Saturday, July 11, 2015

अगर धोनी को हटाओगे तो धोनी जैसा कहां से लाओगे...?







जब आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो सामने घुप्प अंधेरा छा जाता है. जब पिच पर क्रोध में खिलाडी को धक्का देने लगे तो संयम की परीक्षा शुरू हो जाती है. जब लगातार हार मिल रही है तो कप्तान के काबलियत पर सवाल शुरू हो जाते हैं. जब मैच के बीच में कप्तानी छोड़ने की बात होती है तो ये सवाल शुरू हो जाते है कि वो कैप्टन कूल नहीं रहे. जब क्रिक्रेट में राजनीति शुरू हो जाए तो जीत पर असर पड़ता है. जब कप्तान को नीचा दिखाने की कोशिश होता है तो जाहिर है कि कप्तान का आत्मविश्वास हिलने लगता है. इन्हीं सारे सवाले के बीच कैप्टन महेन्द्र सिंह धोनी मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. चाहे क्रिकेट में जीत का मामला है या असल जिंदगी में सफलता का मामला है आत्मविश्वास सातवें आसमान पर चढ़ जाता है लेकिन हार से आत्मविश्वास गर्त में पहुंचने लगता है. जिंदगी की हकीकत है कि ऐसे निराशा का माहौल हर शख्स की जिंदगी में आता है जो इसमें फंस जाता है वो टूट जाता है और उबर जाता है फिर वो जीत जाता है. जी हां महेन्द्र सिंह धोनी आजकल क्रिक्रेट के मझधार में हिचकोले खा रहें हैं और चारों तरफ से ये आवाज आ रही है कि क्रिक्रेट में धोनी का समय अस्त होने वाला है.

बांग्लादेश के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला में मिली लगातार दो हार से लगता है कि धोनी साफ टूट गये हैं. हार के बाद धोनी ने यह कहते हुए कप्तानी छोड़ने की पेशकश की थी कि अगर उनके कप्तानी छोड़ने से भारतीय क्रिकेट को मदद मिलती है तो वह ऐसा करने के लिए तैयार हैं. टीम हारती है तो कप्तान को बलि का बकरा बनाया जाता है और टीम जीतती है तो ये कहा जाता है कि पूरी टीम की जीत हुई है. ऐसा प्रतीत होता है कि महेन्द्र सिंह खुद टूट नहीं रहें हैं उन्हें तोड़ने की कोशिश हो रही है. अभी इसी साल धोनी के नेतृत्व में टीम इंडिया वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल में पहुंची थी . धोनी के नेतृत्व सुपरकिंग्स चेन्नई की टीम आईपीएल 2015 फाइनल में पहुंची थी . ये दो बड़े मैच के नतीजे से ये साबित हो रहा है कि धोनी के नेतृत्व में प्रदर्शन की क्षमता है वरना कहां से धोनी की टीम सेमीफाइनल और फाइनल में पहुंचती. बांग्लादेश में विराट कोहली के नेतृत्व में टीम इंडिया टेस्ट मैच नहीं जीत पाई बल्कि मैच ड्रॉ हो गया था . टेस्ट मैच का ड्रॉ होना और वन डे मैच में हार जाना ये भी संकेत देता है कि बांग्लादेश की टीम फुल फॉर्म में है. यही वजह है कि सिर्फ 200 रन पर ही पूरी टीम पस्त हो गई है वहीं गेंदबाज पूरी तरह विफल हो गये . जो जुबान पहले धोनी की जीत पर वाहवाही करती थी वही जुबान धोनी के खिलाफ कसीदे पढ़ रहें हैं. ये कहा जा रहा है कि पहले बेहतर प्रदर्शन किया लेकिन अब उनकी कप्तानी का सूर्यास्त हो रहा है यानि धोनी के दुश्मन कोहली की कप्तानी में चार चांद लगाने का सपना देख रहें हैं.

धोनी के खिलाफ किसकी साजिश है?
ये पहली बार हो रहा है कि वह बहकी-बहकी बातें कर रहें हैं और साफ दिख रहा है वो अब कैप्टन कूल नहीं रहे . इसकी दो वजहों हो सकती है कि उनके खुद पर आत्मविश्वास नहीं रहा है और दूसरी बात ये हो सकती है कि अंदर- अंदर उनके आत्मविश्वास को तोड़ने की कोशिश हो रही है. उन्होंने हार के बाद ये कहा कि अगर कुछ समय के लिए कोच की जगह खाली भी रहे तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि इसके लिए सही व्यक्ति को लाना जरूरी है,कोच नहीं है तो किसी को डाल दो वहां पर, अगर आप ऐसे फैसले लेंगे तो भविष्य में इसका बुरा असर पड़ेगा. वो कोच के बहाने निशाना साध रहें हैं और ये देश को बताने की कोशिश कर रहें हैं कि उनके खिलाफ साजिश हो रही है और उन्हें घेरने और नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है. धोनी ने कप्तानी करते हुए पिछले आठ सालों में विदेशों में कुल 62 जीत दर्ज की हैं लेकिन दो साल से उनके प्रदर्शन पर असर पड़ा रहा है और ये भी साफ है कि इन दो साल में अंदरुनी उठापटक जारी है. धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया पहला टी 20 और विश्वकप जीती. टीम नंबर वन हुई .

