Friday, February 16, 2018

झूठ और सच में फर्क ! पीएम मोदी से लेकर नेहरु और कन्हैया तक का वो झूठ जो आप सच के तौर पर जानते है !

आपकी नजरों के सामने से कई चीजें गुजर जाती है आप उसपर यकीन भी कर लेते है, क्योंकि भेजने वाला आपका सोशल मीडिया का दोस्त होता है या फिर मैसेज भेजने वाला कोई आपका रिश्तेदार ऐसे में हमारी कोशिश है कि एक सूची के तहत आपको ये जानकारी दी जाए की आपतक जो बातें पहुंच रही है वो सच है या झूठ.


1-      


 कहानी - पहली पड़ताल जेएनयू में हुई नारेबाजी के लिए. भारत में ज्यादातर लोग इस बात पर यकीन करते है कि जेएनयू के कन्हैया कुमार ने भारत विरोधी नारे लगाए थे जिसके बाद उन्हे गिरफ्तार किया गया था. 


हकीकत - कन्हैया जेएनयू के अध्यक्ष थे इस नाते शुरुआत में दिल्ली पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार किया था.लेकिन बाद में मालूम चला की कुछ न्यूज चैनलों ने एडिटेड वीडियो का प्रसारण किया था जिसने कन्हैया की आवाज से छेड़छाड़ की गई थी.  दिल्ली पुलिस बीते 2 साल से कन्हैया के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर पाई है.


2-


कहानी- कहा जाता है कि नेहरु और सरदार पटेल के बीच बनती नहीं थी , और नेहरु ने पटेल को पीएम बनने से रोका. साथ ही उनके बीच खराब रिश्तो का हवाला दिया जाता है, यहां तक ये भी कहा जाता है कि पटेल के मरने पर नेहरु उन्हे देखने तक नहीं गए.




हकीकत -  आपने फेसबुक और वॉटसअप पर तो खूब मैसेज पढे लेकिन अब सच्चाई तो जान लीजिए.  इन दोनों नेताओं ने एक साथ कई साल जेल में बिताए और गांधीजी के साथ उन्होंने काम किया. जहां तक पीएम बनने की बात है तो ये फैसला गांधी जी का था लेकिन इसके बाद की एक रोचक पत्रावली भी है. एक अगस्त, 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सरदार पटेल को एक पत्र लिखा कि कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं। नेहरु के पत्र के दो दिन बाद ही यानी 3 अगस्त, 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि एक अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग व प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी।




आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।  ध्यान रहे की मौजूदा पीएम मोदी और बीजेपी भी नेहरु को लेकर ऐसी ही गलतबयानी कर चुके है.




3 .


कहानी राहुल गांधी को लेकर कई तरह के वीडियो आपको देखने को मिलते होंगे, आपको मजा भी खूब आता होगा, राहुल का एक बयान आपने देखा होगा जिसमें ये कहा जा रहा था इधर से आलू डालो उधर से सोना निकालोइसे लेकर पीएम से लेकर बीजेपी तक मजे लेते दिखी.


हकीकत दरअसल जिस वीडियो का आपको दिखाया जा रहा है वो वीडियो अधूरा है. एक रैली में राहुल गांधी पीएम की बात को कोट करते हुए ये कह रहे थे कि पीएम मोदी ऐसे जादूगर है कि वो बोलते है कि आप इधर से आलू डालो उधर से सोना निकालो”. इसी हिस्से से छेड़छाड़ कर सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया जा रहा है जिसका आप भी शिकार हो गए.


4.


कहानी पीएम मोदी ने जब हाल में सदन में राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए 90 मिनट तक लोकसभा में भाषण दिया तो उस दौरान उन्होने इंदिरा गांधी पर निशाना साधा था . शिमला समझौते में गलत कदम उठाने का आरोप लगाते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि ये इंदिरा गांधी की गलती थी कि उन्होने बेनजीर भुट्टो से समझौते में गलत पॉलसी अपनाई. प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से बैठक और मुलाकात का हवाला देते वक़्त बेनज़ीर भुट्टो के नाम का जिक्र किया था .


हकीकत -  जबकी सच्चाई ये है कि इंदिरा गांधी का निधन 1984 में हुआ था और बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री 1989 में बनी थीं. और शिमला समझौता 1972 में हुआ था और इसपर हस्ताक्षर जुल्फीकार अली भुट्टो ने किया था.




5-


कहानी-  पिछले कई महीनों से 10 रुपए के सिक्के को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. 10 रुपए का सिक्का असली और नकली के फेर में फंस गया है. दावा है कि बाजार में 10 रुपए के नकली सिक्कों की भारी खेप आई हुई है. इस दावे का असर ये है कि बाजार में कहीं भी कभी भी कोई भी 10 का सिक्का लेने से मना कर देता है.


हकीकत -  महज 10 नहीं बल्कि 14 तरह के 10 रुपए के सिक्के बाजार में है और आरबीआई के मुताबिक 14 तरह के डिजायन वाले 10 रुपए के सभी सिक्के मान्य हैं.  इन सारे सिक्कों की जानकारी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद है.





अलगी कड़ी में आगे भी सच औऱ झूठ का फर्क हम आपको बताते रहेंगे...फिलहाल आप लोग भी कोशिश किजीए की सच और झूठ में फर्क किया जा सके....

Wednesday, January 3, 2018

तीन तलाक पर 'पांच सवाल' जिनका जवाब मोदी सरकार को देना चाहिए !

रकार के मंत्री हो या फिर प्रवक्ता, हर कोई सिर्फ एक ही बात कह रहा है कि वो मुस्लिम महिलाओं की आजादी के पक्ष में खडें है लेकिन क्या सिर्फ किसी के पक्ष भर में आ जाने मात्र से सारी समस्याएं हल हो सकती है, सरकार ने जो कानून बनया हो वो 2 पन्नों में समेटा हुआ है, बिल को देख कर दो बातें कहीं जा सकती है... वो ये कि सरकार ने कानून को बेहद आसान बनाने का ऐतिहासिक काम किया है या फिर इस कानून को बेहद कम वक्त और हड़बड़ी में तैयार कर एतिहासिक काम किया गया है... जरा इन सवालों पर अब गौर फरमाइये........


