कदम और आगे इस व्यवस्था पर गौर करें तो मालूम होगा कि पिछली सरकार के नीतियों को आगे बढाते हुए मौजूदा वित्त मंत्री अरूण जेटली ने देश की जनता के जेब में हाथ मारते हुए कई जगहों पर टैक्स बढ़ा दिया जिससे छोटी से छोटी चीज भी मंहगी हो गई. यहां बात पेट्रोल और डीजल की भी जरूरी है जिससे सरकार और तेल बेचने वाली कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही है। यूपीए के दौर में पैट्रोल उस वक्त 70 रूपय का था जब अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल130 डॉलर प्रति बैरल का हुआ करता था और आज के वक्त में पेट्रोल 60 का हैं जबकि अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल 50डॉलर प्रति बैरल से भी कम हैं.ये तो बात शिक्षा और वित्त मंत्रालय कि हुई. हमें एक नजर देश के गृह मंत्री के भी काम पर डालना जरूरी है .देश की मौजूदा मोदी सरकार पर लगातार अष्हिणु होने के आरोप लगते आ रहे थे और साथ ही किसी भी विवाद में एक पक्ष को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगता रहा है।देश में बीफ के लेकर हो रही बहस हो या दो समुदाय का आमना – सामना , मोदी सरकार पर लगातार ऐसे मामलो को दबाने और अपने निजी स्वार्थ के हिसाब से काम करने का आरोप भी लगा। वहीं पीएम मोदी के लिए बेहद जरूरी है कि जिस नक्सलवाद को लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने जो अपनी चिंता जताई थी उसका हल वो अपने कार्यकाल में जरूर ढूंढ ले क्योंकि देश का मौजूदा नक्सलवाद नासूर बनता जा रहा है और सहीं कार्रवाई नहीं होने के कारण देश की जनता के अंदर असंतोष भी पैदा कर रहा है।मोदी सरकार के आने के बाद हिंदूवादी संगठन भी लगातार अपना विस्तार करना चाहते है और उसी का नतीजा है कि कथित तौर पर जानवर का कारोबार करने वालों को, बीफ खानेवाले को , कथित देशद्रोह करने वालों पर भीड़ हमला कर देती है.कई जगह भीड़ इतनी हिंसक होती है कि खुद को इस देश के सर्वोच्य व्यवस्था से उपर उठ कर सड़क पर कथित इंसाफ कर देती है। देश ही नहीं बल्की विदेश की मीडिया द्वारा भी अपने देश की ऐसी कई घटनाओं को जोर शोर से उठाया गया लेकिन आश्वासन के अलावा सरकार इस देश को इन मुद्दो पर ज्यादा कुछ दे नहीं पाई. यकिन मानिए ये सारी चीजें धीर –धीरे एक बड़े अंसतोष का रूप ले लगी जिससे मोदी सरकार को पार पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा इसलिए जरूरी है कि पीएम मोदी पहले ही इन तमाम चीजों से सबक ले .मोदी सरकार के कई ऐसे मंत्री भी है जो अब मोदी के लिए गले की फांस बन गए है. चाहे वो उमा भारती हो या फिर गिरिराज सिंह या इनके जैसे कई और मंत्री जिनके मंत्रालय में काम से ज्यादा तामझाम है और जनहित नदारद. पीएम मोदी के पास 3 साल और है जिनमें उनकी कोशिश होनी चाहिए कि वो देश के विकास को और तेजी दे पाएं. साथ ही पीएम मोदी को जनता की मूड का भी ख्याल रखना जरूरी होगा, कहीं ऐसा न हो जाए की देश की अर्थव्यवस्था की बगड़ती तबीयत को सुधारने के चक्कर में जनता का ही मूड बिगड़ जाए और देश बदलने से पहले 3 साल बाद फिर सरकार ही बदल दी जाएं. तो ऐसे में कहना होगा की सरकार को अपने जीत के हैंगओवर से निकल कर जमीनी हकीकत से रूबरू होने की जरूरत है ....

 ऋषिराज

Thursday, April 14, 2016

पानी-पानी रे....