क्या विराट कोहली धोनी की भरपाई कर पाएंगे ?
धोनी के खिलाफ एक लॉबी काम कर रही है तो वही लॉबी विराट कोहली को बढ़ाने में लगी हुई है. विराट कोहली अच्छे क्रिकेटर हैं लेकिन कैप्टन कूल जैसी कला नहीं है. टेस्ट मैच में विराट कोहली अच्छा प्रदर्शन कर रहें हैं लेकिन कप्तानी के मामले में उनकी परीक्षा अभी ठीक ढंग से नहीं हुई है. वहीं अब वनडे में भी उन्हें कप्तान बनाने की कवायद शुरू हो गई है. बेशक विराट कोहली बेहतरीन खिलाड़ी है लेकिन वो दबाव को झेलने में सक्षम नहीं हैं. उनपर गंभीर आरोप लगता रहा है कि वो पंगे भी लेते हैं. हाल में ऑस्ट्रेलिया में शिखर धवन और विराट कोहली के बीच तू-तू-मैं-मैं की खबर आई थी धोनी ऐसे कप्तान थे जो इस बात पर पर्दा डालने की कोशिश की. यही नहीं विराट कोहली ने आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी मिचल जॉनसन से भी पंगा लिया था लेकिन धोनी के बारे में ऐसी खबर नहीं आई है हालांकि उन्होंने हाल में ही वो बांग्लादेशी खिलाड़ी को धक्का देने का काम किया . कोहली पर इसी साल एक पत्रकार को गाली देने का आरोप लगा था यही नहीं विश्व कप के सेमीफाइनल में टीम इंडिया हारी तो गर्लफ्रेंड अनुष्का शर्मा की वजह से विराट कोहली पर खेल के दौरान विचलित होने का आरोप लगा था. सेमीफाइनल मुकाबले में 13 गेंदों में सिर्फ एक रन बनाकर पवेलियन लौटने वाले विराट कोहली की जमकर आलोचना हुई थी. कोहली की आलोचना की वजह उनकी प्रेमिका अनुष्का शर्मा भी थीं, जो सेमीफाइनल मैच का मुकाबला देखने सिडनी गई थीं . सेमीफाइनल मैच के बाद हुए बर्ताव पर विराट कोहली ने बाद में अपना दर्द बयान करते हुए कहा था वे उस घटना से काफी निराश और दुखी हैं. ऐसे में महेन्द्र सिंह के द्वारा कप्तानी छोड़ना टीम इंडिया के लिए महंगा साबित हो सकता है ।


इतने से काम नहीं चलता और चाहिए....





लोग अक्सर बापू से एक सवाल करते थे कि आप एक ही धोती को पहनते भी हैं और आधा ओढ़ते भी है ,ऐसा क्यों?  बापू इस बात का जवाब बड़ी सहजता से देते हुए कहते थे कि “मैं वो पहनता हूं जो मेरे देश का न्यूनतम वर्ग का नागरिक आसानी से पहन सकें।“ जी, लेकिन अब बदलते वक्त के साथ हमारे देश के नेताओं के विचार भी बदलने लगे हैं। सभी नेताओं के जुबान से आज भी गांधी जी के आर्दशों के बारे में अक्सर सुनने को मिल जाता है लेकिन वो खुद बापू के विचारों को अपने जीवन में कितना उतारते है यह तो आपके सामने ही हैं। हमारे देश में वीवीआईपी कल्चर कुछ इस कदर बढ़ चुका हंै कि एक बच्ची घंटो जाम में फंस कर जान से हाथ धो बैठती है क्योंकि नेताजी के स्वागत में इतने समर्थक आ गये कि दो घंटे तक शहर जाम हो गया । उस बच्ची को तत्काल ईलाज की जरूरत थी लेकिन उस बच्ची के मां-बाप अपनी फूटी किसमत पर रोते रह गये । इन दिनों टीवी , रेडीयो पर सरकार समर्थवान लोगों से गैस की सब्सीडी त्यागने का आवेदन कर रही हैं लेकिन  देश के माननीय सांसद ,उनके रिशतेदार और संसद भवन में काम करने वाले सरकारी लोग खुद संसद भवन में सब्सीडी वाली लजीज व्यंजन का मजा लेते दिख जांएगे । बीते महीनें की बात है कि हमारे देश के पीएम भी संसद भवन की कैंटीन में जाकर खुद सब्सीडी वाला भोजन का लूफ्त ले आये थे । आप संसद भवन की कैंटीन का रेट तो जानते ही हैं। 20 रुपये की मटन करी और 4 रुपये प्लेट चावल। दो रुपये में पूड़ी सब्जी खा सकते हैं। अंत्योदय योजना कहीं ठीक चल रही है तो वो संसद भवन की कैंटीन है।जब कैंटीन से सब्सीडी हटाने की बात की गयी तो एक सांसद महोदय ने यहां तक कह दिया कि ऐसा करके हम गरीबों के पेट में लात नहीं मार सकते । तो इन बात को सुन कर लगा कि देश का सबसे गरीब तबका क्या संसद में है या फिर वो आंकड़े सच है जो बताते है कि देश में अब भी 28 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं  । 20 करोड़ भूखे लोग भी है जो पूरे विश्व में कहीं भी नहीं है । हम इस मामले में पहले स्थान पर है । इस बात की मुबारकबाद किसी दी जानी चाहिए ?  क्या कोई है जो इस दुर्गति का ठिकरा अपने माथे ले या फिर वहीं होगा जो देश में आक्सर होता हैं आरोप-प्रत्यारोप । खैर ,इस मसले से आगे निकलते हुए हम सांसदो के वेतन के बारे में बात करने जा रहे है ।  आपको कई जगह ऐसा मिलेगा कि सासंद साहब पार्षद का काम कर रहे हैं, विधायक जी अपनी जिम्मेदारी सांसद पर टाल रहे हैं। इसी का लाभ उठा कर कई सांसद कई जगहों से सुविधा भी ले लेते हैं।