1-      विधेयक की धारा 3 में कुछ विरोधाभास नजर आता है. इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी को तलाक देने का ऐलान करना, चाहे वे शब्द, बोले या लिखें हों या किसी इलेक्ट्रॅानिक फार्म में या किसी अन्यक तरीके से जो भी हो वो अवैध और शून्य होगा.  लेकिन इसी में धारा 2 के खंड ख में तलाकको ये कह कर परिभाषित किया है, ‘फौरी और गैर-वापसी का असर वाला विवाह विच्छेद’, तो फिर इसी बिल में इसे शून्‍य कैसे घोषित किया जा सकता है. 

2-      हालांकि बिल घोषणा करता है कि कानूनी परिभाषा के तहत आने वाला तलाक शून्यत होगा, ये इस तथ्यं को ध्यान में नहीं रखता कि आप कुछ तब ही शून्या कर सकते हैं जब वो लागू होता है, आप तब तक इसे शून्यो घोषित नहीं कर सकते जब तक आप इसके शुरुआत से ही शून्यर होने का ऐलान नहीं करते.

3-      या तो तलाक की दी गई परिभाषा बदली जाए या फिर धारा तीन को बदला जाए. इसका व्यासवहारिक परिणाम ये होगा कि एक महिला जिसके लिए तीन तलाक का ऐलान किया गया है, उसे अदालत आना होगा ताकि वो इसे पहली नजर में शून्यल घोषित करवा सके.  इसके अलावा दूसरी मुश्किलें भी हैं. धारा 5 और 6 पॉलिसी बनाने के लिहाज से प्रगतिशील खंड हैं, लेकिन खराब तरह से लिखे गए हैं. धारा 5 कहती है कि जिस महिला को तलाक दिया जाता है वो गुजाराभत्ता  पाने की हकदार है, और धारा 6 कहती है कि वह अपने नाबालिग बच्चों  को अपनी संरक्षा में ले सकती है. लेकिन अगर तलाक खुद में शून्यत है तो ऐसे मे गुजाराभत्ताज या संरक्षा का सवाल बमुश्किल ही सामने आता है. ऐसा तब होगा जब तलाक हो ही जाए. अगर पहली वाली बात होती ही नहीं है तो दूसरी के होने का सवाल ही नहीं उठता.





4-      दो सवाल और... सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक साथ तीन तलाक को गैरकानून घोषित करने के बाद आए फैसले के बाद तीन तलाक बोलने के जो एक सौ मामले आए उनका क्या हुआ? निश्चित रूप से तलाक तो नहीं हुआ होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया है।


5-      सो, अगर किसी व्यक्ति के एक साथ तीन तलाक बोलने से तलाक हुआ ही नहीं तो फिर क्या मामला बनता है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि तीन तलाक बोलने से अब तलाक नहीं होगा। तो कोई भी व्यक्ति तीन बार तलाक बोल कर अपनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता है। अगर छोड़ता है तो उसके खिलाफ महिला के साथ ज्यादती या घरेलू हिंसा की कई धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। जैसा कि दूसरे धर्मों के लोगों के साथ होता है। फिर इसके लिए अलग से कानून की क्या जरूरत है?  

Friday, December 29, 2017

बैंकों में नौकरी करने का सपना अब युवा त्याग दे तो बेहतर होगा !

ये जान कर आप हैरान हो जाएंगे, कि साल 2018 में युवाओं की लिए बुरी खबर मुंह खोले खड़ी है. नौकरी के लिए रोज धक्का खाने वाले युवाओं को ये खबर निराश कर सकती है . ये बुरी खबर देश के उन तमाम युवाओं के लिए है जो बैंकिग सेक्टर में अपना सुनहरा भविष्य बनाने की ख्वाब को सजों रहे है. खराब हालत से गुज़र रहे बैंक अपनी स्थिति सुधारने के लिए हर कोशिश में जुटे हुए है. इसके चलते आने वाले समय में आईबीपीएस जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बुरी खबर है. 2018 में भारत के कई बड़े सरकारी बैंक कोई वैकेंसी नहीं निकालेंगे. इसके साथ ही बैंक अपनी ओवरसीज़ ब्रांच को भी बन कर देंगे. सरकार से जुड़े सुत्रों की माने तो बैंके अपने ऑवरसीज ब्रांचों को बंद करने की तैयारी में है. कहा तो ये भी जा रहा है कि सरकार ने इशारों ही इशारों में बंद करने की अनुमति दे दी है. जरा आकंडों के लिहाज से समझ लीजिए की बैंकिग सेक्टर किन परिस्थितियों से गुजरने की तैयारी में है.
पंजाब नेशनल बैंक जहां एक साल में 300 शाखाएं बंद कर देगा. वहीं बैंक ऑफ इंडिया 700 एटीएम खत्म करेगा. आईबीपीएस के नोटिफिकेशन के मुताबिक 2018 में पीओ की सिर्फ 3562 वैकेंसी हीं होंगी.
2014 में आईबीपीएस की 21,680 वैकेंसी थीं. 2015 में ये आंकड़ा 16721 हुआ. 2017 में ये गिनती घटते-घटते 8822 पर पहुंच गया. आने वाले समय में बैंको में नौकरियों की संभावना 10-15 प्रतिशत ही रह गई है.
2018 में भी बैंक ऑफ बड़ौदा, आईडीबीआई बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और पंजाब नेशनल बैंक जैसे कई बड़े संस्थान एक भी भर्ती नहीं करेंगे.