देश में सूखे की मार और पानी के लिए जारी संग्राम के बीच मौसम विभाग की ओर से सुकून देने वाली खबर आई है। मौसम विभाग ने अनुमान जाहिर किया है कि इस साल सामान्य से छह फीसदी अधिक 110 फीसदी बारिश होगी। पिछले साल 104 फीसदी वर्षा दर्ज की गई थी। सूखे से तरसते देश के लिए इससे राहत की खबर और क्या हो सकती है। इस अनुमान में गौर करने लायक बात यह है कि देश के जिस हिस्से में सूखे की मार ज्यादा है, वहां भी अधिक वर्षा होने की बात कही गई है।
इस वक्त महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, विदर्भ क्षेत्र और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र सबसे अधिक सूखे के हालात का सामना कर रहे हैं। निश्चित ही अधिक वर्षा होगी तो सरकार के लिए भी राहत की बात होगी, कारण कि खरीफ फसलों की अधिक पैदावार होगी। अनाज की बंपर उपलब्धता से पीडीएस स्कीमों में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी और महंगाई पर नियंत्रण रखने में भी मदद मिलेगी। बड़ा लाभ यह होगा कि अधिक वर्षा होने से भूजल का स्तर सुधरेगा। महाराष्ट्र में भूजल का स्तर सूख जाने के चलते ही पानी का भीषण संकट उत्पन्न हुआ है। लेकिन ये सारी स्थिति मौसम विभाग के अनुमान के हकीकत में बदलने पर निर्भर करेगी। फिलहाल देश में सूखे और पानी को लेकर संकट गहराया हुआ है। समय पर राज्य सरकारों के सजग नहीं होने के चलते आम जनता को इससे दो-चार होना पड़ रहा है।
इन समस्याओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को सुनवाई करनी पड़ रही है। सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र में आईपीएल मैच के दौरान पानी की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रति सख्त रुख अपनाना पड़ा और कठोर हिदायत देनी पड़ी कि आप मैच पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्र में कराएं। महाराष्ट्र के ही लातूर में जल संकट इतना गहरा गया कि सरकार को ट्रेन से पानी उपलब्ध करानी पड़ी है। मध्य प्रदेश में नलकूप से पानी भरने को लेकर एक लड़की की हत्या कर दी गई। सूखे से निपटने में हीलाहवाली के चलते सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात, हरियाणा और बिहार सरकार को फटकार लगाई। समय पर अगर सरकारें नहीं चेतीं, तो आने वाले समय में पेयजल के लिए देश में संग्राम छिड़ सकता है।
सूखे के चलते कृषि पर असर पड़ता है और भूजल स्तर में गिरावट आती है। केंद्र सरकार को अपनी राष्ट्रीय जल नीति में इन मुद्दों पर फोकस करना चाहिए। नीदी जोड़ो योजना भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। नमामि गंगे योजना में भी तेजी लाने की जरूरत है। एक बड़ी बात यह है कि जब हम ईरान-कुवैत से पाइपलाइन के जरिये कच्चा तेल देश ला सकते हैं, तो हम देश भर में पानी उपलब्ध कराने के लिए पाइपलाइन का संजाल क्यों नहीं बिछा सकते हैं। हमारे देश में पानी की कमी नहीं है, नदियों की भरमार है, बस असमान उपलब्धता है। देश में ही डीआडीओ और इसरो के वैज्ञानिकों ने खारा पानी को पीने लायक शोधन करने की सस्ती तकनीक बनाई है।
सरकार को भी यह मालूम है। लेकिन लगता है कि पानी माफिया के आगे राज्य सरकारें बौनी साबित हो रही हैं। केंद्र सरकार को जल संकट दूर करने की दिशा में समग्रता में जल्द से जल्द ध्यान देना चाहिए। वरना मौसम अनुमान में ही हम संकट का समाधान ढूंढ़ते रहेंगे?