नैनिताल से बीजेपी सांसद भगत सिंह कोश्यिरी को देहरादून में पूर्व मुख्यमंत्री के नाते एक सरकारी मकान मिला हुआ है। इस बंगले के रखरखाव और सुरक्षा पर राज्य सरकार एक साल में करीब 40 लाख रुपये खर्च कर देती है। पूर्व मुख्यमंत्री के नाते इन्हें तीन सहायक रखने के लिए हर महीने 85 हज़ार रुपये मिलते हैं।

हरिद्वार से बीजेपी सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक को भी पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सरकारी बंगला मिला हुआ है। आरटीआई की जानकारी बताती है कि 2010 से 2011 के बीच यानी एक साल में पूर्व मुख्यमंत्री के नाते निशंक को मिली सरकारी कार के पेट्रोल और रखरखाव पर 22 लाख रुपया खर्च हुआ है। मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उत्तराखंड से विधायक बनने के बाद भी दिल्ली में मिले सरकारी मकान को छोड़ नहीं पा रहे हैं। नारायण दत्त तिवारी के पास देहरादून और लखनऊ में पूर्व सीएम के नाते सरकारी मकान मिला हुआ है।

 तो दूसरी ओर पंद्रह जून से हमारे सैनिक जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद कितनी आसानी से अपनी सुख सुविधा और सैलरी बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं। संसदीय कमिटी ने सांसदों की तनख्वाह डबल करने का सुझाव दिया है। इसके बाद हमने कमेटी के चैयरमैन गोरखपुर से सासंद योगी आदित्यनाथ की सैलरी का हिसाब लोकसभा की साइट से निकाला है। उसी के आधार पर मौजूदा और प्रस्तावित हिसाब बताते हैं।
मार्च 2015 में आदित्यनाथ जी को कुल 3 लाख 8 हज़ार 666 रुपये मिले थे।
बेसिक - 50,000
संसदीय क्षेत्र भत्ता - 45,000
आफिस का खर्चा - 15,000
सहायक की सैलरी - 30,000
यात्रा और दैनिक भत्ता - 1,68,666

कमेटी ने सुझाव दिया है कि बेसिक 50,000को से बढ़ाकर 1 लाख कर दिया जाए। पूर्व सांसद के पेंशन को 20,000 से बढ़ाकर 35,000कर दिया जाए। सहायक को भी सांसद के साथ रेल में प्रथम श्रेणी एसी का फ्री टिकट मिले। पूर्व सांसद को भी एक साल में हवाई यात्रा के लिए 20- 25 टिकट फ्री मिले।
दिल्ली में घर, फोन, फर्नीचर मुफ्त मिलता है। स्टीमर का भी भत्ता मिलता है। देश की संसद में कोई-कोई  बिल पास करवाने में महीनों और साल गुजर जाते है लेकिन इस वेतन बढ़ाने के मामले में तो बमुश्किल 5 मिनट लगेंगे और ध्वनि मत से प्रस्ताव सभी पार्टियों की सहमती से पास हो जाएगा। जिस पार्टी की सरकार केन्द्र में है वही पार्टी दिल्ली विधानसभा के विपक्ष में हैं। जब दिल्ली के नेताओं में अपने वेतन को बढ़ाने की बात कही तो विपक्ष के नेता ने कहा कि हम वेतन बढ़ाने के खिलाफ में है और हम एक रुपये के वेतन में  भी काम करने को तैयार हैं। एक ही पार्टी के दो नेताओं का दो अलग-अलग पक्ष हैं किसे सहीं ठहराये और किसे गलत । खबर यह भी है कि गुजरात सरकार उन सरकारी स्कूल के टीचरों के वेतन नहीं बढाएगी जहां के बच्चे 10 वीं और 12वीं के परिक्षा में 30 प्रतिशत से कम पास हुए है । संयोग देखिए कि वहां भी बीजेपी की सरकार हैं। अगर यह व्यवस्था टीचरों पर लागू हो सकता है तो देश के सांसदो पर क्यो नहीं ? हर साल सांसदो के काम की समीक्षा करके उनके वेतन को बढ़ाने -घटाने का काम क्यों नहीं किया जा सकता है?सासंदों के काम को देखकर अगर वेतन तय किया जाने लगे तो इससे सुस्त पड़ी परियोजनाओं को भी बल मिलेगा और सांसद को चुन कर भेजने वाले नागरिकों की भी बल्ले - बल्ले हो जाएगी ।