ये आंकड़े किसी को भी परेशान कर सकते है. जाहिर है जब बैंको में सरकारी नौकरी नहीं निकलेगी तो फिर बेरोजगारी बढ़ेगी, साथ ही कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे लाखों लाख छात्रों का क्या होगा ये कोई नहीं जानता . वहीं आम लोगों के लिए बैंको का मर्जर होना भी किसी परेशानी से कम नहीं है. एसबीआई के सहयोगी बैंकों में स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद और स्टेट बैंक ऑफ ट्रावनकोर  के चेक 1 जनवरी से अमान्य हो जाएंगे. इनका विलय इसी साल अप्रैल में भारतीय स्टेट बैंक में कर दिया गया था.  जाहिर है एक तरफ बैंको का मर्जर है जिसके पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि काम करने में आसानी होगी तो दूसरी तरफ वो युवा है जो बैंकों  में नौकरी का खव्बा देख रहे है ऐसे में सरकार को चाहिए कि वो जल्द से जल्द कोई रास्ता ढूंढ निकाले क्योंकि अगर युवाओं को नौकरी साल 2018 में नहीं मिली तो फिर 2019 में आम चुनाव होने है जिसपर खासा असर पड़ेगा और ये सौदा मोदी सरकार को भी महंगी पड़ सकती है.. 

Friday, November 10, 2017

मुख्यमंत्री जी ! धनबाद तो आ रहे है सवालों के जवाब भी लेते आईयेगा !

13 नंवबर को झारखंड के मुख्यमंत्री धनबाद आ रहे है, उनका फूलों से स्वागत होना चाहिए और उनकी लंबी उम्र की कामना शक्ति मंदिर में होना चाहिए. बहरहाल जैसे मैने सुना की मुख्यमंत्री रघुवर दास13 नवंबर को विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय का शिलान्यास करेंगे तो मैं बेचैन हो गया. मेरी बेचैनी का हर कारण बताउंगा आपको, इसका राजनीतिक आंकलन से ज्यादा बेहतर सामाजिक आंकलन हो तो मुझे बहुत संतुष्टी होगी लेकिन मुझ नाचीज की राय बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती क्योंकी मेरा महत्व महज एक वोट का है और मेरे साथ कोई हजारों वोटर भी नहीं है. लेकिन जिन्होने हजारों लाखों वोट लेकर सत्ता संभाली उनके दौरे को लेकर एक स्वस्थ्य माहौल में सवाल तो होने चाहिए. मुख्यमंत्री विश्वविद्यालय का नींव रखेंगे, अच्छी बात है क्योंकि शिक्षा से ही समाज की तस्वीर बदली जा सकती है. लेकिन क्या मुख्यमंत्री धनबाद के एक किसी कॉलेज को उठा कर बता सकते है कि है इस कॉलेज और यहां पढ़ने वाले बच्चे इतने तेज है कि वो देश में किसी भी कॉलेज को टक्कर दे सकें आप, पी के रॉय कालेज से लेकर जिले का कोई भी कॉलेज उठा लिजिए ?  तस्वीर एक जैसी होगी ?  मुख्यमंत्री रघुवर दास ने हाल में लाखों करोड़ों रुपए कॉलेजों के लिए जारी किए लेकिन ये चिंता 3 साल बाद क्यों हो रहीं है क्या इसलिए क्योंकि 2019 का लोकसभा चुनाव भी है औऱ काम के लिए राज्य सरकार के पास 1 साल क्योंकि अंतिम साल में तो बस चुनावी एजेंडों की छपाई औऱ दिखाई होती है.मुख्यमंत्री जी धनबाद आ रहे है तो शिक्षा के साथ कई और मामलों पर भी उनका ध्यान जिम्मेदार नागरिक होने के कारण दिलाना चाहिए. अब पानी का मसला ही ले लिजिए हर अखबार जिले के अलग अलग शहरों, कस्बों के दिक्कत से पटा रह रहा है. कहीं पानी न पहुंचने की समस्या है तो कहीं गंदा पानी लोगों तक पहुंच रहा है. जरा  महुदा तेलमच्चो का ही हाल जान लीजिए, ग्रामीण जलापूर्ति योजना के नाम पर 11 करोड़ 79 लाख रुपए खर्च किए जाने के बाद भी आम जनता को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है, इस योजना का उद्‌घाटन मुख्यमंत्री द्वारा ऑनलाइन किया गया था, यहां के लोग तब से ऑन लाइन ही पानी पी रहे हैं, योजना साल 2013-14 में तत्कालीन पेयजल स्वच्छता मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल के कार्यकाल में बनी थी, जिसकी स्वीकृति वर्तमान पीएचईडी मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी के कार्यकाल में मिली, बड़े तामझाम गाजे-बाजे के साथ 23 जनवरी 2015 को बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो द्वारा खेलाय चंडी प्रांगण में इस योजना का शिलान्यास किया गया, जिससे पीएचईडी के आला अधिकारी, कार्य एजेंसी संवेदक मेसर्स दरोगा प्रधान के प्रतिनिधि सहित सैकड़ों लोग शामिल थे, शिलान्यास के समय लोगों के बीच उम्मीद जगी थी कि अब यहां के लोगों की पानी की समस्या का पूर्ण रूप से समाधान हो जाएगालेकिन आज तक ये योजना पूर्ण रुप से धरातल पर उतरी ही नहीं. ये जगह तो सेंपल भर है आप धनबाद के जिस कोने में भी जाएंगे वहां पीने की साफ पानी की समस्या से आप रुबरु होंगे. शिक्षा और पानी के बाद में स्वास्थ्य पर बात नहीं करुंगा बस इतना ही कहुंगा की कम से कम वोटरों के जान की चिंता सरकारों को होनी ही चाहिए. कानून व्यवस्था को लेकर बात की जाएं तो सीएम साहब की नैतिकता कई सवालों से घिर जाती है. मसलन बाघमारा के विधायक ढुल्लू महतो की बात करें तो सरकार उनके उपर से आपराधिक मुकदमे हटाना चाहती थी लेकिन वो तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इसपर रोक लगाया. सीएम साहब की पार्टी के विधायक ढुल्लू महतो को लेकर साल 2016 15 फरवरी को एक गजब की खबर सामने आई जिसपर विधायक जी पर आरोप लगा कि उन्होने रुसी कंपनी से ही रंगदारी मांग ली. इसको लेकर सीएम को चिट्ठी तर लिखी गई, विपक्ष ने सवाल किए लेकिन विधायक ढुल्लू महतो ने तमाम आरोपो को खारिज कर दिया. ये खबर एनडीटीवी से लेकर बीबीसी तक ने छापी ,लेकिन आपने इसपर क्या किया ? इसी 7 नवबर को उनके समर्थकों पर मजदूरों को बाघमारा के ब्लॉक 2 में दौडा- दौड़ा कर पीटने का आरोप लगा. सिर्फ एक विधायक ही क्यों , झरिया के विधायक संजीव सिंह को ले लिजिए, इनपर तो कांग्रेस के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या के आरोप लगे, वो जेल में बंद है, लेकिन आपने उन्हे अपनी पार्टी ने बनाए रखा है क्या ऐसे लोगों का सरकार समर्थन करती है ? अगर जवाब ना में है तो फिर पार्टी की तरफ से अबतक कार्रवाई क्यों नहीं हुई आप तो सीएम है पार्टी में आपकी बात कौन काट सकता है आप कहते है कि कानून व्यवस्था बनाये रखना प्राथमिकता है तो फिर मुकदमा वापस लेने की नीति कौन सी परिपाटी का परिचय देती है हो सकता है कि मेरी बात पर आपको यकिन नहीं हो, लेकिन आपके पार्टी के ही सांसद पीएन सिंह ने कहा कि धनबाद की कानून व्यवस्था बिगड़ गई है, इसके जनता में आक्रोश है, विकास का काम ठप है तो फिर क्या सांसद साहब की बात भी मायने नहीं रखती वैसे तो राज्य और केंद्र में आपकी पार्टी की ही सरकार है तो फिर समन्वय क्यों नहीं है धनबाद-चंद्रपुरा रेल लाइन को लेकर आज तक कोई मुआवजे की बात हुई नहीं और आपकी पार्टी के विधायक सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे तो फिर इसे क्या समझा जाएं, ये मजह दिखावे की राजनीति है  जिससे वोटों की फसल लहलहाती है और यहीं धारा झारखंड सहित धनबाद को बर्बादी की ओर ढकेल रही है जहां विकास की संभावनाएं लाख है. आखिर में यहीं कहूंगा की सीएम साहब आएं तो उन्हें पानी जरुर बोतलबंद पिलाइयेगा.    