Friday, February 19, 2016

बीजेपी: एक भटकी हुई पार्टी


नमस्कार मैं ऋषि राज ,आज आपके सामने एक ऐसे विषय पर बात करने  जा रहा हूं जिसके बारे में हर कोई बात करने से कतराता है । देश का मिजाज राजनैतिक  और भावनात्मक है हम लोग अकसर इसमें बह जाते है । आखिर क्यो मुझे बीजेपी को भटका हुआ कहना पड़ रहा है  इसके मैं आपको पुख्ता तर्क भी देने जा रहा हूं ।
  तेल- सबसे पहले देश में मौजूदा सरकार की बात करता हूं। जब एनडीए विपक्ष में थी लगातार यूपीए सरकार को  तेल के मामले पर निशाने  पर रखती थी । जब तेल के दाम बढ़ते तो विपक्ष आग बबूला होकर तंज कसता कि क्या अब तेल देश के प्रधानमंत्री के उम्र को पार करेगा ? किस्मत का फेर देखिए  जब देश में चुनाव हुए और सत्ता बदली तो पट्रोल डीजल कि  आसमान छूती कीमत अंतराष्ट्रीय बाजार में जमीन के बराबर आ गयी। जिसका फायदा आपको सीधे मिल सकता था वह फायदा सरकार उठा रही है । मौजूदा तेल की कीमत पिछली सरकार के मुकाबले तो कम है लेकिन जितना फायदा जनता को मिलना चाहिए था उसको एक्साईज ड्यूटी लगा कर रोक दिया गया। मौजूदा क्रूड ऑयल की कीमत 27 डॉलर है जिसके मुताबिक पेट्रोल 45 रूपये और डीजल 35 रूपये के आस-पास बिकना चाहिए था लेकिन देश की जनता अब मौज में है उन्हें अब तेल की कीमत से फर्क नहीं पड़ता और वो जो पार्टी विपक्ष में रहकर देश की जनता को मंहगाई की मार से बचाने की हुंकार भरती थी वो सत्ता में आकर जनता को मिलने वाले हक पर कुंडली मार के बैठ गयी है ।
  असहिष्णुता – देश में इस विषय को लेकर जबरदस्त तरीके से बहस हो रही है । कोई पक्ष में है तो कोई विपक्ष में है लेकिन सबसे बड़े पहलु पर कोई गौर करना ही नहीं चाहता । अब आप बताईये पूरा का पूरा देश असहिष्णु कैसे हो सकता है ? हा हमारे देश में एक वर्ग तो शुरू से है जो दमन पर भरोसा रखता है । वो वर्ग सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और अखबार –टेलीवीजन के जरीए लोगो को भड़काने का सदैव प्रयास करते रहते है । देश की सरकार का मनना है कि देश में सब कुछ अच्छा है तो उन्हें दादरी की घटना को देखना चाहिए जहां केवल इस शक के आधार पर कि उसने गौ मांस खायी है उस मुसलमान को पीट-पीट कर मार दिया जाता है । तो वही विपक्ष आरोप लगाता है कि ये सरकार मुसलमानो को खिलाफ है तो उन्हें मालदा कि घटना देखनी चाहिए जहां 2 लाख मुस्लिम जमा होकर 30 गाडीयों और पुलिस थाना को आग लगा देते है सिर्फ इसलिए क्योकी एक व्यक्ति नें उनके पैगम्बर को गे  कह दिया । पूरे देश में मुस्लिम समुदाय उसे फांसी पर चढ़ाने की मांग करता है जबकि कानून के तहत उसकी गिरफ्तारी हो चुकी होती है । पुणे में एक लड़के का हाथ कुछ मुस्लिम इसलिए काट देते है क्योकी वो हिंदु है । असहिष्णु हमेशा से हमारे देश का एक वर्ग रहा है जो अलग-अलग धर्मो से आते है । ये वो लोग है जो आपके विचार से असहमत होकर आपसे गाली-गलौज करते है और आपको पाकिस्तान भेजने तक की धमकी भी दे देते है । अक्सर ऐसे लोग ये भूल जाते है कि एक आजाद लोकतांत्रिक देश का अर्थ ही ये है कि अगर आप कोई बात रखनी चाहते है तो बिना किसी भय के वो बात आप कह सके ।आप असहमत भी है तो उसे धर्य रख कर सुने । हाल ही में शाहरूख खान और आमिर खान के बयान के बाद जैसे लोगो ने उनसे बर्ताव किया वो असहिष्णुता को सही साबित करता है लेकिन विपक्षी पार्टी ने बिहार राज्य का जैसे ही चुनाव जीता वैसे ही असहिष्णुता पर चर्चा से मन भर गया ।