योग करके देखो अच्छा लगता हैं।


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दुनिया के किसी देश का कोई प्रस्ताव इस तरह स्वीकार हो और उसका ऐसे अनूठे तरीके से साकार होने की शुरुआत हो तो वह गर्व से सीना फुलाकर चलेगा। पूरे देश में एक आत्मसंतोष का भाव होगा। गर्व का अर्थ घमण्ड या बड़प्पन का भाव नहीं होता। इसका यह अर्थ भी नहीं होता कि हम स्वयं को अन्यों से विशिष्ट या श्रेष्ठतर मान रहे हैं। यह तो विश्व के कल्याण में, मानव समुदाय के हित में और विस्तारित करें तो प्रकृति और ब्रह्माण्ड के साथ मनुष्य को एकाकार कराने में अपनी विद्या के प्रयोग की विनम्र आत्मसंतुष्टि है। पर हम इसका खुलकर श्रेय नहीं ले सकते। ऐसा करने वाले को फुहर या अतिवादी या फिर फासीवादी तक करार दे दिया जाएगा। विचित्र स्थिति है।
अगर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून की मानें तो यमन को छोड़कर 192 देशों के लोगों ने योगाभ्यास में हिस्सा लिया जिनकी संख्या 2 अरब के आसपास जा सकती है। हमारे देश के प्रस्ताव पर योग दिवस के दिन दुनिया भर के 252 से ज्यादा शहरों में इतने ज्यादा लोगों ने योग किया। इनमें गांव, कस्बे आदि शामिल नहीं हैं। यह ऐसा रिकॉर्ड है जो शायद ही कभी टूटे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहां कि आज विश्व के किसी क्षेत्र में जिस समय सूरज की किरणें निकलेंगी वहां योगाभ्यासी होंगे। यह निश्चय ही ऐतिहासिक स्थिति है। स्वयं मून ने यह स्वीकार किया कि विश्व संस्था ने अनेक दिवस बनाए हैं लेकिन जैसा अप्रत्याशित जोश योग दिवस को लेकर दिखा वैसा पहले कभी नहीं हुआ।
यह तो विश्व के कल्याण में, मानव समुदाय के हित में और विस्तारित करें तो प्रकृति और ब्रह्माण्ड के साथ मनुष्य को एकाकार कराने में अपनी विद्या के प्रयोग की विनम्र आत्मसंतुष्टि है। क्या हम किसी बीमार की सेवा करके गर्व नहीं करते हैं? क्या हम किसी भटके हुए को सही रास्ता दिखाकर आत्मसंतोष का अनुभव नहीं करते? तो गर्व का अर्थ यह है।
वास्तव में भारत की संस्कृति की यही विशेषता रही है। हम कभी अपने योगदान को लेकर अहं भाव में नहीं आते, किसी को हेय या हीन मानने की भावना भारतीय संस्कृति सभ्यता का अंग नहीं हो सकता। योग अपने आप मनुष्य को अहं से परे निकालने की साधना है। यहां के जीवन दर्शन में सभी चर-अचर, जीव-अजीव में एक ही तत्व देखने का भाव हमें ऐसा होने से रोकता है। योग भी यही भाव पैदा करता है। योग जिसका अर्थ ही है जोड़ना यानी सम्पूर्ण दृश्य अदृश्य जगत को एक साथ जोड़ देने वाली विद्या। तो जो योग सबमें एक ही तत्व का दर्शन करता हो, योग साधक को परमतत्व से जोड़ देने की अवस्था में ले जाता हो, जो निजत्व से बाहर निकलकर समष्टितत्व तक व्यक्ति को विस्तारित कर देता हो, वहां किसी संप्रदाय, किसी जाति, किसी देश या किसी समाज को अपने से हेय या हीन मानने का भाव पैदा कहां से हो सकता है। जाहिर है, ऐसा वे लोग कह रहे है जो इसे समझते ही नहीं या इस मूल सच को स्वीकारते ही नहीं। तो जो सच जानते नहीं, जिनकी समझ की सीमायें हैं, वो अगर शोर मचा रहे हैं, उपहास उड़ा रहे हैं, इस पूरे प्रयास को हास्यास्पद करार दे रहे हैं तो इसका संज्ञान क्यों लिया जाए? ये अपना काम करें, हम अपना काम करें।
क्या हमने-आपने कभी कल्पना की थी कि भारत की पहल पर विश्व में ऐसा दृश्य कभी उत्पन्न होगा कि हर कोने से लोग निकलकर योग करेंगे और इसके लिए पूर्व तैयारी में भी उत्साह से शिरकत करेंगे? अगर यह अकल्पनीय घटित हो गया तो इस पर उत्साह मनाने, इसे अपनी उपलब्धि मानने या इस पर गर्व करने में समस्या क्या है? विश्व के किसी सुविज्ञ नागरिक को भारत के इस आचरण पर आपत्ति भी नहीं हो सकती है। जबसे संयुक्त राष्ट्रसंघ बना है, इस तरह महासभा में किसी प्रधानमंत्री द्वारा रखे गए प्रस्ताव को इतने कम समय में इतने ज्यादा देशों का सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिला था। देश के अंदर राजनीति होती है। देश के बाहर कोई राजनीति नहीं। सीमा के बाहर भारत के प्रधानमंत्री का मतलब भारत है। प्रधानमंत्री के किसी प्रस्ताव का इस तरह सोत्साह केवल औपचारिक स्वीकृति नहीं, जनता के बीच स्वीकार किए जाने का यह पहला ही अवसर है। इसलिए यह समूचे भारत के लिए गर्व का विषय है। मजहब, संप्रदाय, भाषा, संस्कृतियां ही नहीं, संप्रभुता, भूगोल और राजनीति की सीमाओं को लांघकर अगर इतनी संख्या में लोगों ने एक ही प्रकार की क्रिया किया तो इससे कुछ समय के लिए ही सही एकता का प्रादुर्भाव तो हुआ। योग ने पता नहीं कितने वर्षों बाद विश्व के हर कोने के लोगों को चाहे संख्या कितनी हो, एक धरातल पर लाकर खड़ा किया और यह मानवीय एकता का आधार बना है। इसे हम ऐतिहासिक क्यों न मानें! हम जानते हैं कि केवल एक दिन योग कर लेने से बहुत अंतर नहीं आएगा, लेकिन इसी के साथ यह रुक जाएगा ऐसा क्यों मान लें। यह हमारी ही तो जिम्मेवारी है कि प्रक्रिया आगे जारी रहे, बढ़े , इससे और लोग जुड़ते जाएं और एक कारवां विश्व समुदाय का योगमय होता रहे। इस आधार पर एक युग का बीजारोपण कह ही सकते हैं। प्रधानमंत्री ने राजपथ पर योग आरंभ होने के पूर्व के संक्षिप्त संबोधन में कहा भी आज से शांति, सदभाव को उंचाइयों पर ले जाने तथा मन के प्रशिक्षण के एक युग की शुरुआत हो रही है। प्रेम, शांति, सद्भावना एवं एकता को फैलाने का कार्यक्रम है।