Sunday, October 15, 2017

‘बेगुनाह’ हैं तलवार दंपित ? : आरुषि-हेमराज का हत्याकांड एक ‘अर्धसत्य’

आरुषि हेमराज हत्याकांड एक अर्धसत्य इसलिए क्योंकि आरुषि हेमराज की हत्या हुई ये सत्य है लेकिन इनका हत्यारा कौन है ये कोई नहीं जानता. बीतते वक्त के साथ भले ही 14 साल की आरुषि के खून के धब्बे बिस्तर से साफ हो चुके है. हेमराज के खून के धब्बे भी उस छत से गायब है जिस छप पर उसकी लाश मिली थी, लेकिन वो मुट्ठी भर लोग आज भी उस सूर्ख लाल खुन के धब्बों को भूला नहीं पाएं है, कानून आजतक आरुषि और हेमराज को न्याय नहीं दे पाया है.हर कोई ये जनाने को बेताब है कि आखिर आरुषि हेमराज का हत्यारा कौन है, हर कोई अपनी-अपनी सोच से इस हत्या का गुनहगार तय कर रहा है लेकिन इस हत्याकांड का असली दोषी जिसे निचली अदालत ने ठहराया उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये कहते हुए बरी कर दिया कि जांच एजेंसियों को पास पर्याप्त सबूत नहीं है तलवार दंपति को दोषी कहने के लिए. तलवार दंपति को निर्दोष इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इस मामले की जितने भी लोगों ने जांच की, उन सभी ने ये माना है कि तलवार दंपति को हत्या का दोषी मानने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं.
जांच में अलग-अलग तथ्य
इस दोहरे हत्याकांड की जांच कुल तीन अलग-अलग जांच दलों ने की थी. शुरूआती जांच नॉएडा पुलिस ने की, इसके बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और कुछ समय बाद इस टीम को बदलकर यह जांच सीबीआई की ही एक नई टीम को सौंप दी गई थी. दिलचस्प यह भी है कि इस मामले में देश की सर्वोच्च जांच संस्था की दो अलग-अलग टीम बिलकुल विपरीत दिशाओं में जाती दिखती हैं. सीबीआई की पहली टीम यह मान रही थी कि यह हत्याएं हेमराज के दोस्तों - कृष्णा, राजकुमार और विजय - ने की हैं. जबकि सीबीआई की दूसरी टीम ने माना है कि हत्याएं तलवार दंपति ने की हैं.