 देशभक्ति – जी देश की मौजूदा  बीजेपी सरकार के मंत्री और उनके समर्थक  हर बात को ऐसे रंगने की कोशिश करते है कि उनकी सरकार अब तक की सबसे बड़ी देशभक्तों की सरकार है । हर बात को देश से जोड़ना कोई इन लोगो से सीखे। देश में ऐसा महौल खड़ा किया जा रहा जिसके तहत लोगो को ये सगने लगा है कि मौजूदा सरकार की विचारों से असहमति रखना देश से गद्दारी जैसा है । राष्ट्रहीत और देश प्रथम की बात करने वाली बीजेपी कश्मीर पहुंचते ही देशभक्ति भूल गयी और अलगाववादियो को हमेशा से एक पक्ष मानने वाले पीडीपी से हाथ मिलाकर जम्मू-कश्मीर में सरकार बना लेती है और हर जुम्मे को वहां आईएसआईएस और पाकिस्तान के झंडे को लहराया जाते है जिसे वो सत्ता के लोभ में बर्दाशत करते रहती है । मौजूदा सरकार के मंत्री और समर्थक बात-बात पर देशभक्ति का सर्टीफिकेट बांटते है लेकिन  देश के समझदार नागरिको को यह समझना जरूरी है कि हिन्दुवादी होना आपके देशभक्त होने का प्रमाणपत्र नहीं है। देशभक्त तो कोई भी हो सकता है चाहे वो हिन्दुवादी हो, सेक्युलर हो, वामपंथी हो या फिर मानवधर्म की बात करने वाला हो ।देशभक्त होने के लिए सबसे पहले आपको अपने देश कि अखंडता के बारे में सोचना होता है नाकि आप हिन्दु राष्ट्र की सिफारीश करे या फिर सरीयत के कानून को लागू करवाना आपकी ख्वाहिश हो ।
सरकारी नीति- देश कि सरकार  इन दिनों ऐसी स्थिती में जा पहुंची जा उसके सामने एक पथ नहीं अनेक पथ है लेकिन वो सारे के सारे पथ अग्निपथ है। बीजेपी जबसे सत्ता में आयी है वो लगातार विचारधारा की चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं। सत्ता में आते वक्त बीजेपी विकास की विचारधारा के साथ खड़ी थी लेकिन बीतते वक्त के साथ विकास की प्रथमिकता कम हुई और बीफ़ के मुद्दे पर सरकार चल पड़ी तो कभी सरकार के मंत्री राम मंदिर का विकास चाहती है तो कभी हिन्दुवादी संगठनो के सामने घुटने टेकती नजर आती है । मोदी जी ने सत्ता पाने के लिए देश से वादा किया कि ये जो सरकार है वो उनके चौकीदार है लेकिन उन्ही की चैकीदारी में सुषमा स्वराज से लेकर अरूण जेटली पर गंभीर आरोप लगे तो वही शिक्षा मंत्री अपने तौर तरीके से लेकर एक एबीभीपी संगठन के पक्ष में काम करने के आरोप से घिर गयी । हाल ही में हैदराबाद विश्वविधालय में रोहित वेमुला के आत्महत्या को लेकर भी शिक्षा मंत्रालय लगातार निशाने पर रहा । रोहित  सहित कई छात्रों पर कारवाई के लिए शिक्षा मंत्रालय ने 26 दिन मे ही 3 चिठ्ठी लिख दी तो वही इसी सरकार के नागरिक उदायन  मंत्री बंडारू दत्तात्रय  भी इस मामले में निशाने पर रहे और उनके उपर छात्र को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा और इस मामले में उनपर मुकदमा हो गया । सरकार ने इस मामले पर अपने मंत्रियो पर कोई कारवाई नहीं की और तो और सरकार छात्र की जाति से लेकर जांच समीति का बात में झुठ बोलते हुए पकड़ी गयी । खुद को देश का चौकीदार कहने वाले पीएम मोदी विकास की बात करते है लेकिन उनके मंत्री उटपटांग बयान देते रहते है जिसपर पीएम चुप्पी साधे रखते है जिस वजह से उनके मंशा पर लगातार सवालिया  निशान लगता आ रहा है । बीजेपी विपक्ष में रहकर  पाकिस्तान को लगातार निशाने पर रखती है लेकिन सत्ता में आते ही बीजेपी भटक गयी और लगातार हमले के बाद भी पाकिस्तान से दोस्ती के लिए प्रतिब्दध दिख रही है । विपक्ष में रहते हुए किसानों के लिए फिक्रमंद दिखती पार्टी सत्ता में आने के बाद किसान के लिए कई योजना तो लाती है लेकिन कर्ज किसानो का माफ करने के जगह उद्योग्पतीयो का करती है ।देश के युवाओ के लिए कई प्रोग्राम लॉंन्च करती है लेकिन उसे धरातल में उतारने में असफल दिखती है ।मनरेगा को लूट का अडडा मानने वाली बीजेपी सत्ता में आने पर उसका बजट कम कर देती है लेकिन एक साल बाद उसी मनरेगा को और बढावा भी देती है ।


        मेरी इन बातों के बाद भी आपको अगर यह महसूस नहीं हुआ कि  बीजेपी की सरकार एक भटकाव से जुझ रही है तो यह मेरी गलती है कि मैं आपको समझाने में नाकाम हुआ ।  आप इस लेख से जो भी समझे अगर यह न समझ पाये कि आपने वोट जिसको दिया, जिस मुद्दे पर दिया वह मुद्दा ही गायब हो रहा है तो आपको सरकार के बारे में पडताल करने की जरूरत है साथ ही यह भी जांच लीजिएगा कि कही आप भक्तेश्वर तो नहीं बन गये है । सरकार के गलत कामों का आप विरोध नहीं करते तो देश में हो रही गलत घटनाओं की जितनी जिम्मेदारी सरकार की है उतनी आप की भी है । तय किजीए आप भक्त एक पार्टी के लिए है या देश के लिए ?
-ऋषिराज