इसका दूसरा पहलू भी है। हर राष्ट्र का अपना राष्ट्रीय लक्ष्य होता है। किसी राष्ट्र का लक्ष्य धन, सेना, व्यापार आदि के आधार पर महाशक्ति बनने का लक्ष्य हो सकता है। इस समय विश्व में ऐसा वातावरण निर्मित हो गया है जिसमें लगता है कि सभी राष्ट्रों को लक्ष्य एक ही है। ऐसा है नहीं। सुभाष बाबू ने कहा कि भारत की आजादी इसलिए नहीं चाहिए कि इसे सैनिक और आर्थिक महाशक्ति बनना है, इसे विश्व के लिए आदर्श महाशक्ति बनना है। यानी इसे अपने आचरण से ऐसा मानक बनना है जो आदर्श हो सके। तो क्या हो सकते हैं वे आदर्श? इसका वर्णन ज्यादातर महापुरुषों की सोच में परिलक्षित हो जाता है। उदाहरण के लिए गांधी जी ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता इसलिए नहीं चाहिए कि यह भी अन्य देशों की तरह ताकतवर होकर उन्हीं की पंक्तियों में खड़ा हो जाए, , यह भी अन्यों के समान अपनी आर्थिक और सैनिक शक्ति से भय पैदा करे। गांधी जी के अनुसार उसे धर्म के अनुसार आचरण कर दुनिया को सही रास्ते दिखाना है। वह रास्ता है, सत्य, अहिंसा, अस्तेय का। सत्य अहिंसा अस्तेय ये तीनों आष्टांग योग की पहली सीढ़ी यम के पांच तत्वों में से तीन हैं। तो भारत का राष्ट्रीय लक्ष्य यह है कि विश्व को भौतिकता की, भोग साधनों की और इसके लिए जितने तनाव, संघर्ष, टकराव, अस्त्र प्रतिस्पर्धायें हैं, मजहबी, सांप्रदायिक संघर्ष हैं उन सबसे बाहर निकालने के लिए विश्व की सामूहिक चेतना में परिवर्तन लाना। योग इसका केन्द्रीय साधन हो सकता है। व्यायाम योग का अंग है, लेकिन यही योग नहीं है। आसन, प्रणायामों के साथ यम नियम का ऐस भाव व्यक्ति के अंदर अपने आप पैदा होने लगता है कि वह राग, द्वेष, उपभोग लालसा से परे होकर विश्व कल्याण की दिशा में विचार करने लगता है। अगर व्यक्ति अकेले हैं तो फिर एक व्यक्ति का चरित्र ऐसा बनेगा, लेकिन अगर सामूहिक रुप से इसमें ज्यादा लोग जुड़ते हैं तो ऐसी चेतना का विकास सामूहिक होगा।
कांग्रेस प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरु द्वारा शीर्षासन करती हुई तस्वीर दिखाकर कह रही है कि नरेन्द्र मोदी को ऐसा करने में 15 वर्ष लग जाएंगे। किसने कहा कि कांग्रेस के नेता योग नहीं करते थे या नहीं करते हैं? योग न करते तो आजादी के संघर्ष में उतनी परिश्रम और सहनशीलता की शक्ति नहीं आती। किंतु इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को हीन साबित करना जरुरी नहीं था। यह तो अशालीनता है। ऐसे अवसर राजनीति के लिए नहीं होते। कांग्रेस जिस प्रकार से सूर्य नमस्कार का विरोध करने में लगी थी उससे तो यह साफ था कि देश में राजनीति अब यहां तक आ चुकी है कि हम एक विश्व स्तरीय कार्यक्रम पर एक सहमति बनाकर देश का नाम स्वर्ण अक्षरों में नहीं लिख सकते ।राजनीतिक सीमाओं से बाहर निकलकर इतिहास निर्माण और विश्व कल्याण में भूमिका निभाने के अवसर में सबको भागीदारी करने की आवश्यकता होती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राजपथ योग कार्यक्रम में भाग लिया जो कि स्वागत योग्य था। लेकिन उत्तराखंड सरकार ने स्वयं को इससे अलग रखा जो दुखद है। यह नहीं होना चाहिए था। यह किसी पार्टी का नहीं , भारत का आयोजन है जिससे पूरी दुनिया जुड़ रही है। पूरे देश को इसके महत्व, और अपनी भूमिका का भाना होना चाहिए।
  वास्तव में 21 जून 2015 से भारतीयों को यह अहसास होना चाहिए कि आपका अपने प्रति और विश्व के प्रति दायित्व क्या हैं। उस दायित्व के अनुरुप आपको आगे काम करना है। भारत के अंदर और इसकी सीमाओं को पार करते हुए व्यक्ति से समष्टि तक योग का सामूहिक विस्तार करने में तथा हमारी अपनी भूमिका का निर्धारण हमें ही करना है। हम ही अगर इस एक दिन को उपलब्धि मानकर इतिहास निर्माण मानकर  रुक जाएंगे तो फिर हमारा जो राष्ट्रीय लक्ष्य है, भटके हुए विश्व को बिना अहं पाले और बहुत तामझाम किए चेतना के स्वतः विकास की धारा बनाने का जो सपना है वह यही थम जाएगा। इसलिए 21 जून के बाद से भारत की व्यापक और चैतन्य भूमिका की शुरुआत होती है।