दो अलग- अलग पक्ष
सीबीआई की पहली टीम को कृष्णा, राजकुमार और विजय पर इसलिए शक था क्योंकि इन लोगों ने नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट में ऐसी कई बातें बोली थी जिसने यह पता लगता था कि ये लोग हत्या के दोषी हैं. दूसरी ओर डॉक्टर राजेश और नुपुर तलवार के नार्को या पॉलीग्राफ में ऐसी कोई भी बात सामने नहीं आई जिनसे इन लोगों के अपराध में शामिल होने की संभावना पैदा होती हो. इन टेस्टों के अलावा कृष्णा के कमरे से सीबीआई ने बैंगनी रंग का एक तकिया भी बरामद किया था जिस पर हेमराज के खून के निशान थे. यह सबूत इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ समझा जा रहा था. लेकिन जब यह मुद्दा अदालत में उठा तो नई सीबीआई टीम के अध्यक्ष ने इसे यह कहते हुए नकार दिया कि यह तकिया असल में हेमराज के ही कमरे से मिला था और टाइपिंग की गलती के चलते इस पर यह लिख दिया गया कि यह कृष्णा के कमरे से मिला है.
निष्पक्ष गवाहों ने बदले बयान
इस मामले को यह तथ्य भी कुछ रहस्यमयी बना देता है कि कई निष्पक्ष गवाहोंने भी इस मामले में अपने बयान बदले हैं. आरुषि और हेमराज के शवों का पोस्टमॉर्टेम करने वाले डॉक्टर. आरुषि का पोस्टमॉर्टेम डॉक्टर दोहरे ने किया था. पोस्टमॉर्टेम के दौरान उन्होंने आरुषि के निजी अंगों में कुछ भी असमान्य नहीं पाया था. आरुषि की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में भी ऐसा कुछ नहीं था जो बताता हो कि उस पर यौन हमला हुआ था या उसके निजी अंगों से कोई छेड़छाड़ हुई थी. पोस्टमॉर्टेम के बाद भी इस तरह की कोई बात डॉक्टर दोहरे ने न तो नॉएडा पुलिस को बताई थी, न सीबीआई को और न ही एम्स की उस डॉक्टरों की टीम को जिसके वे खुद भी सदस्य थे. लेकिन जब मामले की जांच सीबीआई की नई टीम करने लगी, जो तलवार दंपति को ही दोषी मान रही थी, तब पहली बार डॉक्टर दोहरे ने कहा कि आरुषि के निजी अंगों में असामान्य रूप से फैलाव था और ऐसा भी लग रहा था कि मरने के बाद भी उसके निजी अंग साफ़ किये गए हैं.डॉक्टर दोहरे का यह बयान पोस्टमॉर्टेम के लगभग डेढ़ साल बाद आया. पोस्टमॉर्टेम करने के बाद वे कुल पांच बार अपना बयान दर्ज करा चुके थे लेकिन ऐसी कोई भी बात उन्होंने पहले नहीं कही थी. कुछ ऐसा ही हेमराज के पोस्टमॉर्टेम के मामले में भी हुआ जो डॉक्टर नरेश राज ने किया था. उन्होंने भी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में कुछ असामान्य दर्ज नहीं किया था लेकिन न्यायालय में बयान देते हुए उन्होंने कहा कि हेमराज के निजी अंग में सूजन था जिससे ये शक होता है कि उसकी हत्या सेक्स करते हुए या उससे ठीक पहले की गई थी.
कई सवालों के जवाब गायब ?
आरुषि हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को हुई सजा पर इसलिए भी सवालिया निशान लगता रहा क्योंकि इस मामले में कई गंभीर सवालों के जवाब न तो जांच के दौरान जांचकर्ता ढूंढ पाए और न ही न्यायालय में अभियोजन पक्ष साबित कर पाया. जैसे ये सवाल कि हेमराज की मौत कहां हुई? अभियोजन की कहानी के अनुसार हेमराज और आरुषि, दोनों की हत्या आरुषि के कमरे में हुई थी. लेकिन आरुषि का कमरा, जहां उसका खून बिखरा पड़ा था, वहां हेमराज के खून का एक भी निशान नहीं था. इससे यह तो साफ़ था कि हेमराज की हत्या कहीं और की गई थी. हेमराज का शव घर की छत से बरामद हुआ था. विशेषज्ञों ने जब इस जगह और हेमराज के शव का परीक्षण किया तो पाया कि उसके शव को किसी चादर में रखकर छत पर घसीटा गया था. इस कारण विशेषज्ञों ने माना कि हेमराज को छत पर भी नहीं मारा गया था. क्योंकि यदि उसकी हत्या छत पर ही हुई होती तो हत्या करने वाले को उसकी लाश घसीटने के लिए पहले उसे चादर में रखने की जरूरत नहीं पड़ती. घर के बाकी किसी हिस्से में भी हेमराज का खून नहीं था इसलिए यह तथ्य भी एक रहस्य ही है कि उसे कहां मारा गया.
वो तथ्य जिसने तलवार दंपति का पक्ष मजबूत किया
राजेश और नुपुर तलवार के कपड़े भी उनके निर्दोष होने की संभावना बताते हैं. हत्या होने से कुछ ही घंटे पहले आरुषि ने अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में जो कपड़े राजेश और नुपुर तलवार पहने हुए दिख रहे थे, वही कपड़े उन्होंने अगली सुबह भी पहने हुए थे. इन कपड़ो में कहीं भी हेमराज के खून के निशान नहीं थे. आरुषि का खून इनमें जरूर था लेकिन जांचकर्ताओं ने भी यह माना है कि यह खून तब लगा होगा जब वे अपनी बेटी की लाश से लिपट कर रो रहे थे.
कमजोर तर्क और तथ्य बने बेगुनाही का कारण
सजा सुनाने से पहले जब निचली अदालत ने 39 सरकारी गवाहों, सबूत के 247 नमूनों, विशेषज्ञों की सैकड़ों रिपोर्टों, अभियोजन के हजारों दस्तावेजों और दोनों पक्षों की अनगिनत दलीलों को परखा तो माना कि इस मामले में भले ही कोई सीधा सबूत यह नहीं कहता कि हत्याएं तलवार दंपति ने ही की हैं लेकिन कई सबूत ये जरूर कहते हैं कि ये हत्याएं उनके अलावा किसी और ने नहीं की. इसलिए न्यायालय ने माना कि इस मामले में कुछ खामियों के बावजूद भी तलवार दंपति को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता. लेकिन सीबीआई अदालत के इस फैसले को उच्च न्यायालय ने गलत माना और तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया है.


इस पूरी घटना में एक बात साफ है कि 9 साल पहले हुई आरुषि की हत्या की बार बार सिस्टम भी हत्या ही कर रही है तो ऐसे में सवाल है कि अब सीबीआई क्या करेगी ? क्या सीबीआई नए सिरे से जांच करेगी ? क्या सीबीआई तलवार दंपति को ही दोषी मानकर आगे बढ़ेगी? क्या सीबीआई कोर्ट के फटकार के बाद दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देगी क्या सीबीआई आरुषि और हेमराज को इंसाफ दे पाएगी ? या फिर सीबीआई को किसी विदेशी जांच एजेंसी की सहारा लेना होगा ?  

Sunday, October 8, 2017

खुलासा - अडाणी के आगे बेबस है दो देशों की व्यवस्था ?

https://www.youtube.com/watch?v=6GDLHtH4zhc


तो क्या देश में सरकार के नाम पर मुखौटा पीएम मोदी का है और असल चेहरा गौतम अडाणी का है ? ये सवाल महज इसलिए नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री आए दिन उद्योगपति गौतम अडाणी के हवाई जहाज में सफऱ करते हुए पाए जाते है बल्कि ये सवाल इसलिए है क्योंकि जिस तरह से भारत सरकार और यहां तक की ऑस्ट्रेलिया की सरकार अडाणी पर पैसे छिड़क रही है वो वाकई कई संदेह पैदा करता है. बिना किसी चुनाव के आज बात गौतम अडाणी की हो रही है तो उसके पीछे का तर्क ये है कि एक ऑस्ट्रेलिया का चैनल वो कर गुजरा जो भारत में किसी के बस की बात नहीं थी. जी, ऑस्ट्रेलिया का एक चैनल ABC ने गौतम अडाणी के साम्राज्य की पड़ताल जिस कदर की है उसमें कई परते सामने आई है. अगर आपकी रुची उद्योगपति और राजनीतिक दलों के सांठगांठ को जानने में नहीं है तो फिर ये लेख आप मत पढ़िए आपका वक्त खराब होगा.  तो बात शुरु होती है कि अडाणी को आस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोल खदान का ठेका मिला है जिसका भारी विरोध ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है और वहां कि सरकार का पक्ष है कि इससे 10 हजार नौकरियां पैदा होंगी.    
मुख्य बिंदु
1-      अडाणी की कंपनी पर आरोप है कि टैक्स की चोरी की गई
2-       कंपनी ने विदेशों में फर्जी कंपनियां बनाई
3-      टैक्स हैवन देशों में पैसे ट्रांस्फर किए गए
4-      अडाणी ग्रुप ने तमाम आरोपों को खारिज किया है.

ऑस्ट्रेलियाई चैनल के मुताबिक
दरअसल अडाणी ग्रुप की ऑस्ट्रेलियाई संपत्ति में से एक अबोट प्वाइंट कोल टर्मिनल है, जिसका विस्तार मैके क्वीन्सलैंड तक होना है और वहां 400 किलोमीटर का रेल लाइन भी प्लान है. जो पॉर्ट से सीधे कोयले की खदान तक जाएगा. इस काम में कई कंपनी लगी हुई है और जिस कंपनियों से अडाणी की कंपनी का जुड़ाव है वो टैक्स चोरी के मामले में सवालों के घेरे में है.      
अंग्रेजी में यहां पढ़े-
According to ABC  “Adani Group’s assets in Australia include the Abbot Point Coal Terminal near Mackay in Queensland, a terminal expansion project it has approval to undertake at Abbot Point, and a planned railway line of nearly 400 kilometres from the port to the giant mine it wants to build in the Galilee Basin,”
अस्ट्रेलिया में जो एजेंसी ऑस्ट्रेलियन सिक्योरिटी और निवेशक कमीशन (Australian Securities and Investments Commission  इस तरह के निवेश पर नजर रखती है उसे भी धोखे में रखे जाने की बात कहीं जा रही है. दरअसल अडाणी ग्रुप ने अतुल्य रिसोर्स कंपनी को अपनी कंपनी सूची में दर्शा रखा है, जिसका स्वामित्व अडाणी ग्रुप से ही जुड़ा हुआ है. ये कंपनी एबोट कंपनी के द्वारा कंट्रोल की जाती है लेकिन पड़ताल में मालूम पड़ा की अतुल्य रिसोर्स को पीछे से ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड कंपनी जो सिगापुर के साथ साथ कई औऱ टैक्स हैवन जहां टैक्स को बचाया जाता है वहां रजिस्ट्रर्ड है और उसे कंट्रोल कर रही है.. ब्रिटीस वर्जिन आईलैंड आडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी देखते है और विनोद अडाणी कई मामलों में टैक्स हेराफेरी के आरोपी है. उनपर आरोप है कि जानबुझ कर इनलोगों ने मनी लौड़्री का खेल शैल कंपनियों के जरिए किया. जिसके जवाब में अडाणी ने कहा है कि विनोद अडाणी एक एनआरआई है और उनका अडाणी ग्रुप में किसी तरह का हस्तकक्षेप नहीं है. लेकिन अडाणी ग्रुप के काम में विनोद अडाणी की कंपनी को सलिप्तिता बताती है की दाल में कुछ काला है. विनोद अडाणी कई कंपनियों के डॉयरेक्टर है जो ऑस्ट्रेलियन रेल और पॉर्ट की संपत्ति को कंट्रोल करते है. तस्वीरे देख कर आप खेल समझ सकते है.
सौ- abc news


विवाद की दूसरी कडी ये भी है क्योंकि भारत सरकार पर आरोप है कि अडाणी को कोयले की खनन के लिए स्टेट बैंक से 6200 सौ करोड़ का कर्ज दिया गया ! वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी अडाणी को सरकार ने 1 बिलियन डॉलर का लोन दिया है. अडाणी की कंपनी पर आरोप ये भी है कि प्राकृति के स्वरुप को भी तबाह किया है. ऑस्ट्रिलिया के पत्रकारों की टीम ने गोवा से लेकर कनार्टक और ऑस्ट्रेलिया का हाल दिखाया जहां पर्यावरण के विरूध लगातार काम हो रहा है और लोगों का जीना दुभर है. वहीं ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार जब गुजरात पहुंचे तो उनसे क्राइम ब्रांच की टीम ने 5 घंटे तक पूछताछ की. सवाल है किसके इशारे पर, गुजरात मोदी औऱ अमित शाह का गढ़ है, साथ ही अडाणी का बेस भी गुजरात का है. ऐसे में मतलब समझा जा सकता है कि कैसे अडाणी फल फूल रहे है और कैसे एक अडाणी के लिए हर सिस्टम को तोड़ने के लिए बेकरार है. सिस्टम की एक तस्वीर और दिखाते है कि कैसे भारत में जारी अडाणी के खिलाफ जांच को सरकार ने रोक दिया. राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने कर चोरी के मामले में अडानी ग्रुप के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रोक दिया है। डीआरआई के अतिरिक्त महानिदेशक के वी एस सिंह ने इससे संबंधित एक आदेश जारी कर अडाणी ग्रुप के खिलाफ चल रही जांच को रोकने का निर्देश दिया है। अडाणी के फर्मों पर कथित रूप से आयात किए गए वस्तुओं के मूल्य में हेराफेरी करने और कम टैक्स अदा कर सरकारी खजाने को राजस्व नुकसान पहुंचाने का आरोप है।