Wednesday, June 17, 2015

पत्रकार या तो बने दलाल वरना हो हलाल !





देश के अलग -अलग हिस्सों से यह खबर हमेशा सुनने को मिलती है कि फ़ला अखबार का फ़ला पत्रकार की हत्या हो गई या कुछ लोगों ने की पत्रकार की पिटाई । जी, हम ऐसा सुनने के आदि हो गये है जिस वजह से उस पिटे हुए या मार दिए गए पत्रकार को खबरों में ना तो जगह दिला पाते हंै और नाहि न्याय । यह त्रासदी आज की नहीं हैं देश के इतिहास के साथ ही बढ़ती चली आ रही हैं।  इस लेख को लिखने का कारण भी यहीं हैं कि अब पत्रकारों पर हो रहे हमले नाकाबिले बर्दाशत हो चलें हंै ।  लंदन के एक मीडिया इंस्टीटूयट के अनुसार विश्व भर में पत्रकारों के लिए चैथा सबसे खतरनाक देश भारत माना गया हैं । साल 2013 में  भारत में 11 पत्रकारांे को मौत के घाट उतार दिया जाता हैं तो वहीं साल 2014 में विश्व भर में 61 पत्रकारों की जान ले ली जाती हैं । ये बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि जनता के हित के लिए खबरनवीश का काम करने वाला आदमी उसी समाज के किसी वर्ग द्वारा मार दिया जाता हैं । बात मुंबई हमले की हो या करागिल की पत्रकार सबकुछ दांव पर लगाकर रिपोर्टिंग करता है । हाल की ही बात करें तो छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तर प्रदेश तक पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं लेकिन सरकार कड़े कदम उठाने के जगह कड़ी निंदा करती है । मामला दबाने कि बात हो या खबर ना प्रकाशित करने के लिए पत्रकार पर हर तरीके से जोर आजमाइश  की जाती हंै लेकिन उसके बावजूद भी अगर बात नहीं बने तो पत्रकार को अपने जान से हाथ धोना पड जाता हैं।  हाल ही में उत्तर प्रेदश के शांहजाहानपुर में एक पत्रकार को जिंदा जला दिए जाने की घटना सामने आई । मामले कि पड़ताल करने पर पता चला कि पत्रकार  ने मरने से पहले लगातार न्यू मीडिया के जरीए मंत्री के कई कारनामो की पोल पट्टी खोल रहा था जिसके लिए उसे ऐसा ना करने की धमकी मिल रहीं थी लेकिन अपने जिम्मेदारीयों से समझौता ना करने की ऐवज में मंत्री के आदेश पर स्थानीय कोतवाल द्वारा पत्रकार को जिंदा जला दिया गया। इन बातों को कहने वाला कोई और नहीं बल्की मृतक पत्रकार ही हंै । मरने से पहले उसने एक वीडियो संदेश में ये बातें कही थी । इस घटना को घटे कुछ दिन ही हुए थे कि तभी एक कानपुर के पत्रकार को भी कुछ बदमाशों ने गोली मार दी ।  बताया जा रहा है कि इस पत्रकार ने कुछ लोगों द्वारा संचालित गलत काम का खुलासा कर दिया था जिसके बाद इस घटना को अंजाम दे दिया गया । अगर हम वर्चुअल वर्ल्ड की भी बात करें तो वहां भी ऐसे लोगों की तदाद बहुत मात्रा में है जो लगातार पत्रकार द्वारा लिखे गये लेख या उनके द्वारा रखी गयी बात पर जबरदस्त विरोध करते है और स्भयता की सारी हदे लांघ जाते है  । सोशल साइटस पर गाली गलौज करने वाले अक्सर वही लोग होते है जो किसी ना किसी राजनीतिक दल के घोर समर्थक होते है या किसी एक विचारधारा के गुलाम । अब सवाल यह है कि आप ,हम और सरकार वर्चुअल दुनिया में ज्यादा कुछ तो नहीं कर सकते लेकिन वास्तविकता की दुनिया में हो रहें पत्रकारों पर हमलों को रोका ना गया या फिर ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया तो  जनता के सरोकार के लिए काम करने वाला पत्रकार पहले अपने जान कि सोचे या फिर उस समाज की जो उसके मारे जाने पर गहरा दुख तो प्रकट करती है लेकिन बात वहीं तक सीमित रह जाती हैं। सरकारें अगर ऐसे ही बेफिक्र रहती हैं तो क्या ये समझा जाये कि पत्रकार अपनी जिम्मेदारीयों को छोड़ दलाली पर उतारू हो जाये और अपनी जान बचाये या फिर जनता के सरोकार का काम करते हुए गलत लोगों के हाथो हलाल हो जाये और अपने परिवार को अधर में छोड़ जाये । जरा सोचें,क्या ऐसे में जनता का लोकतंत्र बच पाऐगा !