 बता दें कि अडानी ग्रुप पर बिजली और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आयात किए गए सामानों का कुल मूल्य बढ़ाकर 3974.12 करोड़ रुपये घोषित करने और उस पर शून्य या कम 5% से कम टैक्स देने के आरोप हैं। राजस्व खुफिया निदेशालय के मुंबई क्षेत्राधिकार के एडीजी के वी एस सिंह ने 280 पन्नों के अपने रिपोर्ट में 22 अगस्त को लिखा है, “मैं विभाग के उस मामले से सहमत नहीं हूं जिसमें कहा गया है कि एपीएमएल (अडानी पावर महाराष्ट्र लिमिटेड) और एपीआरएल (अडानी पावर राजस्थान लिमिटेड) ने अपनी संबंधित इकाई यानी ईआईएफ (इलेक्ट्रॉजन इन्फ्रा होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड) को कथित विवादित सामान आयातित मूल्य से अधिक अधिक मूल्य पर दिया है।  

तो दूसरी तरफ भारत की खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अडाणी की ऑस्ट्रेलिया में 16.5 अरब डॉलर की कारमाइकल कोयला खान परियोजना के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न इलाकों में हजारों लोगों ने प्रदर्शन कर रहे है. पर्यावरण और वित्तपोषण के मुद्दों की वजह से परियोजना में पहले ही कई साल का विलंब हो चुका है. अडाणी ऑस्ट्रेलिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जयकुमार जनकराज ने कहा कि कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रोजगार सृजन के लिए प्रतिबद्ध है और क्षेत्रीय लोगों से इसे व्यापक समर्थन मिल रहा है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर विरोध के बाद भी ऐसा पहली बार हो रहा है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार किसी के साथ ऐसे मजबूती से खड़ी है. वहीं भारत के शह पर अडाणी की बढ़ती हैसियत भी किसी से छिपी हुई नहीं है. लेकिन जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया के चैनल के खुलासे के बाद भी भारत में चुप्पी है खासकर हिंदी मीडिया में वो वाकई कई अनसुलझी बातों की तरफ इशारा करती है.  

-    लेख abc न्यूज़ चैनल के खुलासे पर आधारित है.  


Monday, September 25, 2017

जनतंत्र के 'लूट' का मॉडल है झारखंड !


 झारखंड को बने 17 साल होने को है लेकिन झारखंड के हाथ की लकीरें अब तक नही खिंची है . ऐसा लगता है जैसे मानो अभी झारखंड की किस्मत लिखी जानी हो । लेकिन बीते सालों की कहानी देखी जाए तो ये जरूर कहा जा सकता है कि झारखंड को बना कर भी बनाया नही गया ।  यूं देखा जाए तो राज्य पर सबसे ज्यादा बार राज करने का मौका बीजेपी को मिला, खनिज संपदाओं से भरे राज्य में विकास की गाड़ी अब तक दौड़ नहीं पायी है ।  सरकारें दूसरे दलों की भी बनी लेकिन हर किसी ने राज्य के विकास के जहग खुद के विकास पर ही जोर दिया मसलन राज्य आज भी बिखरा हुआ है और संगठित महज वो लोग है जो इस राज्य पर राज कर रहे है । बात शिबू सोरेन की हो, या बाबूलाल मरांडी की राज्य की जनता ने इन नेताओं पर  अपना खूब भरोसा जताया लेकिन ये भी कुछ खास नजर नही आए। शिबू सोरेन की भूमिका तो राज्य को बनाने में रही लेकिन वो भी पार्टी और बेटे से इधर उधर देख न सके और रोज झारखंड पिछड़ता चला गया ।  मौजूद दौर में राज्य में बीजेपी की सरकार है , बीजेपी को इस बार लगभग जनता ने पूर्ण बहुमत के करीब पहुँचाया लेकिन बीजेपी की सरकार में भी भारी निराशा देखने को मिल रही है,हालांकि सरकार ऐसा नही मानती है ।