Saturday, May 16, 2015

+18 देखे तस्वीर , इतनी बुरी मौत किसी को नसीब ना हो । गाड़ी चलाने में सावधानी बरते ।




छत्तीसगढ़ के एक जिले में बाइक सवार को ट्रक वाले ने इतनी जोर की टक्कर मारी की उसके शरीर के चीथड़े उड़ गये ।

Monday, May 11, 2015

100 % हमारे पूर्वज हैं आपको शंका हो तो वीडियो देखें...

भाई एक्सक्लूसीभ हैं चोरी मत किजियेगा । हां साझा किया जा सकता है ।
शेयर इस लिए कर रहा हूं कि इसे देख हम कह सकते है कि ये हमारे पूर्वज ही हैं।यह दृशय आफिस जाते वक्त मिला तो सोचा आप लोगो के लिए कैद कर लूं । 

Sunday, May 10, 2015

तो आखिर गजेंद्र को मारा किसने ? ....... हत्या या आत्महत्या ?

22 अप्रैल को आम आदमी पार्टी ने किसानों के लिए रैली कर संसद को घेरने का कार्यक्रम रखा था । देश के कौने दृकौने से पहुचां किसान अरविदं केजरीवाल की पार्टी से ये उम्मीद कर पहुंचा कि क्या पता हर बात पर  धरना देने वाले केजरीवाल किसानों की रैली करते दृकरते ना जाने कब धरना पर बैठ जाये और जो सरकार जमीन छीनने की तैयारीमें हैं उससे कोई कदम उठाने से पहले दो बार सोचना पड़े । कोई ये सोच कर पहुंच गया की आम आदमीकी बात करने वाली पार्टी उसके सपनों के घर में कहीं बिजली जलाने लायक महौल पैदा कर दें । रैली में भीड़ भी अच्छी खासी थी और लोगों का उत्साह चरम पर था  कि इसी बीच एक दृएक कर के कई नेता भाषण देने के लिए खड़े होते चले गये और महौल में क्रांति पैदा होता चला गया । उसी बीच एकाएक एक व्यक्ति पेड़ पर से झाडू हिलाता नारे लगाता हुआ सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है जनता उत्साह से लबरेज तालियां और सीटी बजाना शुरू कर देती है, जनता के उत्साह को देखकर व्यक्ति रोमंचित हो उठता है और पेड़ में फंदा बांधना शुरू करता है ,कुछ लोग उसे नीचे से ही रूकने के लिए आवाज लगाते है लेकिन  वह नहीं रुकता है । जब उस शख्स ने फांसी लगा ली थी तो कुछ नेताओं नेपुलिस से गुहार लगायी की उसे उतारा जाये.. पुलिस ने फायर ब्रिगेड को सुचना भेजकर इंतजार करना मुनासिब समझा तो इसी बीच कुछ युवकों नें पेड़ पर चहड कर उसे उतारने में लग गये ,फंदा जैसे खुला वह व्यक्ति पेड़ से सीधे नीचे गिर पड़ा आनन- फानन में उसे अस्पताल पहुंचाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया । मामला किसान का था और भरी महफिल  में किसान के आत्महत्या का तो सबसे पहले मृतक को देखने कांग्रेस के नेता अजय़ माकन पहुंचे फिर बाद में उनके साथ कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी । उधर रैली में भाषण जारी थी और 12 मिनट कुछ सेकेंड भाषण देने के बाद केजरीवाल भी वहा से निकल कर उस व्यक्ति जिसका नाम गजेंद्र था उससे मिलने पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी । जब- जब देश में किसानों का मसला उठता है तो सियासत खुद ब खुद पैनी और धारदार होती चली जाती है और इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ  । गजेंद्र की मौत की खबर जैसे ही आयी वैसे ही आम आदमी पार्टी ने पुलिस की लापरवाही का मामला बताकर खुद को अलग करने की कोशिश की ,तभी पुलिस ने