सरकार खुद के  1000 दिन को मुंबई से लेकर दिल्ली और दिल्ली से लेकर  मध्यप्रदेश तक प्रचार कर जश्न मना रही है ।  जबकि सच्चाई जमीन पर कुछ और ही है ।  जमीन अधिग्रहण के दौरान अपना हक मांग रहे लोगों पर गोली चलवाने का मामला हो या फिर गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का दांव हो, हर तरफ इन मसलों पर अप्पति है क्योंकि झारखंड का मिजाज तो बिना आदिवासियों के इतर बनाया नही जा सकता, तो ऐसे में झारखंड में विकास की बात आज भी बैमानी सी ही लगती है ।  जिला अस्पतालों की सच्चाई छुपाए नही छिप रही है और सरकारी विभाग का लचर रवैया लोगों की जान तो लेता ही रहा है ।  अब बात रांची की ही ले लीजिए , सेवा सदन अस्पताल के सामने स्थित पार्किंग में एक पेड़ से  शिव सरोज का  झूलता शव मिला था . युवक ने दो गमछे की मदद से फांसी लगा ली थी .  पीएमओ और डीजीपी समेत अन्य अधिकारियों को भेजे गये अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि चुटिया थाना की पुलिस के व्यवहार से क्षुब्ध होकर वह जान देने जा रहा है. उसने अपने पिता को पुलिस के जुल्म से बचाने की भी गुहार लगायी थी. आप सोच लीजिए जिस राज्य की राजधानी में खुलेआम ये सब होता हो वहाँ दूसरे जिलों का हाल क्या होगा ? और सत्ता बेलागम इसलिए भी दिखती है क्योंकि उसे इस बात का अंदाजा बखूबी है कि विपक्ष तो वही घिसीपिटी राजनीति ही करेगा ।  जब धनबाद चंद्रपुरा रेल लाइन को बंद किया जा रहा था तब बीजेपी के सांसद और विधायकों ने चूं तक न कि और जब एक झटके में 30 लाख लोगों को बेसहारा कर दिया गया तो फिर सत्ता में बैठे लोग ही राजनीति पर उतारू हो गए । विधायक से लेकर सांसद और सांसद से लेकर राज्य और केंद्र में सरकार बीजेपी की बावजूद उसके जनता को बेसहारा कर दिया गया । हज़ारो लोग जिनका जीवन उस रेल रुट के सहारे चल रहा था वो एक झटके में लाचार हो गए लेकिन बीजेपी विधायक ढुल्लू महतो से लेकर सांसद पीएन सिंह और गिरिडीह के सांसद रविन्द्र पाडेय जनता को झूठा दिलासा देते रहे और नाम मात्र का विरोध करते रहे, अब असल सवाल की शुरुआत भी यही से है कि सरकार जिनकी है क्या उनकी भी नही सुनी जा रही है ? तो फिर सुनी किसकी जा रही है और सरकार काम किसके लिए और किसके इशारे पर कर रही है ? दरअसल झारखंड को लेकर वादे और संकल्प तो साल 2000 से लिये जा रहे है लेकिन जिस झारखंड में बिरसा को भगवान माना गया उनके घर को भी आज तक सरकारें कंक्रीट का नही बनवा पायी लेकिन राजनीतिक पर्यटन होता रह गया ।


 झारखंड के साथ मूल सवाल आदिवासियों का है लेकिन मौजूदा तस्वीर में झारखंड के आदिवासी उस खोई हुई विरासत की तरह हो गए है जिनकी प्रदर्शनी प्रधानमंत्री, राज्यपाल या किसी विदेशी राजदूत के सामने नाँच और गाने के जरिये ही की जा रही है । आदिवासियों के बच्चों के लिए न तो सही शिक्षा है, न अस्पताल की व्यवस्था, मतलब इलाज के लिए भी आपको राजधानी का ही रुख करना होगा क्योंकि सरकारी मशीनरी अब भी सही तरीके से गांवों में पहुंच नही पायी है और छोटी छोटी बीमारी ही लोगों के मौत की वजह बन गयी लेकिन याद करें तो हर सरकार ने आदिवासियों के हित मे काम करने का वादा किया था । झारखंड में सरकारों की दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगता है कि साल 2014 तक के आंकड़े बताते है कि राज्य में 70 प्रतिशत महिलाएं  एनीमिया से पीड़ित है और जच्चा बच्चा मृत्यु दर देश के औसत दर 212 को लांघ कर  261 पर पहुंच चुका है । राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर आदिवासी इलाका सारंडा की तस्वीर हर उस इंसान को अंदर से हिला के रख देगी जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर यकीन करते हुए वोट किया हो । दरअसल 2017 में सरकार के आंकड़े मानते है कि वहाँ 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है जबकि सच्चाई उससे और अधिक भयानक है ।  न वहाँ पीने का साफ पानी है , न खाने को खाना, लगभग वहाँ के आदिवासी  बरसाती कीड़े को मारकर खाने के कगार पर है ।झारखंड में सरकारी डॉक्टरों के कुल 2900 पद है लेकिन सेवा 1600 डॉक्टर ही दे रहे है । राज्य में महज 3 सरकारी मेडिकल कॉलेज है जो मात्र हर साल 200 डॉक्टर ही राज्य को दे रहे है । वहीं 29.74 लाख हेक्टयर जमीन साल 2014  में सिंचाई के लिए उप्लब्ध थी लेकिन सिंचाई की सुविधा महज 25 प्रतिशत जमीन पर ही उपलब्ध थी और अब भी हालात नही बदले है । 17 साल के उम्र वाले राज्य में सबसे ज्यादा  राज तो बीजेपी ने किया लेकिन सत्ता का जलवा तो यही है कि मौजूदा सीएम पिछली सरकारों को ही दोष देते दिखते है ।


 रघुवर राज में ही शांत और अपने सौहार्द के लिए जाने जाना वाला राज्य गौ हत्या और मॉब लीनचिंग के लिए बदनाम हो गया है लेकिन सरकार अब भी मान रही है कि राज्य में तो राम राज है । लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी के विधायक ढुल्लू महतो तकरीबन दर्जनों भर मुकदमा झेल रहे है उसमें रंगदारी मांगने जैसे भी कई आरोप शामिल है , तो वही सीधे तौर पर झरिया विधायक संजीव सिंह भी सरेराह कांग्रेस के नेता और धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर की हत्या के आरोप में जेल जा चुके है , जमशेदपुर में बच्चा चोर के नाम पर बिगड़ती कानून व्यवस्था की तस्वीर भी कोई भूल नही सका है ,तो फिर रघुवर दास किस बिनाह पर राज्य में सब ठीक है का डंका बजा रहे है ? वजह चाहे जो भी हो लेकिन झारखंड के तमाम राजनीतिक दल सत्ता के छावं तले खूब बढ़ रहे है और जनता इन्हीं राजनीतिक दलों के आसरे विकास की बांट जोह रही है जो फिलहाल रघुवर राज में उन्हें नसीब होती दिख नही रही । तो फिर ये कहना तो जायज है कि जिस छोटे राज्य का कॉन्सेप्ट बीजेपी हमेशा देश के सामने देते आयी वहीं बीजेपी छोटे राज्य झारखंड  का विकास करने में विफल है ।