यह कहकर आम आदमी पार्टी को इस मामले के केन्द्र में ला खड़ा कियाकि पार्टी के लोग उनके काम को और फायर ब्रिगेड की गाड़ी कोवहा तक पहुंचने में मुशकिल खड़ा कर दिया । बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को दोषी साबित करने की कवायद ही शुरू की थी कि कांग्रेस ने बीजेपी की नीतियों और केन्द्र के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस को जिम्मेदार ठहरा दिया। लोकसभा में देश के गृह मंत्री ने बताया की पुलिस को काम करने में व्यवधान पहुंचाया गया और सीटी बजाकर, नारे लगाकर गजेन्द्र को फांसी लगाने के लिए प्रोतसाहित किया गया।  दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग धारओं में एफआईआर दर्ज किया है जिसमें आम आदमी पार्टी के नेताओं का नाम भी शामिल हैं। पोस्टमार्ट रिपोर्ट में फांसी लगने से ही मौत की पुष्टि हुई हैं। वहीं प्राथमिक जांच में यह बात भी कही जा रही है कि गजेंद्र की मौत पेड़ पर पैर फिसलने से हुई है  लेकिन इस मामले में आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेताओं से पुलिस पुछ-ताछ कर सकती है ऐसा हमारे सुत्रों का कहना हैं।  गजेंद्र की मौत का पूरा सच आने वाले कुछ समय में सबके सामने आ जायेगा लेकिन ऐसे सार्वजनिक जगह पर 10 हजार से ज्यादा लोगो की मौजूदगी के बीच एक आदमी का फांसी लगा कर जान दे देना कुछ बड़े सवाल खड़े कर जाता हैं। मै मौके पर मौजूद तो महीं था लेकिन होता तो मेरी पूरी कोशिश होती कि गजेंद्र को ऐसा करने से रोक दूं।तो क्या उस रैली में मौजूद एक भी ऐसा शख्य नहीं था कि गजेंद्र को पेड़ पर चढ़ने से रोक सके ? गजेंद्र को पेड़ पर फंदा बांधने से रोक सके ? गजेंद्र को फांसी लगाने से रोक सके ?  जिस मंच से इस रैली को संबोधित किया जा रहा था  उस मंच से उस पेड़ं की दूरी महज 100 मीटर से भी कम थी जिसे 2 मिनट के अंदर भीड़ के बीच से गुजर कर पहुंचा जा सकता था  लेकिन नेता मंच से ही बोलते रह गये, दिल्ली पुलिस को निर्देश देते रह गये और तब तक देर बहुत देर हो गयी । यह काम केवल किसी पार्टी या पुलिस का नहीं था ।वहां मौजूद हर एक व्यक्ति अपने कदम बढ़ाकर इस घटना को रोक सकता था !यह दुर्भाग्य ही रहा कि जिस पेड़ के उपर किसान गजेंद्र ने फांसी लगायी उस पेड़ के नीचे दिल्ली के शिक्षकखुद को स्थायी करने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन वो लोग भी किसान के परिवारकी जिंदगी में आ रही सुनामी को नहीं रोक सके ।  जब ये घटनी हुई तो वहा नेता, किसान, पार्टी कार्यकर्ता ,आम जनता , मीडिया ,पुलिस ,दुकानदार कई प्रकार के लोग मौजूद थे  लेकिन किसी ने भी उसे रोकने और बचाने की जहमत नहीं उठाया और नतीजा आपके सामने हैं। तो इस मौत का जिम्मेदार कौन है,क्या वहां कोई भी एक शख्स ऐसा नहीं था जिसे लगा कि आज सूली पर एक बाप, किसान, मनवता की लटककर मौत हो जाऐगी । क्या यह महज आत्महत्या है। वहां मौजूद लोगों की जिम्मेदारी कुछ नहीं बनती। क्या हम आगे भी ऐसे ही तमाशबीन बनकर स्वार्थी बने रहने का भोग करेंगे या फिर इस हत्या और आत्महत्या से सबक लेकर कुछ बदलाव ला पायेंगे ।
ऋषि राज कि कलम से....